पुस्तक समीक्षा : गाँव के पीरा ‘‘गुड़ी अब सुन्ना होगे‘‘

वीरेन्द्र ‘सरल‘ जिनगी के व्यथा ह मनखे बर कथा होथे। सबरदिन ले कथा-कंथली ह मनखे के जिनगी के हिस्सा आय। मनखे जब बोले-बतियाय ल नइ सिखे रिहिस मतलब जब बोली-भाखा के विकास घला नइ होय रिहिस तभो मनखे अपन जिनगी के अनुभव ला भितिया में रूख-रई, चिरई-चिरगुण, साँप-डेरू, हिरू-बिच्छू के चित्र ला छाप के परगट करत रिहिन काबर कि ओ समे अपन दुख-दरद ला जनवाय के अउ कोन्हो साधन नइ रिहिस। जब बोली-भाखा के विकास होईस तब मनखे अपन बात ला मुँह अखरा एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी पहुँचाय के…

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पुस्तक समीक्षा : अव्यवस्था के खिलाफ आक्रोश की अभिव्यक्ति ‘‘झुठल्ला‘‘

महान विचारक स्वेट मार्डन ने कहा है कि ‘कहकहों में यौवन के प्रसून खिलते है।‘ अर्थात उन्मुक्त हँसी मनुष्य को उर्जा से भर देती है। पर आज के भौतिकवादी इस युग ने जीवन को सुविधाओं से तो भर दिया है पर होंठो से हँसी छिन ली है। एक ओर ढोंगी, पाखंडी, बेईमान और भ्रष्ट लोग अपनी आत्मा को बेचकर समृद्धि की शिखर पर मौज मना रहे हैं वहीं दूसरी ओर ईमानदार, श्रमशील और सत्यवादी लोग दो-जून की रोटी को तरस रहे है। जब चारों ओर ढोंग, आडम्बर, पाखंड का पहाड़…

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