लोक कथा : लेड़गा के बिहाव

वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक गाँव म एक गरीब लेड़गा रहय। ये दुनिया म लेड़गा के कोन्हों नइ रिहिस। दाई रिहिस तउनो ह कुछ समे पहिली गुजर गे। लेड़गा ह बनी-भूती करके भाजी-कोदई, चुनी-भूंसी खाके अपन गुजर बसर करत रहय। सम्‍पत्ति के नाव म लेड़गा के एक झोपड़ी भर रहय तब उही झोपड़ी के आधा म पैरा के खदर छानी रहय अउ आधा ह अइसने खुल्ला। एक ठन गाय रहय जउन ह आधा भीतरी तब आधा बहिरी बंधाय। एक ठन हउला रहय तहु ह नो जगह ले टोड़का रहय जउन ला लाख म लाख के पानी भरे के पुरतिन बने दे गे रिहिस।




लेड़गा दिन भर दूसर घर मंजूरी करय अउ रतिहा घर आके भात-साग रांधे। अलवा-जलवा खा पी के सुत जावय। अइसने बपरा लेड़गा के एक लांघन एक फरहर करके जिनगी ह बीतत रहय। पर घर के रोजी-मंजूरी के संशो म न तो ओखर खाय के ठिकाना रहय अउ न पिये के। लेड़गा जब सज्ञान होगे तब गांव के सियान मन ओला किहिस- ‘‘बेटा! तोर पहाड़ अस जिनगी अकेल्ला कइसे बीतही। संसार के सबो जीव ल अपन जोड़ी-जांवर के जरूरत रहिथे। अब तहु सज्ञान होगे हस। कइसनो करके अपन बिहाव करके अपन जोड़ी ले आन। तुंहर दुनो के मिहनत-मंजूरी म जिनगी ह अराम से चलही।‘‘
लेड़गा ला सियान मन के सलाह ह बने लागिस। ओहा लड़की खोजे बर जाय के सोचे फेर ओखर गरीबी के सेती कोन्हों ओखर संग म नइ जावय, सबो झन विचार करे कि सगा मन लेड़गा के चीज-बस के बारे में पूछही तब काय बताबो। नइ बता सकबो तब तो हमरे फजिहत होही। अकेल्ला जाय बर लेड़गा के हिम्मत घला नइ पुरय।
एक दिन लूड़गा के मालिक ल ओखर मन के बात पता चलिस तब ओहा किहिस-‘‘ बेटा! मैंहा तोर संग लड़की खोजे बर तो नइ जा सकव फेर तैहा कोन्हों जाहूँ कहिबे तब तोला महीना भर के छुट्टी अउ तोर खरचा-खुराक बर रूपया-पइसा जरूर दे देहुं।‘‘
अतका ल सुनके लेड़गा के आँखी म आँसू डबडबागे ओहा अपन मालिक के पांव म गिरगे। मालिक बड़ा दयालू चोला रहय ओहा लेड़गा ल उठा के अपन हिरदे म लगा के किहिस-‘‘मैंहा तोर बर उज्जर कपड़ा लत्‍ता, घोड़ा-गाड़ी सब के वेवस्था कर देहुं तैहा फिकर झन कर। तोर संग म कोन्हों नइ रेंगन कहिथे तब तै अकेल्ला रेंग। जउन अपन सहायता करथे भगवान घला ओखर सहायता करथे , समझगेस?‘‘
मालिक के दे बने उज्जर कपड़ा-ओन्हा ल पहिर के अउ महीना दिन बर राशन-पानी लेके लेड़गा ह बने सुघ्घर असन घोड़ा-गाड़ी म सवार हो के अपन बर लड़की खोजे बर अकेल्ला निकलगे।
घोड़ा-गाड़ी के मजा लेवत लेड़गा ह येती-ओती घूमत-घामत एक अनचिन्हार राज म पहुँचगे। उहां के राज करमचारी मन ओला कोन्हों दुश्मन राजा के भेदिया समझ के पकड़ लिन अउ राजदरबार में पेश कर दिन।
लेड़गा के उज्जर कपड़ा-लत्‍ता अउ घोड़ा-गाड़ी देख के राजा ह जब पुछिस तब लेड़गा ह जीव के डर म अपन आप ल कोन्हों राज के राजकुमार बता दिस।
राजा के घला एक झन सज्ञान बेटी रहय। उहू ह अपन बेटी बर बने योग्य वर देखत रहय। ओहा बेटी के बिहाव के आशा म लेड़गा ल पूछ पारिस-‘‘आप मन के घर कइसना हे?‘‘
लेड़गा किहिस-‘‘अरे! मोर घर तो अइसे हे राजा साहब कि घर भीतरी सुतबे तबले अगास केचंदा-चँदैनी मन दिखथें।‘‘
‘‘आप मन घर के बरतन-वरतन कतेक हे?‘‘ राजा के बात पूरा होय के पहिली लेड़गा किहिस-‘‘मोर घर तो नव लखा बरतन हे।‘‘ राजा फेर पुछिस- ‘‘अउ गऊ-लक्ष्मी के काय हाल-चाल हे?‘‘
लेड़गा किहिस- ‘‘अरे! ओला झन पुछव राजा साहब मोर घर के गऊ-लक्ष्मी तो आधा घर म बंधाथे अउ आधा बाहिर म।‘‘
राजा मन मन सिरतोन म लेड़गा ल कोन्हों राज के राजकुमार समझ के अपन बेटी के बिहाव के बात चलाथे। लेड़गा ह तुरते राजी हो जथे। बाते-बात म राजा ह अपन बेटी ल लेड़गा बर हार गे अउ चट मंगनी अउ पट बिहाव कर दिस। कुछ दिन लेड़गा ह उही अपन ससुरार म रहिगे।
फेर राजा ह जब अपन बेटी ल बिहाव के बाद ओखर ससुरार म पहुँचाय बर लेड़गा के गांव म पहुँचिस तब लेड़गा के घर-दुवार ला देख के मुड़ धरके बइठगे।
कहे जाथे उही समय ले नोनी-बाबू के बर-बिहाव के पहिली घर-दुवार देखे-जाने के चलन ह शुरू होय हे ।
मोर कहिनी पुरगे। दार भात चुरगे।



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *