भाखा के महमहई बगरावत छत्तीसगढ़ी पत्रिका : बरछाबारी

Barchhabariछत्तीसगढ़ी भाखा के साहित्य ला चारो खूंट बगराए खातिर नवा प्रदेस म छत्तीसगढ़ी के मान रखइया संगी मन अपन अपन डहर ले सुघ्घर उदीम करत हांवय. अइसनेहे चौमासा पतरिका ‘बरछाबारी’ ला सरलग निकाल के भाई चंद्रशेखर ‘चकोर’ ह हमर भाखा के असल सेवा करत हांवय. ‘बरछाबारी’ के अंक मोला चकोर जी ह भाई जयंत साहू जी के रसदा देखाए के पाछू सरलग भेजत हांवय. ‘बरछाबारी’ के अंक डाक ले मिलतेच जम्मो ला लउहे पढ़ डारत रेहेंव अउ मन म रहय के ये पतरिका म संघराए रचना मन के उप्पर दू आखर लिख के भेजंव फेर कभू नइ लिख पायेंव. अभीन ‘बरछाबारी’ के मई—अगस्त अंक मिलिस त तुरते ताही येला पढ़ेंव, गुनेंव अउ उदीम करेंव के रचना मन मोला कइसे लागिस ये बात ला लिखंव. त इही खातिर अपन मन के बात आप सब मन मेर बांटत हांवव.
सुन्दर रंगीन चिक्कन पाना म छत्तीसगढ़ी के गज़लकार स्व.बसंत देशमुख ‘नाचीज़’ के फोटू ल देख के देशमुख जी के गज़ल संग्रह ‘अलवा जलवा’ के छत्तीसगढ़ी गज़ल मन के सुरता आगे. आघू के पाना मन म भाई चंद्रशेखर ‘चकोर’ जी के संपादकीय ‘छत्तीसगढ़ी भाखा के मानक पईली’ म छत्तीसगढ़ी के मानकीकरन बर होवत चोचला हा उजागर होए हे. मानक सबद मन बर उमन अपन बिचार सरल उदाहरन ले समझाए हावंय, टोन के उप्पर जउन बात ल उमन उठाए हावंय तउन ह सिरतोन बात आए. मानकीकरन बर बिना सोंचें समझे, अभी कछोरा भिरे, कम्मर कसे के जादा उदीम करई बने नइ हे. हमर भाखा धीरे धीरे अपन मानक रूप ला खुदे धर लीही. संपादकीय म चकोर जी के भाखा खातिर पीरा ह उफल के दिखत हावय, हमला उंखर बात ले सीख लेना चाही.
पतरिका म छपे पहिली बियंग डॉ.राजेन्द्र पाटकर ‘स्नेहिल’ के ‘चलव चली ससुराल’ हे. लेखक ह दमांद के रूप म समाज के मनखे मन के अती उप्पर अपन कलम चलाये हावंय. हमर मयारूक परम्परा के संगें संग हमर समाज म बेटी के मया अउ ओखर आघू के दिन ला चतवारे खातिर दाई ददा मन दमांद ला मान देथें. दमांद के जम्मो सही गलत मांग ल दाई ददा पूरा करथे, अउ दमांद मन हमर मया पीरा ला कुचरत हमर सिधवई के मजा उड़ाथें. लेखक ह समाज के ये सोंच के बढ़िया खबर लेहे हे. मोर सोंचती म लेखक ह बियंग म आए सबद ससुराल ला फरियाये खातिर हमर मूल सबद ससुरार के हिन्दीकरन कर देहे हे तउन ह एके नजर म खटकथे.
दूसर बियंग गणेश साहू जी के ‘इमानदारी ह गारी कस लागथे’ म लेखक ह अभीन के समाज म इमानदारी ल तराजू म राख के परखर तउले हावंय. ऐमा बियंग के गुन कम हावय अउ सिखावन जादा हावय तउन ला देखत ये ह असल म आलेख आए जउन ला बियंग लिख देहे गए हे. लेखक ह समाज उत्थान के सुघ्घर गोठ लिखें हावंय जउन ह बिना तुतारी कोंचे, सोझे सोझ हमर बिचार ल परभावित करत हावय.
