छत्तीसगढ़ी बाल गीत

कुतर-कुतर के खाथस मुसवा, काबर ऊधम मचाथस मुसवा। चीं-चीं, चूँ-चूँ गाथस काबर तैं, बिलई ले घबराथस काबर तैं । काबर करथस तैं हर कबाड़ा, अब तो नइ बाँचे तोरो हाड़ा। बिला मा रहिथस तैं छिप के, हिम्मत हे तब देख निकल के। कान पकड़ के नचाहूँ तोला, अड़बड़ सबक सिखाहूँ तोला। बलदाऊ राम साहू

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धानी भुईया मोर छत्तीसगढ़

बड़ सुग्घर महतारी के कोरा धान कटोरा धानी रे। डोंगरगढ़ बमलई ईहा तेलिन दाई के घानी रे।। पैरी सोंढुर के धार संग महानदी के पानी हे। जनमेन इही भुइया म धन धन हमरो जिनगानी हे।। जुड़ पुरवाही झकोरा म लह लहावत धान के बाली। हरियर लुगरा पहिरय दाई माथ नवावय सूरज के लाली।। अइसन हे छतीसगढ़ के भुईया जिनगी हमर भागमानी हे। जनमेन इही भुइया म धन धन हमरो जिनगानी हे।। सरग बरोबर गांव गली हे अमरईया खार ओनहारी डोली। लइका खेलय भवरा बाटी बीरो बिल्लस हासी ठिठोली।। कहानी कथा…

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