Tuesday, February 10, 2009

नेताजी ल भकाड़ूराम के चिट्ठी : के.के.चौबे के बियंग

परम सकलकरमी नेता जी राम-राम अरे! मैं तो फोकटे-फोकट म आप मन ल राम-राम लिख पारेंव। आप मन तो राम ल मानबे नई करव। राम-रावन युद्ध ल घलो नई मानव। तेखरे सेथी येहू ल नई मानव के 'रामसेतु' ल राम हर बनवाय रहीस। तुमन तो ये मानथव के रमायेन हर सिरिफ एकठन 'साहित्य' आय। कोनों परलोखिया बिधर्मी मन तुम ल अइसने हे बोलीन अऊ तुमन मान गेव नेताजी? खुरसी खातिर न? परदेसिया मन ला खुस करे खातिर, पइसा बनाय खातिर, ये सब खातिर। तब फेर ये जनता के आस्था का चीज ये? 
बिसवास का चीज ये? अब मोला समझ म अईस। नेताजी के हमर 'सोन चिरइया' हर घेरी-बेरी काबर बिदेसिया मन के गुलाम बनीस। तुंहर सरीखें 'देशभक्त' मन के कारन? आय न? बलिहारी नेताजी।
अब जब चुनई हर लकठियईस, तब तुमन ल लगीस के तुमन तो 'दही के भोरहा मा कपसा ल खा पारेव।' 'राख के भोरहा म अंगरा ल छू परेव।' तुम्हार हालत सांप छछूंदर कस होगे नेताजी। न उगलत बनत हे न लीलत। तुंहला पता हे के आदि भंवर के छाता में, नई तो दंतैया के घारा में हाथ डारहूं त पानी बूडे नई बाहंचव। तेकरे सेती तुमन पलटी मार देव। तुमन बोले लगेव के राम तो होय हे, फेर रामसेतु ल तो लंका ले लहुटत बखत ओ ह खुदे टोर दे रहीस हे। तुंहर दोगलापन म गजब के खबसूरती हे नेता जी। बिधानसभा के चुनाव तो निपटगे। लोक-सभा के चुनई होत तक इही चोला ल पहिरे रहव। तहां पाछू फटाक ले रंग बदल लेना। ठीक हे? नेता जी! तुम्हार कोंवर-कोंवर चरणारबिन्दु, मखमल ल छोंड़ के अऊ कुछु मा नई रेंगव, कहिथे। फेर अभी चुनई के सीजन चलत हे। तेखर सेती तुमन पाछू बछर भर होगे, पद खातिर पद जातरा करत हव। अभी तकलीफ उठाहू तभे तो मलई खाहू भई! अभी तुमन हमर जइसे गरीब गुरबा के झोपड़ी म आ के हमर बाल-गोपाल मन के रेंमट पोंछत हावव, हमर चटनी-बासी खावत हावव, भले पाछू कोती जा के उछर-बोकर देत होहू। तभे तो बोट पाहू भई। ये अलगे बात ये के, पद पा जाहू तहां पांच बछर तक हमर गली म तको खुसरे बर तुंहला पछीना छुटही। काबर कि तुमन बोट मांगेबर नौटंकी ल करथव। हमर दु:ख-पीरा सुनें के नांव म, तुमन ल पोचक्की मारथे। चुनई जीत के, हमार नेता बनके, पाछू तुम रजधानी म जा के चमचमा के बइठ जाथव। हमर पारा मा दिखबेच्च नई करव। इही ला कथें-'नाम ग्रामीण बैंक, अऊ अस्थापना सहर में।'
नेताजी! ओ दिन तुमन बोलेव कि तुम दू जघा ले चुनई लड़हू। ठीक करहू। जब एक जघा के जनता तुंहर ऊपर भरोसा नई करय, तब तुमन काबर ऊंखर ऊपर भरोसा करहू? दू जघा ले चुनई लड़बे करहू। जऊन जनता तुंहर ऊपर भरोसा नई करत हे, ऊंकर मिहनत के पइसा घेरी-बेरी के चुनाव म फेंकात रहय, तुंहर का जाही? हां, एक ठन तुमन जबड़ गलती कर डारेव। जनता हा महंगई के चक्की म पिसावत हे, अऊ तुमन ये बोल देव के-'हमारे पास कोई ऐसा बटन नहीं है जिसको दबाने