छेरछेरा के तिहार – लइका मन पारत गोहार

हमर भारत देश में पूजा पाठ अऊ दान के बहुत महत्व हे। दान करे बर जाति अऊ धरम नइ लागय। हमर भारतीय संसकिरती में हिन्दू, मुसलिम, सिख, ईसाई, जैन सबो धरम के आदमी मन दान धरम करथे अऊ पून कमाथे। हमर वेद पुरान अऊ सबो धरम के गरन्थ में दान के महिमा ल बताय गेहे। हमर छत्तीसगढ़ में भी अन्नदान करे के बहुत महत्व हे। इंहा के मनखे मन बड़ दयालु हे। कोनों आदमी ल भूखन मरन नइ देख सकय। एकरे सेती दूसर परदेस के मनखे मन घलो आके इंहा बस जथे। छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा अऊ इंहा के किसान ल अन्नदाता भगवान कहे जाथे। काबर किसान मन ह अपन पूरा मेहनत अऊ पसीना ओगार के अन्न के उपज करथे अऊ सबके उदर पोसन करथे।
किसान मन ह धान के ऊपज करके कूट मिंज के अपन घर में लाथे अऊ कोठी डोली में रखके साल भर तक एमे अपन खरचा घलो चलाथे। हमर भारतीय संसकिरीती में बताय गेहे के अपन कमई के दसवां भाग ल दान करना चाही तभे आदमी ल पून के परापति होथे अऊ जस के भागी बनथे। इही संसकिरती ल आघू बढ़ावत पूस पुन्नी के दिन छत्तीसगढ़ में छेरछेरा परब मनाय जाथे। छेरछेरा परब ह अन्नदान के परब आय। ए दिन छोटे बड़े लइका सियान सब झन अपन अपन टोली बनाथे अऊ दान मांगे बर जाथे।




“छेरछेरा माई कोठी के धान हेरहेरा”
“अरन बरन कोदो दरन, जभ्भे देबे तभ्भे टरन”

अइसे परकार से बोलत मनखे मन ह दूसर के दुवारी में चिल्लात जाथे अऊ दान मांगथे। इंहा के सब मनखे मन अपन अपन घर में धान ल निकाल के रखे रहिथे अऊ खुले मन से अन्न के दान करथे। छेरछेरा के तिहार ल शहर से जादा गांव में अच्छा ढ़ंग से मनाय जाथे। ए दिन गांव में काम बूता बंद रहिथे अऊ छोटे बडे सब मनखे भेदभाव ल भुलाके छेरछेरा मांगे बर जाथे। कतको मंडली वाला मन ढोलक तबला मंजीरा लेके गावत बजावत छेरछेरा मांगथे। एकर से बहुत आनंद आथे। छेरछेरा मांगे के बाद जतका धान या पइसा सकलाथे वोला मंडली वाला मन सब झन बराबर बराबर बांटथे या मंडली के खरचा पानी बर जमा करथे। लइका मन ह धान ल बेंचके पइसा सकेलथे अऊ खई खजाना लेथे। ये परकार से छेरछेरा के तिहार ल खुसी अऊ उमंग के साथ मनाय जाथे।नंदावत संसकिरती – समय के साथ साथ हमर बहुत अकन पुराना तिहार मन नंदावत जात हे। छेरछेरा तिहार ह तक अब पहिली जइसे मजा नइ आवत हे। काबर आदमी के रहन सहन अऊ खान पान ह बदल गेहे। आदमी शहरी संसकिरती ल अपनाय ल धर लेहे। एकर सेती अब छेरछेरा मांगे बर बहुत कम आदमी जाथे। पहिली के जमाना में गांव भर के आदमी मन मिलजुल के मांगे बर जाय। अब तो एला अपन शान के खिलाफ समझथे। गांव में तो थोर बहुत लइका मन छेरछेरा मांगे बर जाथे लेकिन शहर में तो ए तिहार ह बिलकुल नंदा गेहे। कतको झन ल पता घलो नइ राहे के कब छेरछेरा आइस अऊ कब चल दीस। हमर सब ए छत्तीसगढ़ी संसकिरती ल बचाना बहुत जरुरी हे। नहीं ते अवइया पीढ़ी मन ह एकर बारे में जानबे नइ करही।

महेन्द्र देवांगन “माटी”
गोपीबंद पारा, पंडरिया
जिला – कबीरधाम (छ. ग)
पिन- 491559
मो.- 8602407353
Email -mahendradewanganmati@gmail.com



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