लघु कथा – सोज अंगुरी के घींव

ककछा म गुरूजी हा, हाना के बारे म पढ़हावत पढ़हावत बतावत रहय के, सोज अंगुरी ले घींव नी निकलय। जब घींव निकालना रहिथे तब, अंगुरी ला टेड़गा करे बर परथे। एक झिन होसियार कस लइका किथे – गुरूजी ये हाना हा जुन्ना अऊ अपरासांगिक हो चुके हे, अभू घींव हेरे बर अंगुरी ला टेड़गा करे के आवसकता नी परय। गुरूजी किथे – तैं हमर ले जादा जानबे रे …….., कती मनखे, कती तिर, सोज अंगुरी म घींव निकाल सकथे ……….. ? तैं बता भलुक, महूं सुनव ………। लइका किथे – मोर दई अऊ ददा मन ला कतको बछर ले, घींव देखे बर तको नी मिले रिहीस हे, ओकर मन के नाव के घींव ला दूसर मन चुपर लेवत रिहीन हे। पांच बछर तक मोर दई अऊ ददा ला, दूसर के घींव चंटइया मन, अपन अंगुरी ला सोज करन नी दिन। मोर घर के मन तरसगे घींव के आस म। अपन अंगुरी ला पांच बछर तक, टेड़गा राख के किंजरिन फेर एको बूंद नी अमरइन। चुनाव के समे, अपन अंगुरी ला सोज करके, जब सियाही लगवइन तहन, इही सोज अंगुरी ले, घींव बाहिर आगे गुरूजी ………। लइका के जवाब बहुतेच सुघ्घर रिहीस। गुरूजी ला, तरक माने बर परगे। अब न केवल इसकूल म, बलकी जम्मो जगा, सोज अंगुरी ले, घींव निकाले के अगोरा होय लगिस।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

संघरा-मिंझरा

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