माटी के काया

माटी के काया ल आखिर माटी म मिल जाना हे। जिनगी के का भरोसा,कब सांस डोरी टूट जाना हे। सांस चलत ले तोर मोर सब,जम्मो रिश्ता नाता हे। यम के दुवारी म जीव ल अकेला चलते जाना हे। धन दोगानी इंहे रही जही,मन ल बस भरमाना हे। चार हांथ के कंचन काया ल आगी मे बर जाना हे। समे राहत चेतव-समझव,फेर पाछू पछताना हे। मोह-माया के छोड़के बंधना,हंसा ल उड जाना हे। नाव अमर करले जग मे,तन ल नाश हो जाना हे। सुग्घर करम कमाले बइहा,फेर हरि घर जाना हे।…

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सरकारी इसकूल

लोगन भटकथें सरकारी पद पाए बर, खोजत रहिथें सरकारी योजना/सुविधा के लाभ उठाए बर, फेर परहेज काबर हे, सरकारी इसकूल, अस्पताल ले? सबले पहिली, फोकट समझ के दाई ददा के सुस्ती, उप्पर ले, गुरुजी मन उपर कुछ काम जबरदस्ती। गुरुजी के कमी,और दस ठोक योजना के ताम झाम मं, गुरुजी भुलाये रहिथे पढ़ई ले जादा दूसर काम मं। नइ ते सरकारी इसकूल के गुरुजी, होथे अतका जबरदस्त जइसे पराग कन फूल के, जेन सरकारी गुरुजी बने के योग्यता नइ रखै नइ ते बन नइ पावै, तेने ह बनथे संगी गुरुजी…

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