लोकतंत्र के आत्मकथा

न हाथ न गोड़, न मुड़ी न कान। अइसे दिखत हे, कोन जनी कब छूट जही परान। सिरिफ हिरदे धड़कत हे। गरीब के झोफड़ी म हे तेकर सेती जीयत हे। उही रद्दा म रेंगत बेरा, उदुप ले नजर परगे, बिचित्र परानी ऊप्पर। जाने के इकछा जागिरीत होगे। बिन मुहू के परानी ल गोठियावत देखेंव, सुकुरदुम होगेंव। सोंचे लागेंव, कोन होही एहा ? एकर अइसे हालत कइसे होइस , अऊ एहा कइसे जियत हे ? तभे हांसे लागिस ओहा। अऊ केहे लागिस, तेंहा अइसे सोंचत हावस बाबू, जानो मानो मोला कभू…

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मोर गांव म कब आबे लोकतंत्र

अंगना दुवार लीप बोहार के डेरौठी म दिया बार के अगोरय वोहा हरेक बछर। नाती पूछय कोन ल अगोरथस दाई तेंहा। डोकरी दई बतइस ते नि जानस रे अजादी आये के बखत हमर बड़ेबड़े नेता मन केहे रिहीन के जब हमर देस अजाद हो जही त हमर देस म लोकतंत्र आही। उही ल अगोरत हंव बाबू। नाती पूछिस ओकर ले का होही दाई ? डोकरी दई किथे लोकतंत्र आही न बेटा त हमर राज होही हमर गांव के बिकास होही। मनखे मनखे में भेद नि रही। हमर गांव के गरीबी…

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