से महंगाई कम हो जाय।' नेताजी, भले तुंहर करा अइसन कोनों बटन नई हे, फेर जनता करा एक ठिक बटन हावय 'बोटिंग-मशीन' के बटन। जनता जब ये बटन ल चपक दिही न तब तुंहर कीम्मत कानी-कउड़ी के नई रहि जाही। तुंहर 'महंगाई' ल जनता एकदम 'सस्ता' कर दिही तब तुंहर अइरसा-बोबरा कस फुले मुंहु हर पोचक के तुतरू कस हो जाही। तुंहर मखना-कोंहड़ा कस फुले पेट हर ओसक के दुहनी कस हो जाही। तब तुमन जनता के किस्मत के बटन चपके के लइक नई रह जाहू। मुहुंला जादा झन फरकाय करो। अलहन हो जाथे।
नेता जी! यदि अलहन हो गे तब? माने तुमन चुनई हारगेव तब? का थोथना ओरमा के कलेचुप बइठ जाहू? नहीं-नहीं, मैं नई मानंव। जब तुम्हार कनिहा टूट जाही तब तुम दूसर के कनिहा झोझकाय के जुगाड़ करहू। फेर सुरता राखहू नेता जी दूसर ला पनिहाने वाला दाऊ के पनही, कभू-कभू दाऊच के मुड़ी म गिरथे। नेता जी! तुंहर 'गरीब-परेम' संसार-प्रसिद्ध हे। आपमन गरीब मन ल अब्बड़ परेम करथव। तेखरे सेती आप मन गरीबी ल नई हरावव। काबर कि हटे ले आपमन ल अइसे तकलीफ होही जइसे बोरिंग के सुखाय ले घर वाले मन ल होथे। गरीबी हटही तब गरीब नई रहीं त आप मन परेम काकर संग करहू? भगवान करय आपके परेम सदा हरा-भरा रहय। इही परेम हर आपके घर परवार ला हरा-भरा राखय।
तुंहर 'दलित-परेम' घलो बन्दना के योग्य ये नेता जी। आप मन दलित मन संग भी अघात परेम करथव। जऊन 'पद-दलित' होथें, उही मन आप ल पद म बइठारथें, तहां पाछू आप मन उन मन ल बडे मयां लगा के 'दलित-दलित' कहिथव। 'पद' आप करा रहि जाथे 'दलित' ऊंकर करा रहि जाथे। पाछू आपके पद चरन हर दलित मन के माथा ल मया लगा के चूमथे। ये पद-दलित-मिलाप हर देखे के लइक रहिथे नेता जी मन गदगद हो जाथे।
पद अऊ पइसा खातिर तो तुम अपना इमान-धरम तको बेच देता है। कितने में बेचता है नेता जी? अभी नई बतावव? 'इस्टिंग ऑपरेसन' म बताहू? ठीक हे भई हम टीबी म देख लेबो। हां, सुरता अईस। तुंहला ओ दिन टीबी म देखे रहेंव नेताजी। तुमन 'चीयर-गर्ल्स' ए मोर मतलब हे-'ट्वन्टी-ट्वन्टी' देखे गए रेहेव। कस नेता जी बार-बाला मन बार के भीतर नाच के अपन पेट भरथें, अऊन हर खराब हे, तब चेलीक मोटि यारी टूरी मन, अपन उधारे दे हें म नाचथें, तऊन हर बने कइसे आय नेता जी?
मुहुं चपका गे न? नइए कुछु जुआब? नेताजी पद के लोरस मा जुच्छा पानी हो गे हे? कुरसी खातिर तुम्हार धरम, तुम्हार संस्कीरती ल अंखफुट्टा मन ललकारत हें, ओकर संग खेल करत हव। अपन पागा मा ऊंकर पांव पोंछत हावव? का इही दिन खातिर हमन तुमन ल अपन नेता बनाय हावन नेताजी? इही दिन के खातिर? मन हर करू होगे। लेव एक ठिन दोहा सुन लव: अरे-रे-रे-रे भाई रे
सादा-सादा ओंढा पहिरे हें, दिल हावय करिया हो।
कोनो दू रंग वाले, कोनो तीन रंग वाले, घेंच मा डारे हें फरिया हो॥
तुंहर प्रशंसक भकाडूराम
के.के.चौबे
गयाबाई स्कूल के बाजू वाली गली
गया नगर , दुर्ग

