बसंत पंचमी अउ ओखर महिमा

बसंत पंचमी हमर हिंदूमन के तिहार म ले एक बिसेस तिहार हे। ये दिन गियान के देबी दाई माता सरस्वती के आराधाना करे जाथे। भारत अउ नेपाल जेहा पहिली हिंदू देस रहसि, म बछर भर ल छै भाग म बांटे गे हे। येमा बसंत रितु सबसे सुखद रितु हे। जब परकिरिती म सबो कती नवसिरिजन अउ उल्लास के वातावरण होथे। खेत म सोना के रूप म सरसों के फूल चमके लगते। गेंहूॅं अउ जौ म बाली आ जाथे। आमा के रूख म बउर लग जाथे अउ उपर ले कोेयली के मीठ तान मन ल सुघ्घर लगे लगथे। टेसू, सेम्हर अउ गुलमोहर के चटक लाल रंग ह सब जीव ल अपन कति खींचे लगथे। महुआ के फूल के सुगंध वातावरण म सब्बो जीव ल मदमस्त करे लगथे। वातावरण म सबो कती नाना परकार के फूल खिले के कारन परकिरिती म सुघ्घर हवा चले लगथे अउ भवंरा के भनन-भनन के नाद निक लगे लगथे। जेखर ले मानव जाति के जीवन म नया उल्लास छा जाथे। बसंत पंचमी माघ महिना के सुुक्ल पछ के पंचमी के मनाये जाथे, जेखर कारन ये तिहार ल हमन बसंत पंचमी के नाव ले घलो जानथन। बसंत रितु के आतेच परकिरिती के कोना-कोना खिल जाथे। सब्बो जड़-चेतन समुदाय उल्लास ले भर जाथे। स्कूलों म घलो लईकन मन माता सरस्वती के पूजा-अरचना करके बिद्या के बरदान मांगथे। माता सरस्वती के पूजा बर लईकन मन के उत्साह ह देखत बनथे।
परकिरिती म हर ओर एक नया उमंग,उत्साह अउ नव सक्ति के संचार होय लगथे। परकिरिती के ये उत्सव म समाये संदेश हमर जीवन म घलो सकारात्मकता भर देथे। आवश्यकता ये बात के हेै कि हममन परकिरिती के पास कुछ समय बितावन अउ अपन जीवन ल घलो आनंद,उमंग और उल्लास ले भर देवन।
भारत म जुन्ना समय ले ही ये दिन भारत के मनखेमन, गियान अउ कला के देवी दाई मॉं सरस्वती (सारदा) के पूजा कर ओखर करा अउ जियादा गियानी होये के बरदान मांगथन।
पउरानिक महिमा- भगवान सिरीराम बसंत पंचमी के दिन अपन भाई लछमन के साथ (बनवासकाल) के समय हमरे छत्तीसगढ़ परेदस के जांजगीर जिला के सिवरीनानायन म माता सबरी के कुटिया म पहुंचे रहिस। अउ ओखर जूठा बोईर ल बड़ा परेम भाव के साथ खाये रहिस।
ऐतिहासिक रूप ले – कहे जाथे के पिरिथिवी राज चउहान ह बिदेसी आक्रमणकारी, आतातायी मोहम्मद गोरी ल सोलह बार हराये रहिस पर सत्रहवां बार पिरिथिवी राज चउहान ह हार गईस त मोहम्मद गोरी ओला अफगानिस्तान कैद करके अपन गोर देश लेगईस अउ ओखर आंखी ल फोड़ देहे रहिस। पिरिथिवी राज चउहान ह राजा दसरथ के बाद एक अइसे राजा रहिस जे ह सब्द भेदी बान चलाये के कला जानत रहिस। मोहम्मद गोरी ह ओखर से ये कला ल सीखना चाहत रहिस अउ ओखर कला के परदरसन करवाये के खातिर अपन सामने ओ कला ल दिखाये बर पिरिथिवी राज चउहान करा कईथे त पिरिथिवी राज चउहान के दरबारी कबी अउ ओखर दोस्त चंदबरदाई ह दोहा पारथे-

चार बांस चउबीस गज, अंगुल अस्ट परमान।
ता ऊपर सुल्तान हे, मत चूक चउहान।।

त पिरिथिवी राज चउहान ह अपन सब्द भेदी बान ल चला देथे। वो 1192 ई. के दिन ही बसंत पंचमी के तिथि रहिस अउ ये तिथि के दिन ही पिरिथिवी राज चउहान अउ ओखर राजकवि चंदबरदाई एक-दूसर ल छुरा घोप कर आत्मबलिदान हो गे रहिस।
साहित्यिक महिमा- बसंत पंचमी की तिथि 28 फरवरी सन् 1899 के दिन हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार अउ छायावाद के चारा आधार इस्तंभ म ले एक पं.सूर्यकांत त्रिपाठी ‘‘निराला‘‘ जी के जनम हो रहिस। निराला जी के मन म गरीब मन के परति अपार परेम अउ पीड़ा रहिस। वो ह अपन पईसा अउ कपड़ा-लत्ता ल खुले मन ले गरीब मन ल दे डालत रहिस। ये कारन से लोगनमन उनला महाप्राण कहत रहिस।
हिंदी साहित्य म सेनापति जी घलो बिसेस इस्थान रखथे। हिंदी साहित्य म उंखर योगदान ल भूलाय नई जा सके। सेनापति जी ह अपन रचना रितु बरनन म बसंत रितु के बड़ा ही मनोहारी बरनन करे हे। ओहा परकिरिती के उपादान ल लेके मानवीकरण अलंकार के बहुत ही मनोरम चित्र खींचे हे। ओहा अपन ये कविता म बसंत ल रितु के राजा बता अपन चतुरंगिनी सेना के साथ बवात बहुत ही सोभायमान लगत हे।
जईसे उखर रचना म –

बनन-बरन तरू फूले उपवन-वन,
सोई चतुरंग संग दल लहियतु है।
बंदी जिमी बोलत विरद वीर कोकिल है,
गुंजत मधुप गान गुन गहियतु है।
आवे आस-पास पहुपन की सुवास सोई,
सोने के सुगंध माझ सने रहियतु है।
सोभा को समाज सेनापति सुखसाज आजु,
आवत बसंत ऋतुराज कहियतु है।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल‘
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला -जांजगीर चांपा (छ.ग.)

संघरा-मिंझरा

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