सरगुजिहा जाड़ा कर गीत

जाड़ा कर मारे, कांपत हवे चोला बदरी आऊ पानी हर बईरी लागे मोला। गरु कोठारे बैला नरियात है, दूरा में बईठ के कुकुर भुंकात हवे, आगी तपात हवे गली गली टोला, जाड़ा कर मारे……… पानी धीपाए के आज मै नहाएन चूल्हा में जोराए के बियारी बनाएन आज सकूल नई जाओ कहत हवे भोला जाड़ा कर मारे…… बाबू हर कहत हवे भजिया खाहूं नोनी कहत है छेरी नई चराहूं संगवारी कहां जात हवे धरीस हवे झोला, जाड़ा कर मारे…………. मधु गुप्ता “महक”

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मनखे-मनखे एक समान

सुनो-सुनो ग मितान, हिरदे म धरो धियान। बाबा के कहना “मनखे-मनखे एक समान”।। एके बिधाता के गढ़े, चारों बरन हे, ओखरे च हाथ म, जीवन-मरन हे। काबर करथस गुमान, सब ल अपने जान। बाबा के कहना “मनखे-मनखे एक समान”।। सत के जोत, घासीदास ह जगाय हे, दुनिया ल सत के ओ रद्दा देखाय हे। झन कर तैं हिनमान, ये जोनी हीरा जान। बाबा के कहना “मनखे-मनखे एक समान।। जीव जगत बर सत सऊहें धारन हे, मया मोह अहम, दुख पीरा के कारन हे। झन डोला तैं ईमान, अंतस उपजा गियान।…

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