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Thursday, February 5, 2009

नंदावत पुतरा-पुतरी - सुधा वर्मा

अक्ती (अक्षय तृतीया) बैसाख महिना के तीज ल कहिथें, तीज अंजोरी पाख के होथे। ये दिन ल अब्बड़ पवित्र माने गे हे। अक्षय तृतीय के कहानी सुनव:
एक राजा के सन्तान नई रहिस हे। रानी बहुत उदास राहय। रानी ह कखरो घर भी बिहाव होवय त एक झांपी समान भेजय। एक दिन के भात रानी डाहर ले राहय। रानी ह रंग-रंग के पुतरा-पुतरी रखे राहय, अपन समय ल उही म बितावय। रंग-रंग के कपड़ा जेवर पहिरावय। एक दिन ओखर मन म विचार आथे के मैं ह अपन पुतरी के बिहाव करहूँ, अपन मन के मुराद ल पूरा करहूँ। अपन विचार ल रानी ह राजा ल बताथे। राजा सोच म पर जथे। बहुत जुवर के बाद म कहिथे- देख रानी लइकामन खेल-खेल म पुतरा-पुतरी के बिहाव करथें तेन ह ठीक हे फेर, हमन करबो त परजा मन हाँसही। रानी कहिथे नहीं काबर हाँसहीं ये पुतरी ल मैं ह आज बीस साल ले मया करत हंव अउ रोजे ओला सजाथंव, संवारथंव, इही ह मोर बेटी आय।:
'ठीक हे' काहत राजा ह उठ के चल देथे। अपन सिंहासन म उदास बइठ जथे। द्वारपाल मन मंत्री ल खबर करथे। मंत्री ह दऊंड़त आथे अउ राजा ले ओखर चिंता के कारन पूछथे। राजा ह सब बात ल बताथे। मंत्री घलो सोचथे। मंत्री ह सोच के कहिथे के ''राजा हमन रानी के इच्छा ल पूरा करबो अउ रीति-रिवाज के साथ रानी के पुतरी के बिहाव करबो।'' दूनो झन जा के रानी ल बताथें के हमन पुतरी के बिहाव करबो। रानी कहिथे मोर घर के दुवारी म बरात घलो आना चाही। पुतरा बर एक घर खोज लव। राजा कहिथे मंत्री पुतरा तोर रहिही अउ अब दूनो झन समधी बनबो, चल अब दूनो डाहर के बिहाव के जिम्मेदारी तोर आय। मंत्री ह सिर नवा के जी हुजूर कहिस अउ रेंग दीस। अक्ती के दिन बिहाव तय होईस। जम्मो राज के मनखे मन बराती अउ घराती बनीन। मंत्री ह राजा घर डोला म पुतरा ल लेके बरात लानीस पुतरा-पुतरी के पानी गरहन संस्कार होईस, राजा-रानी गांठ जोर के कन्यादान करीन अउ साकोचार पढ़े गीस। रात के खाना खाके बरात लहुटीस। पहट के बेटी बिदा होईस, रानी ह अपन पुतरी के बिदा करत सिसक-सिसक के रोईस। रानी के सखी मन घलो अब्बड़ रोईन। बीस साल ले पुतरी के जतन करे म लगे रहिन हे। अब महल सुन्ना होगे। राज भर में ये बिहाव के चर्चा चलते राहय।
एक महीना के बाद पता चलिस के रानी गर्भ म हावय। ये बात ल महल म लुका के रखिन। नौ महिना के बाद रानी एक सुग्घर बेटी ल जनम दीस। राजमहल म नंगाड़ा बाजे ले लगगे। तब सब ल पता चलिस के राजा घर बेटी के जनम होय हे, राजभर म सोहर गाय ले धरलीन। पुतरी के बिहाव के गोठ ह थिरा नइ पाय रहिस हे के रानी के गोद भरे महिमा गाय ले धर लीन। छट्ठी के नेवता म राज भर के मन उमड़ परीन। अक्ती के दिन रानी ह ऐलान कर दीस के गरीब बेटी-बेटा के बिहाव अउ अनाथ लइका मन के बर-बिहाव के जिम्मेदारी ओखर आय। अक्ती के तिहार म पुतरा-पुतरी के बिहाव बर घर-घर म होय ले धर लीस। घर के सुख-शांति बर अउ सुन्ना गोद ल भरे बर ये तिहार ह एक वरदान आय।
छत्तीसगढ़ के कई घर म तेलमाटी-चुलमाटी, भांवर सबो रस्म ल करथे। कई झन मन कारड घलो छपवाथें। घरोघर मड़वा गड़ियाथें आमापत्ता ले घर ल सजाथें। अउ चौंसेला, पूड़ी ले सबके नेवता करथे। टीकावन होथे सब झन खा पी के हँसी-खुशी घर लहुंटथे। ये पुतरा-पुतरी के बिहाव ह लइका सियान सबके आय।

