सरगुजिहा लोक गीत – जाड़ा

हाय रे जाड़ा हाय रे जाड़ा ऐसो एतेक बैरी हो गे ठिठुरत हवे हाड़ा हाय रे…….. भिनसारे गोदरी में दुबके सूते रहथो, कईसे उसरी काम बूता मने मने कहथो, अकड़ल हाथे हाय रे दाई कईसे झाड़ो,आंगन बाड़ा हाय………. हालू हालू उसरा के बूता घामा तापत रहथों, जीते जायल घामा उते खटिया खींचत रहथों, छिंड़हा कांचे जाथो त पानी हर लागे कारा हाय रे………। जईसे जईसे सांझ होते थर थर कांपे लगथन, गोरसी ला जराए के जम्मो लिघे बईठे रहथन, दोना पतरी खिलत रहथों कोन मांजे भाड़ा हाय रे जाड़ा हाय…

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रासन कारड

ऊंखर जउंहर होय, मुरदा निकले, खटिया रेंगे, चरचर ले अंगुरी फोरत बखानत रहय। का होगे या भऊजी, काकर आरती उतारत हस, राम राम के बेरा। नांगर धर के खेत रेंगत पूछत रहय छन्नू अपन परोसीन ल। चुनई लकठियाथे तंहंले कइसे मोहलो मोहलो करथे किरहा मन। तेंहा परिवार के मुखिया हरस कहिके, मोर नाव ले रासन कारड बना दीन। खुरसी पइन, तंहंले कारड निरस करत हे बइरी मन। आहू, ये पइत वोट मांगे बर, तुंहर पुरखा नी देखे होही ततका देखाहूं। भऊजी के गारी बखाना अतरीस त, छन्नू समझावत कहिस –…

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