नान कुन कहानी : ठौर

“मारो मारो” के कोलहार ल सुन के महुं ह खोर डाहर निकलेव। एक ठन सांप रहाय ओखर पीछु म सात-आठ झन मनखे मन लाठी धऱे रहाय। “काय होगे” में केहेव। “काय होही बिसरु के पठेवा ले कुदिस धन तो बपरा लैका ह बांच गे नी ते आज ओखर जीव चले जातिस” “त चाबिस तो नी ही का गा काबर वोला मारथव” “वा काबर मारथव कहाथस बैरी ल बचाथस आज नी ही त काली चाब दीही ता!” “हव गा एला छोड़े के नो हे मारव” अइसे कहिके भीड़ ह वोला घेर…

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कहानी : ददा

“ललित!ए ललित!उठ ना रे!बेरा उगे हे।अउ कतेक बेर ले सुतबे?””एक कनी अउ सुतन दे दाई।अभी तो सात बजे हे।”अपन मुड़सरिया में रखे मोबाइल ल एक आंखी ल उघारके समे देखत ललित ह कथे।ताहने फेर चद्दर ल ओढके सुत जथे।अउ ओकर दाई ह ओला बखानत अपन घर के बुता म रम जथे।ललित ह गंगा अउ सुखराम के लइका आवय।दू झन नोनी अउ एक झन टुरा के दाई ददा रहय दुनों ह।नोनीमन के हांथ पींवराके दू बच्छर पहिली के हरहिंच्छा होगे रहय।अब ओमन ल अपन एकलउता बेटा ललित के संसो फिकर रहय।बारमी…

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