अपन-अपन भेद कहौ, भैरा मन के कान मा

अपन-अपन भेद कहौ, भैरा मन के कान मा।
जम्मो जिनिस रख देवौ, ओ टुटहा मकान मा।

झूठ – लबारी के इहाँ नाता अउ रिस्ता हे,
गुरुतुर-गुरुतुर गोठियावौ,अपन तुम जबान मा।

थूँके-थूँक म चुरत हे, नेता मन के बरा हर,
जनता हलाकान हो गे , ऊँकर खींचतान मा।

कऊँवा, कोयली एक डार मा, बइठे गोठियावै,
अब अंतर दिखथे मोला, दुनो के उड़ान मा।

गाँव के निठल्ला मन अब भले मानुस हो गे,
लिख दे पुस्तक जम्मो, ‘बरस’ उनकर सनमान मा।

भैरा= बहरा , जिनिस=वस्तु, टुटहा =टूटा हुआ, डार= शाख , गुरुतुर =मिठास से युक्त, हलाकान = परेशान।

बलदाऊ राम साहू

संघरा-मिंझरा

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