तीसर बियंग धर्मेन्द्र निर्मल के ‘बंचक बेगम मेड़वा गुलाम’ म लेखक ह सुघ्घर बिम्ब के परयोग करे हावंय. अभी के देस प्रदेस के दसा ला देखत लेखक ओखर समाज के उप्पर परत परभाव बर संसो करत हावंय. उंखर मन म ये बिवस्था बर रंज हावय, उमन समाज ला बदलना चाहत हें. बियंगकार के कलम म उंखर सोंच परखर दिखत हावय. बियंगकार ला अभी अउ लिखे पढ़े के उदीम करना चाही, अपन कलम म अउ धार टेंना चाही. ये बियंग म उमन अपन बात ला अतिकहा लमा डारे हावंय तेखर सेती बियंग के मार ह पाछू म आके भोथरा गए हे. बियंग के सुरू म जउन सबद के तीर चले हावय तउन ला आखिर तक बिना छरियाये, पक्का निसाना म गोभाए तक ले बनाए राखे के उदीम करना चाही. धर्मेन्द्र जी के लेखनी के महमई अभी अउ बाढ़ही, ये बढ़िया उदीम बर धर्मेन्द्र जी ल मोर असीस.
तीसर बियंग, गुनान के रूप म छत्तीसगढ़ी साहित्य के माई मूड़ बड़े भाई रामेश्वर वैष्णव जी के ‘छत्तीसगढ़ के नाम म नौटंकी’ छपे हावय. येमा छत्तीसगढ़ी के नाव ले के होवत सरकारी उदीम उप्पर जोरदरहा लबेदा रामेश्वर जी ह मारे हावंय. बिना लाग लपेट सोझे सोझ गोठ कहत रामेश्वर जी ह छत्तीसगढ़ी भाखा के जम्मो पागा बंधईया मन ला कटघरा म खड़ा कर देहें हावंय. ये बात तो सिरतोन हावय के जनता अब ये नौटंकी ला समझ गए हावय, अब चमचागिरी के ददरिया ला बिसराये के दिन लकठियावत हे. अब जादा दिन नइ हे जब साहित्य के महंत मन के मठ ला नवा लिखइया मन अब भोसकाहीं.
पतरिका म छपे कहिनी मन म विट्ठल राम साहू ‘निच्छल’ के नान्हें कहिनी ‘निरासरित आसरम’ म सहरी परम्परा कइसे छत्तीसगढ़ म कलेचुप घुसरत हावय तउन ला बताये हावय. डोकरी दाई ददा ला निरासरित करे के उदीम ल बियंग के भाखा म बतावत ये किस्सा म समाज सिक्छा के सुघ्घर संदेसा हावय.
चंद्रशेखर ‘चकोर’ जी के कहिनी ‘भूलेसर देव’ एक बियंग मिझरा कहिनी आए. चकोर जी लोकनाट्य के जानकार हें, उमन जानथें के कहिनी कइसे पढ़े के भूख बढ़ावत आघू डहर रेंगथे. कइसे ओखर भाखा, बोली, मुहा चाही अउ घटना म पाठक के चिभिक बने रहिथे. ये बात के असल चिन्हारी चकोर जी के रचना मन म दिखथे. ये कहिनी म चकोर जी ह राजनीति के हाथ म कठपुतरी बने तुलसीराम अउ रामसरन जइसे हमरे बीच के पंचन मन के मन म दूसर मनखे के बढ़ोतरी बर उबजत जलन ला बताये हावंय. इन दूनों असल छत्तीसगढ़िया नंदू भालेसर के मन ला भरमा देथें, जात पात अउ अपन बिरान के भाव ओखर मन म जगा देथें. आज के समें म अइसनेहे होवत हे, छत्तीसगढ़ जात पात के राजनीति म फदक गए हे. अपन असल चिन्हारी ल भुला के मनखे अपन जात देव के जलसा जुलुस म भुला गए हें. छत्तीसगढ़ी समाज के एकता के संदेसा देवत ये कहिनी बर चकोर जी ला बधई.
भागवत कश्यप ‘रसवंत’ के कहिनी ‘सेवा ले मेवा’ म लेखक ह पटकथा लिखे कहूंक सुघ्घर समे के बरनन करे हें. कहिनी म जात पात के बंधना ला टोर के समाज सुधार के संदेसा देहे हे.
अनिल जांगड़े ‘गौतरिहा’ के कहिनी ‘मनसा पाप’ म कहिनी के सुरू ले आखिर तक कथा के लय सरलग बोहावत धार कस लागथे अउ इही ये कहिनी के असल चिन्हारी आए.
