बसदेव गीत : भगवती सेन

सुन संगवारी मोर मितान, देस के धारन तंही परान
हरावय करनी तोर महान, पेट पोसइया तंही किसान
कालू बेंदरुवा खाय बीरो पान, पुछी उखनगे जरगे कान
बुढवा बइला ल दे दे दान, जै गंगा…
अपन देस के अजब सुराज
भूखन लांघन कतको आज
मुसुवा खातिर भरे अनाज
कटगे नाक बेचागे लाज
नीत नियाव मां गिरगे गाज
बइठांगुर बर खीर सोहांरी, खरतरिहा नइ पावय मान.. जै गंगा…
मंहगाई बाढ़े हर साल
बेपारी होवत हें लाल
अफसर सेठ उडावंय माल
नीछत हें गरीब के खाल
रोज बने जनता कंगाल
का गोठियावंव सब जानत हव, बहरी बनगे मितान.. जै गंगा…
उठ संगवारी अब तो जाग
हांका पार लगा एक राग
तपनी रोज तपइया मन बर
तंंयहर बन जा संउहत नाग
गउकी जोखा तभे माढ़ही, घर घर होही नवा बिहान .. जै गंगा…

– भगवती सेन
चंदैनी गोंदा के लो‍कप्रिय गीतBasdeva Geet Jai Ganga Bhagvati Sen

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