अभी के समें अउ साहितकार





हमर देस ह संचार माध्यम के अतका बिकास करे ह हे जेकर बखान करना मुसकुल हे। संचार माध्यम म बिकास होय ले नुकसान जादा अउ फायदा कम दिखथे। मोबाइल अउ टीवी चैनल ह मनखे के जिनगी के रफ्तार ल बढादीस। मोबाइल आय ले चिट्ठी-पतरी लिखे बर मनखे भुलागे। इहां तक हमर साहित्य के छेत्र ह दिनोंदिन कमतियावत हे। आज के लइकामन मन साहित्य ले दूरिहावत हें। मोबाइल अड टीवी म अतेक भुलावय हावय के साहित्य लिखे-पढे छोड्त हें। चार दिन के जिनगी म मनखे ल थोरबहुत चैन से जिनगी जीना चाही। हाय-हाय तो जीयत भर लगे हे। फेर, ये संचार के विकास ह सबझन ल व्यस्त कर देहे। काकरो तीर बोले-बतियाय के बेरा नइये। आज के लइकामन ल दाई-ददा, संगवारी मन ल चिट्टी-पतरी लिखे बर कहि देबे त नइ लिखंय। पहिली के जमाना म डाकबाबू के अगोरा अइसे करंय, जइसे अमरित मिलइया हे।

अब तो मोबाइल म दू सेकंड बात करले, बस। सियान मन के कहिना सच निकलगे। वोमन काहंय के एक समे अइसे आही जब गोठ-बात करे बर पइसा देबर परही। मोबाइल आय ले आज वोहा सहिच होगे। संचार माध्यम बाढे ले कुरीति घलो बाढगे। फोकट के फोन करके परेसान करथें। टीवी चैनल के सेती तो मनखे मन के सुवास्थ म बुरा असर पड्त हे। पहिली टीवी नइ आय रिहिस त मनखेमन रातकुन जे-खाय के टहलें। संगी-संगवारी मन संग बइठ के गोठियांय-बतरांय। ये सब खतम होगे। भोजन करके टीवी देखथे अउ सुत जथें। ऐकर सेती सुवास्थ बिगड्त हे।

जमाना के मुताबिक मनखे ल चलना जरूरी हे। ऐला कोनो नई बदल सकय। तभो ले जुन्ना समे, साहित्य अड साहित्यकार मन के सुरता आथे। साहित्य के उत्थान जरूरी हे। पढे-लिखे मनखे मन ल बने साहित्य पढना चाही, ऐकर से मन बने रहिथे। चिंतन करे के मठका मिलथे। लिखे के प्रेरना मिलथे।

प्रदीप ताम्रकार ‘साहित्यचार्य’
धमधा (दुर्गा)



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