बलदाऊ राम साहू के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

1 झन कर हिसाब तैं, कौनो के पियार के । मया के लेन-देन नो हे बइपार के । मन के मंदिरवा मा लगे हे मूरत ह, कर ले इबादत, राख तैं सँवार के । मन के बात ला, मन मा तैं राख झन, बला लेते कहिथौं, तैं गोहार पार के। दिन ह पहागे अउ होगे मुँधियार अब, देख लेतेस तैं हर मोला निहार के। ‘बरस’ के कहना ल मान लेतेस गोई, काबर तैं सोचथस कान हे दिवार के । 2 तरकस ले निकल गे तीर, कइसे धरन मन मा धीर।।…

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गजल

जम्मो नवा पुराना हावै। बात हमला दुहराना हावै । लूट सको तो लुट लौ भैया, सरकारी खजाना हावै । झूठ-लबारी कहि के सबला सत्ता तो हथियाना हावै। कतको अकन बात हर उनकर लागे गजब बचकाना हावै। पेट पलइया मांग करे तब, रंग – रंग के बहाना हावै। सब के मुँह म बात एके हे, उलटा इहाँ जमाना हावै। अब भाई के गोठ- बात मा घलो सियासी ताना हावै । रंग-रंग के =तरह-तरह के बलदाऊ राम साहू

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