-सुधा वर्मा

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Wednesday, February 4, 2009

कहिनी म नारी पात्र के सीमा रेखा - सुधा वर्मा

छत्तीसगढ़ी कहानी म नारी के रूप काय होना चाही। कहानी के नायिका, छत्तीसगढ़ के नारी के आदर्श होना चाही या प्रतिनिधि होना चाही? ऐखर मतलब होईस के घर, परिवार बर बलि चढ़गे या फेर शराबबंदी करवा के एक नेता के रूप म नाव कमा लीस। जेन नारी ह अपन गांव म सबके मदद करीस, शराबी पति के धोय-धोय मार खईस, बेटा के गारी खईस अउ दुनिया के आगू म एक आदर्श पत्नी या नारी बनके नाव कमइस। ये ह तो पहिली प्रश्न के उत्तर होगे। दूसर बात हे यथार्थ होना चाही। यथार्थ के कोनो सीमा नइए। हजारों तरह के घटनाक्रम होथे। दुनिया म कतेक अनहोनी भी होथे। एक दस साल के लड़की ह एक लड़का ल जन्म देथे, बिन बियाहे। एक सत्तर साल के आदमी ह सोलह साल के लड़की ले बिहाव करथे।
एक अस्सी साल के आदमी के 127 लइका हे, ये ह यथार्थ नोहय? नब्बे फीसदी कहानी यथार्थ आय। मोर सब कहिनी सच घटना ऊपर आधारित हे। स्थान अउ पात्र के नाम बदल गेहे। तीसर बात हे नारी समस्या अउ सामाजिक समस्या होना चाही। कहानी म ये होना चाही। एक घर के बेटी जिनगी भर बइठे रहि जथे बिहाव नइ होवय, काबर के ओखर ददा गरीब हे, लड़की सुन्दर, नइए या फेर घर म कोनो सियान नइए। ये ह समस्या नइए? एक नारी बिहाव होय के 2-3 साल बाद विधवा होगे, सब के नजर ओखर ऊपर हे। गांव के पुरुष प्रधान समाज म हर कोई ओला बदनाम करना चाहते। कुछ भी हो सकथे। कोई भी ओला रख ले या फेर इात बचाय बर वो ह कखरो खून कर दे, ये यथार्थ ह कामा आही। ये समस्या ह नारी समस्या आय, सामाजिक समस्या आय फेर जेन मन कहिनी ल अपन नजर म एक सीमा बांध के रखे हे तेखर नजर म ये कोनों समस्या नोहय। छत्तीसगढ़ के बहुत से नारी बाहिर ले आय मनखे मन के शारीरिक सोसन के शिकार होईस फेर ओखर सुनने वाला कोनो नइए।
लइकामन ल कोनो नई अपनइन। पुरुष तो अउ बिहाव कर लीस फेर नारी बदनामी ल माथ म लगा के जियत रहिस हे। तब समाज, पारा, गांव कहां गे रहिस हे। एक लड़का ओ नारी के हाथ थाम लीस। काय ये ह समाज सेवा नोहय? ओ नारी के मन म ओ पुरुष बर घृणा के भाव तो आबे करही। दूसर पुरुष ह ओखर से बिहाव करके ओला सम्मान दिस। आज ओखर परिवार म 3 लइका हे। काय येमा बिहाव करइया लड़का के आदर्श नई दिखय।
