कविता : बेरा हे गीत गाय के

शीत बरसावत आवय जड़काला
सोनहा बाली म मोती कस माला
पिंवर होगे पहिरे हरियर ओनहा
जइसे दुलहिन बिहाव के ओढ़े दुशाला!

खेत ह लागे भांय भांय सांय सांय
घर जइसे बेटी के छोड़त अंगना
उछाह उछलय कोठी कोठार म जस
कुलकत मीत मया के जोरत बंधना!

मने मन म हांसी एक मन आगर
जुड़ावय शीतलावय थोकन जांगर
दान पून करके चुकता पउनी पसारी
नाचत बजावत सबझन मांदर!

बेरा हे गीत ल गाय के संगी
दुख पीरा ल भूलाय के संगी
तन संग मन ल फरियर करके
जुर मिल तिहार मनाय के संगी

परब परकीति परेम पुजारी गा
बात एकेच ए नोहे दुधारी गा
दुख लेके सुख सोहर बांटे सदा
भर भर देवय सब ल माटी महतारी गा!

ललित नागेश
बहेराभांठा(छुरा)
४९३९९६




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