कहानी : ददा

“ललित!ए ललित!उठ ना रे!बेरा उगे हे।अउ कतेक बेर ले सुतबे?””एक कनी अउ सुतन दे दाई।अभी तो सात बजे हे।”अपन मुड़सरिया में रखे मोबाइल ल एक आंखी ल उघारके समे देखत ललित ह कथे।ताहने फेर चद्दर ल ओढके सुत जथे।अउ ओकर दाई ह ओला बखानत अपन घर के बुता म रम जथे।ललित ह गंगा अउ सुखराम के लइका आवय।दू झन नोनी अउ एक झन टुरा के दाई ददा रहय दुनों ह।नोनीमन के हांथ पींवराके दू बच्छर पहिली के हरहिंच्छा होगे रहय।अब ओमन ल अपन एकलउता बेटा ललित के संसो फिकर रहय।बारमी पास करके संगी जहुंरिया संग घूमे के बुता करे।ददा संग खेती किसानी के काम में हाथ बंटाय खातिर कभू उदीम नी करय। सुखराम घलो ओला मया के मारे कभू कोनो बुता ल नी तियारे।फेर कभू कभू ओला चेतावय जरुर कि खेती किसानी के बुता ल सीख ले बेटा!तोर काम अही।एक न एक दिन महूं ल ऊपरवाला बलाही त जाय बर लागही।  फेर ओकर अइसन चेतावनी ऊपर ललित ह कभू धियान नी देवय।एक कान ले सुने अउ दूसर कान ले निकाल देवय अउ अपन संगी जहुंरिया मन संग रात दिन पिकनिक अउ पार्टी म माते रहय।धीरलगहा ओहा निसा पानी के चक्कर में घलो परगे।ओकर दाई ह सबले पहिली अजम डरिस ओकर आदत बेवहार म आवत अंतर ल।वहू ह ओला चेताइस।फेर ललित के आदत ह थोरको नी सुधरिस।खेती किसानी के बुता ह बाढत उम्मर के हिसाब से सुखराम ल भारी परत रहय।तभो ले ओहा तनेनत रहय अउ अपन मयारू बेटा ललित के जम्मो गलती ल संवास के चलत रहय।

समे कतका बेरा बदल जही तेला बिधाता के छोड़ कोनो नी जानय।काली संझौती के तो बात हरे। सुखराम ह कांदी लुके आइस ताहने माथ पिरावत हे किके सुतगे।रातकुन गंगा ह ओला जेवन करे बर उठाइस ताहने मुड़ी में बाम लगाके सुखराम फेर सुतगे।  रोज दिन बरोबर सुरूज देव उइस।फेर सुखराम के जिनगी के सुरूज बुडगे रहय।घर में गंगा ह रातकुन के सुखराम के तबियत खराब हे त अराम करन दे किके नी झांकिस अउ ललित ह रोजदिन कस बिना मुखारी दतवन के घूमे बर निकलगे।जब बड देरी ले सुखराम चिटपोट नी करिस त ओकर आरो लेबर गीस।देखिस त सुखराम ह चित्त दसना म परे रहय। गंगा ह ओला चिचिया चिचिया के हलाइस डोलाइस। फेर तन के पिंजरा ल जब सुवा ह उडाथे त काया ह माटी हो जथे। सुखराम के तन में कोनो हरकत नी होइस।गंगा के जीव ह धकधकागे।ओहा डरके मारे अरोस परोस के मनखे मन ल बलाइस।जम्मो मनखे सकलाइस ताहने सियनहा मन सुखराम के हांथ नाड़ी ल टमर के देखीन। सुखराम के देंहे जुडागे रहय।सियान मन थोथना ल ओरमा दिन अउ काठी के तियारी करे बर किहिन।गंगा के ऊपर तो जानो मानो गाज गिरगे।ओहा मनमाने रोना गाना सुरू कर दिस।सियान मन सुखराम के बेटा ललित ल खोजे बर ओकर ऊमर के लइका मन ल भेजीन।

ओ लइका मन ललित ल खोजत खोजत ओला सड़क तीर के पान ठेला म अमराइन जिंहा ओहा अपन संगी मन संग गप लडाय म बिजी रहय।ओमन जब घर के घटना के बारे म ललित ल बताइन त ओहा कांपगे।ओहा तुरते दंउडत-दंउडत घर जथे अउ दसना म सुते अपन ददा के पांव ल धरके रोये लागथे।ओहा कलप-कलप के गोहारथे-मोला माफी देदे बाबू!में ह तोर जीव ल अबड दुखाय हंव।कभू तोर कहिना नी मानेंव।तभो ले तें मोला कोनो बुता नी तियारे बाबू!!एक घांव आंखी उघारके मोला देख ले बाबू!तोर ललित अब तोर एक बात नी काटे।”फेर जेकर आंखी एक घांव मूंदागे ओहा कभू नी उघरे।गांव के जम्मो मनखे मन ओला समझाइन अउ ओकर किरयाकरम ल निपटाइन।

सुखराम के जाये के बाद ललित के बेवहार पूरा बदलगे रहय।रात दिन गली खोर म गिंजरइया ललित ह घरे म खुसरे रहय।अपन ददा के एकोठन बात में धियान नइ देनेवाला ललित ह अपन दाई के एक आरो म तुरते आ जावय। ललित ह अब संगी साथी अउ निसा-पानी ल तियाग दिस।ओहा दिनभर ल घरे म रहिके काट देवय। गंगा ह ललित के दसा ल देखके ओकर दुख ल समझगे रहय।एक दिन ओहा ललित ल किहिस-तें अपन बाबूजी के मयारू बेटा हरस न बेटा! तोर बाबूजी के सपना रिहिस तोला बड़े किसान बनाय के। ओ हा रात दिन मोला काहय देखबे ललित के दाई!हमर बेटा ह किसानी म मोर नांव जगाही।तोला ओकर सपना ल पूरा करना हे बेटा!!तें अपन महतारी के बात मानबे न बेटा!!अतका ल सुनके ललित ह अपन महतारी ल पोटार के रो डरिस।किसानी के दिन आइस। ललित ह अपन बइला ल धरके खेत गिस त ओला नांगर जोते बर नी आवय। बइला मन रेंगबे नी करय।

ओहा उही बेरा में अपन ददा के मिहनत ल सुरता करिस।ओला किसानी बुता के मरम ह समझ में आगे। ललित के दसा ल देखके आजू-बाजू खेत के नंगरिहा मन ओला जोते बर सीखाइन। ललित घलो बने धियान देके जम्मो बुता म धियान लगाइस।धीरलगहा ललित ह किसानी के जम्मो बुता में रमगे।ओकर मिहनत ह रंग लाइस अउ ओकर कना अच्छा उपज होइस।फेर ओहा किसानी करत करत रसायनिक खातू अउ जहर वाले किटनाशक के नुकसान ल महसूस करिस।ओहा अपन जम्मो खेत में आनेवाला बछर ले जैविक खेती करे के परन लिस।फेर किसानी के दिन आइस त ललित ह जैविक खेती करके मनमाने उपज पाइस।पूरा एतराब म ओकर चर्चा होय लगिस।पेपर म ओकर समाचार छपिस त सरकारी विभाग से ओकर सम्मान घलो होइस।सम्मान पाती ल हांथ में धरके ललित ऊपर कोती ल देखके आंसू बोहाय लगिस अउ उही बेरा रिमझिम रिमझिम फुहारा पानी गिरे लगिस।जरूर सुखराम के आत्मा ल शांति मिलिस होही।

रीझे “देवनाथ”

टेंगनाबासा (छुरा) 8889135003

संघरा-मिंझरा

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