आलेख ‘जेखर नांव बरतिया’ म गौकरण जांगड़े ह वाजिब सवाल उठाए हें. आघू के पाना मन म हमर भाखा के माई मूड़ बड़े भाई जागेश्वर प्रसाद जी के लेख ‘एम.ए. छत्तीसगढ़ी पढ़ई ले रोजगार के रसदा खुल गे’ म पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के नवा पढ़ई एम.ए.छत्तीसगढ़ी के पढ़ई के पाछू पढ़ईया मन बर रोजगार के खुलत रसदा ला बने फलियार के बताये हें. भाई चंद्रशेखर चकोर जी के संस्कृति अउ इतिहास आलेख ‘पाहट, बरदी अउ टेंचा’ ल पढ़ के हमला अपन गॉंव के दिन सुरता आगे, हम उंखर आलेख के एकक सबद ल जीये हन. हम आजो सहर म रहत उही गॉंव ल सोरियाथन, अउ उपर वाला के असीस हे के हमर गॉंव म आजो ये तीनों के महमहई बगरे हे. जउन मन गॉंव ला जीयेच नइ हे अउ सहर म रहि के छत्तीसगढ़ी संस्कृति के गियाता बने हें तउन मन ल चकोर जी के गजट म छपत संस्कृति अउ परम्परा के अइसन आलेख मन ला पढ़ना चाही. चकोर जी के आलेख मन म गॉंव साक्छात आंखी के आघू आ जाथे.
ये पतरिका के कबिता मन म सबले सुघ्घर कबिता मोला कु.सदा नंदिनी वर्मा के कबिता ‘मोर मन के पीरा’ ह लागिस. ये कबिता म नारी के दुख के बरनन होए हे, कबिता के सबद मन म माई लोगन के सरी उम्मर के पीरा उबक के आघू आए हे. ये कबिता अपन उपरछंवा अरथ के संगें संग सीख तको देथे के नारी ल पढ़ावव लिखावव अउ आघू बढ़ावव. ओला लउहे कखरो कोठा के गेरूआ म झन बांधव. सदा नंदिनी वर्मा ल मोर असीस.
पतरिका म छपे कबिता मन म अंजनी कुमार ‘अंकुर’ के कबिता ‘ये खेत ह सिरिफ ओ किसान के’ म किसान के पीरा गजब के उदगरे हे, संगी अपन कलम ल थोरकुन अउ मांज, तोर बात म दम हे, आगी हे. साहित्यकार प्रदीप वर्मा जी के कबिता ‘भोड़कू पईसा’ ह मंहगई के पीरा संग नंदावत जिनिस के सुरता देवाथे. बहुरे दिन के गोठ ला सोरियावत कवि ह अभी के हाल उप्पर बने तुतारी कोंचके हे. सुशील भोले ह अपन कबिता ‘अजब तोर माया हे भगवान’ म हमर छत्तीसगढ़ के मनखे के सामरथ ला जगावत हें. थानुराम निषाद ‘अकेला’ ह अपन कबिता ‘भाखा’ म भाखा के नवां अंजोर बगरावत हें. प्रदीप कुमार देशमुख ह कबिता ‘जागो ग किसान’ म किसान मन के जागरिती के गोठ गोठियावत हें. संगें संग अपन चिन्हउ अंदाज म चरगोड़िया लिखईया रघुवीर अग्रवाल ‘पथिक’, पुरसोत्तम सिंह राठौर, डॉ.गजेन्द्र कुमार अग्रवाल, श्रीमती गीता विश्वकर्मा, जयंत साहू, आनंद तिवारी ‘पौराणिक’ के रचना मन अउ मुहा चाही म चकोर जी के मुकुन्द कौशल जी संग गोठ बात, चिन्हारी म स्व.गजानन प्रसाद देवांगन के ‘धरती के गीत’, घलव बने लागिस.
आज छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन घलव एक दूसर के टांग खींचत हावंय, अपने अपन बड़ई करत हावंय, कोनों ल पंदोली देवई तो दूरिहा काखरो बढ़ोतरी म जरमरा जात हांवय. अइसे समे अउ बाढ़त मंहगई म घलव छत्तीसगढ़ी भाखा के सेवा खातिर निसुवारथ अतेक सुघ्घर पतरिका निकाले बर चंद्रशेखर ‘चकोर’ जी ला गोना गोना बधई.

संजीव तिवारी
संपादक: गुरतुर गोठ डॉट कॉम

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