छब्बीस जनवरी मनाबो “

छब्बीस जनवरी मनाबो संगी ,
तिरंगा हम फहराबो।
तीन रंग के हमर तिरंगा,
एकर मान बढाबो ।
ए झंडा ल पाये खातिर ,
कतको जान गंवाइस।
कतको बीर बलिदानी होगे ,
तब आजादी आइस ।
हमर तिरंगा सबले प्यारा ,
लहर लहर लहराबो।
छब्बीस जनवरी मनाबो संगी ,
तिरंगा हम फहराबो।
चंद्रशेखर आजाद भगतसिंह ,
जनता ल जुरियाइस।
वंदे मातरम के नारा ल ,
जगा जगा लगाइस ।
सुभाष चंद्र बोस ह संगी ,
जय हिन्द के नारा बोलाइस।
आजादी ल पाये खातिर ,
जनता ल जगाइस ।
वंदे मातरम के गाना ल ,
मिलके सब झन गाबो ।
छब्बीस जनवरी मनाबो संगी ,
तिरंगा हम फहराबो।
सत्य अहिंसा के बात ल ,
गांधी बबा बताइस ।
स्वदेशी अपनाये खातिर ,
चरखा खूब चलाइस ।
देश ल आजाद करे बर ,
सत्याग्रह अपनाइस ।
गाँव गाँव में जाके ,
आजादी के अलख जगाइस ।
कतका दुख ल पाइस सबझन ,
कइसे हम भुलाबो ।
छब्बीस जनवरी मनाबो संगी ,
तिरंगा हम फहराबो।।

प्रिया देवांगन ” प्रियू “
पंडरिया (कवर्धा )
छत्तीसगढ़
Email — priyadewangan1997@gmail.com

रचनाकार नें जो अल्‍प विराम का प्रयोग किया है, उस पर ध्‍यान दें। अल्‍पविराम का गलत प्रयोग हुआ है या छत्‍तीसगढ़ी में अब अल्‍प विराम का ऐसा ही प्रयोग हो रहा है। इस पर विमर्श के उद्देश्‍य से हमने जैसी रचना रचनाकार नें हमें प्रेषित किया है, उसे ज्‍यों के त्‍यों प्रकाशित कर रहे हैं। – संपादक




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