छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

घर-आँगन मा दिया बरे, तब मतलब हे। अँधियारी के मुँहू टरे, तब मतलब हे।। मिहनत के रोटी हर होथे भाग बरोबर, जम्मो मनखे धीरज धरे, तब मतलब हे। दुनिया कहिथे ओ राजा बड़ सुग्घर हे, दुखिया मन के दुख हरे, तब मतलब हे। नेत-नियाव के बात जानबे तब तो बनही अतलंग मन के बुध जरे, तब मतलब हे। सबके मन मा हावै दुविधा ‘बरस’ सुन ले, सब के मन ले फूल झरे, तब मतलब हे। बड़=बहुत;नेत-नियाव =नीति, अतलंग=उपद्रवी, बुध=बुद्धि। बल्‍दाउ राम साहू [responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]

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नवरात मा दस दोहा

1~भक्ति भाव भक्कम भरे, बंदन बदन बुकाय। राम-राम बड़ जीभ रटे, छूरी पीठ लुकाय। 2~ चंदन चोवा चुपर के, सादा भेस बनाय। रंगरेलिहा मन हवै, अंतस जबर खखाय। 3~जप-तप पूजा पाठ ले, नइ छूटय जी पाप। मन बैरागी जे करय, वोला का संताप। 4~ माया मोय मा मन रमे,भगवन मंदिर खोज। अंतस अपने झाँक ले, प्रभू दरस हे रोज। 5~ नौ दिन देवी देहरी, भंडारा दिनरात। लांघन महतारी मरे, कइसे बनही बात। 6 ~देवी सेवा जस करे, करथे कैना भोज। महतारी के कोख मा, बेटी हतिया रोज। 7~तन ला तपसी…

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