आठे कन्हैया

हमर भारत देस ह देवता मन के भुइंया हे येखर कोना-कोना पुण्य भुंईया हेे। इहां पिरीथिवी लोक म जब-जब धरम के हानी होवत गईस तब-तब भगवान ह ये लोक म अवतार लिहीस। भगवान सिरी किसन जी ह अरजुन ल कुरूक्षेत्र म भागवत गीता के अध्याय 4 के स्लोक 7 अउ 8 म उपदेस देवत कईथे के-
यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। 4-7।।

परित्राणाय साधूनामं विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।। 4-8।।

येखर मायने ये हावय के भगवान किसन कईथे के जब-जब भारत म धरत के हानि हो ही। तब-तब मैय ह अपन आप ल सिरिजन करहूॅं। सज्जन मन के रक्छा करे बर, दुस्ट मन के बिनास करे बर। अउ धरम के इस्थापना करे बर मैं जुग-जुग म जनम लेथव।
आठे कन्हैया वई दिन ये जे दिन भगवान सिरी बिसनु जी किसन जी के रूप अवतार ले रहिस। भादो महिना के घोर अंधियारी पाख के आठे तिथि म घनघोर बादर मन बरसत रहिस अउ ओ दिन कंस के कारागार म भगवान किसन के रूप म किसन भगवान ह अवतरे रहिस। माता देवकी अउ बासुदेव के बेटा बनके। येखरे कारन ये दिन ल हम हिंदू मन जन्मास्टमी या आठे कन्हैया के रूप म मनवात आवथन। भगवान बिसनु के किसन के रूप अवतार लेहे के परमुख कारन रहिस अधरमी कंस के बध। भगवान किसन के अवतरे के तुरते बासुदेव जी जमुना नदी ल पार करके गोकुल म नंद बाबा- देवकी के इहां छोड़ आथे।
ये दिन पूरा भारत देस म आठे कन्हैया के तिहार ल मनाये जाथे पर मथुरा जिहां भगवान सिरी किसन जी के जनम हो रहिस तिहां आठे कन्हैया तिहार ह बिसेस रईथे। ये दिन पूरा मथुरा नगरी ल फूल माला ले सजाये रईथे। भजन कीरतन रतिहा ले के दूसर दिन तक चलत रईथे।
जिहां-जिहां भगवान सिरी किसन जी के मंदिर हवय उंहा-उंहा ये दिन मेला भरथे। अउ गांव ले लेके सहर तक म मटकी फोड़े के परतियोगिता रखे जाथे।
बरज भुइंया म अस्टमी के दूसर दिन याने भादो के अंधियारी पाख के नवमी तिथि के दिन नंद महोत्सव बड़ धूम-धाम से मनाये जाथे। ये हू दिन मटकी फोड़ परतियोगिता रखे जाथे।
किसन भगवान के वईसे कई नाव हावय पर माखनचोर, नंदकिशोर, बंसीधर, कन्हैया, मुरलीमनोहर, योगेश्वर, मोहन, राधे मन जादा बोले जाथे।
हिंदी साहित्य म किसन भगवान- हिंदी साहित्य के इतिहास घलो म भक्तिकाल म सगुन भक्ति धारा के किसन भक्ति साखा के परमुख कबि सूरदास जी रहिन इंखर अलावा रसखान अउ मीरा बाई घलो किसन भगवान के भक्त रहिन।
सूरदास जी ह भगवान किसन के परति माता यशोदा के वात्सल्यता बाललीला के एतका बिसद बरनन कर देहिस के इंखर पहिली हिंदी साहित्य म नव रस रहिस पर इंहे ले दसवां रस वात्सल्य रस अस्थापित होगे तब ले हिंदी साहित्य म दसवां रस वात्सल्य रस होगे। सूरदास जी के रचना के उदाहरन देख सकत हन-
मैंया मैं तो चंद खिलौना लैहौं।
जैहांे लोटि धरनि मैं अबहि तेरी गोद न ऐहौं।
सुरभि का पयपान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहांे,
हृै हौ पूत नंदबाबा को तैरो सुत न कहैहौं।

रसखान कबि घलो किसन भगवान के भक्त रहिन। उहू ह किसन भगवान के बाललीला म उंखर बचपना के बड़ सुघ्घर बरनन करे हावय।
धूरि भरै अति सोभित श्याम जू तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अंगना पग पैंजनी बाजती पीरी कछौटी।
वा कवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोठी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सौं ले गयो रोटी।

मीरा बाई के किसन भक्ति तो जग बिख्यात हावय। उहू ह पूरा जीवन किसन भक्ति म बिता दिहिस। वो ह अपन रचना म लिखथे-
पायो जी मैने नाम रतन धन पायो।
बस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो।
जनम-जनम की पंूजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।
सम की नाव खेवहिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस गायो।

ये परकार ले देखा जाये त किसन भगवान के भक्ति घलों चहूं दिसा म होथे। जगतगुरू किसन भगवान के अवतार लेहे के दिन ह पूरा बिस्व म आनंद मंगल के संदेस देथे।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

संघरा-मिंझरा

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