छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

सोंचत-सोंचत रहिगेन हमन
भूकत,  उछरत,  घूमत  हावै,  गाँव  के  मतवार  मन,
लाँघन, भूखन बइठे हावै, कमिया अउ भुतियार मन।
राज बनिस नवा-नवा, खुलिस कतको रोजगार  इहाँ,
मुसवा कस मोटागे उनकर, सगा अउ गोतियार  मन।
साहब, बाबू, अगुवा मन ह, छत्तीसगढ़ ल चरत हावै,
चुचवावत सब बइठे हे, इहाँ  के  डेढ़  हुसियार  मन।
पर गाँव ले आये  हे, उही  चिरई  मन  हर  उड़त  हे,
पाछू-पाछू म  उड़त  हावै,   इहाँ  के  जमीदार  मन।
सोंचत-सोंचत रहिगेन हमन, कते बुता ल करन हम।
धर ले हें  जम्मो  धंधा  ल,  अनगइहाँ  बटमार  मन।
बलदाऊ राम साहू

संघरा-मिंझरा

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