ये नारी के पीरा मोला हर दिन दिखथे। हर आहट म चौंक जथे। हिरनी कस चौकन्ना ये नारी दुलारी आय मोर बनके चंदैनी के मुख्य नारी पात्र। ये कहानी (लघु उपन्यास) बहुत चर्चा के आगे हे। सब अपन-अपन तरह ले विचार रखत हावंय। एक करोड़ कहानी के भाव अउ विषय भी एक करोड़ हावय। नारी के दर्द ल लिखना कहानी नइए। सायद ये कहिनी म एक वर्ग बिसेस ल बहुत तकलीफ होय हे। जेन मन नारी के इात करना नइ जानय, नारी ल सिर्फ भोग-विलास के साधन समझथे। दुलारी पात्र एक उच्च जाति के नारी आय, ये ह सत्य घटना हे। ये पात्र मोर सामने से अक्सर गुजरथे।
आज भी ओखर पहिली आदमी के लइकामन के प्रति दर्द ल मैं ह ओखर आंखी म देखथंव। हजारों कहिनी छत्तीसगढ़ी म छपे हे फेर ये बनके चंदैनी के अतेक चर्चा काबर?
कहानीकार के ठेकादार मन ल येखर दायरा बताना चाही। मन के भाव कलम के माध्यम ले कागज म उतरथे। येखर कोई सीमा नइए। मैं तो आज तक नइ सुने हंव के कहिनी में आदर्श अउ यथार्थ होना चाही। छत्तीसगढ़ के नारी समस्या अउ सामाजिक समस्या ऊपर ही लेखन करना हे सब लेखक मन कुंआ कस मेचका लिखत राहव अउ अपन आप म खुस होवत राहव। दूसर के लेखन ल बिना सोचे-समझे अउ पढ़े मीटर में नापे की जिनिस ल तराजू में तौलना गलत हे। आज पूरा छत्तीसगढ़ म इही होवत हावय। घूमत हे लेखन ह सिरिफ छत्तीसगढ़ म। छत्तीसगढ़ महतारी अउ हमरे गांव गंवई ल लिखत रहिहू त भासा के विकास कहां ले होही। मनखे ह चांद म पहुंचगे, भारत के झंडा ह चांद म लहरागे अउ तुमन अपनेच्च कुंआ म हावव।
कुछु बाहिर के लिखव, जेन ल हमर गांव म रहइया भाई-बहिनी मन पढ़य अउ दुनिया ल जानय। एक गांव के बाहर हजारों तरह के घटना होय हे। दुलारी कस कतको नारी घूमत हांवय। हमर राज के सैकड़ों डॉक्टर, इंजीनियर अमरीका तक पहुंच गे हावय, ओखरों लइका मन बिहाव के लइक होगे हावंय। इहू ल जानव। ईमान के सीमा खतम होगे हावय, तब काय तुमन मन के भाव ल सीमा म बांधना चाहत हव।

