पितर के दिन आ गे

पितर के दिन आगे संगी , बरा सोहारी बनावत हे।बिहनिया ले उठ के दाई, हुम जग ला मढ़हावत हे।।बबा ह आही कहिके , सबो झन ल बतावत हे।दुवारी ला लीप बहार के , लोटा ला मढ़हावत हे।। छानही मा कौआ बइठे , काँव काँव नरियावत हे।डोकरी दाई देख देख के , बबा ला सोरियावत हे।।बड़ सुरता आवत हावय , नाती ल बतावत हे।बरा सोहारी राँध राँध के , पितर ला मनावत हे।। साल भर मे एक दिन , सबके सुरता आवत हे।हुम जग ला दे के संगी , मन ला…

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सुरता

सुरता बर बेरा नी लागे सुध कतको बेर लाम जथे हिरदे के दुख आगर होथे त आंखी ले आंसू के धार अथे सुरता ह हंसाथे,सुरता ह रोवाथे बीते बेरा के एकेक पल छिन आंखी आंखी में झूल जाथे बड़ मुस्किल होथे कोनो ल बिसराना हिरदे मे बसे सुरता ल मिटाना दिन अउ रात जवइया बर सोचथे नी लहुटे जानेवाला,फेर आंखी ह खोजथे। रीझे “देवनाथ” टेंगनाबासा(छुरा)

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