-सुधा वर्मा

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Tuesday, February 3, 2009

वर्तमान ह सच आय - सुधा वर्मा

आज के समय म वर्तमान म जियइया मनखे कमती देखे बर मिलथे, सब बड़े-बड़े सपना ले के चलत हावंय अउ वो सपना म अपन वर्तमान ल खतम करत हावंय। कई झन लइका मन डॉक्टर इन्जिनियर बने के चक्कर म बारवीं के रिजल्ट ल खराब कर देथें अउ ड्राप ले के दू-तीन साल तक परीक्छा देतेच्च रहिथें, कखरो चयन हो जथे, कतको झन रुक जथें। सपना ह सपनाच्च रहि जथे।
बहुत दूरिहा के सोचबेत अइसने होथे। मनखे ल अपन वर्तमान ल देखना चाही, उही म जीना चाही। कहिथे न ''सरग देख के गगरी फोरत हे'' हाना ह अइसने नइ बने हावय। बदली ल देख के बरसात आगे कहिके हंड़िया ल फोर देथें। फेर बरसात ह दूरिहा रहिथे। थोरक वर्तमान के बारे म सोचतिन त जुड़ पानी घलो मिलतिस, बरसात के आत ले तो रुकना चाही। बड़े-बड़े सपना देख-देख के आज के युवा मन बेरोजगार होवत जात हें। अपन आस-पास ल देखव अउ जेन जगह मिलय उही जगह सिक्छा प्राप्त करव। वइसने जेन जगह नौकरी मिलत हावय उही ल पहिली अपनावव बाद म थोरिक ऊपर चघव। धीरे-धीरे अपन आप ऊंचाई म पहुंच जहू। वर्तमान ह सच आय उही ल अपनावव।

-सुधा वर्मा

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Monday, February 2, 2009

गुरतुर गोठ

आज येदे चार महीना पुर गे हमर गुरतुर गोठ म गोठियावत । हम हर हाल म येला सरलग राखे के कोसिस करबोन । संगी हमर सबले बढे समस्‍या हे रचना मन ला टाईप करे के, हमन अपन काम धाम म अतका बिपतियाये रहिथन कि येखर बर टेम नई निकाल पावन ।


गुरतुर गोठ के कोनों पाठक यदि हमला रचना मन के टाईपिंग म बिलकुल निस्‍वार्थ सहायता कर सकत होवंय त हमला मेल करंय । थोरे थोर सहजोग ले हमर भाखा के उपस्थिति इंटरनेट म बने रहिही ।

रचना भेजईया रचनाकार मन ले विनती हे कि धीरज रखंय, आपके भेजे रचना मन जरूर येमा छपही, जईसे जईसे रचना मन टाईप होवत जाही हम येमा प्रकासित करत जाबोन, आपो मन ले अनुरोध हे कि रचना ला कम्‍यूटर टाईप करवा के सीडी म भेजहू, सीडी म भेजे रचना मन ला हम तुरते प्रकासित कर सकबोन ।



संजीव तिवारी

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संगी मन अपन ब्‍लाग में 'गुरतुर गोठ' के लिंक लगा के छत्‍तीसगढी के परचार करैं

CG Blogखाल्‍हे म देहे कोड ल एचटीएमएल एड कर के अपन ब्‍लाग म लगाये के किरपा करहू

आपके रचना के सुवागत हे

छत्‍तीसगढी भाखा के जम्‍मो परेमी मन ला जय जोहार ! मेकराजाला के ये पतरा म छपवाये खातिर आप अपन अउ संगी-साथी के छत्‍तीसगढ़ी म लिखे रचना हमला tiwari.sanjeeva एट द gmail.com
या रचना के सीडी -
संजीव तिवारी
ए-40, खण्‍डेलवाल कालोनी,
दुर्ग (छ.ग.)
के पता मा पठो सकत हौ.

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