छत्तीसगढ़ के आसा, छत्तीसगढ़ी भासा

(छत्तीसगढ़ी राजभासा दिवस, 28 नवम्बर 2017 बिसेस)

भासा के नाम म एक अऊ तामझाम के दिन, 28 नवम्बर। बछर 2007 ले चले आथे। ये दिन गोठ-बात, भासनबाजी, छत्तीसगढ़ी गीत-कविता, किताब बिमोचन, पुरस्कार बितरन। बस ! मंच ले उतरे के बाद फेर उही हिन्दी-अंगरेजी म गोठ। छत्तीसगढ़ी ल तिरया देथे । आज छत्तीसगढ़ी राजभासा के जनमदिन ए। राजनीतिक-समाजिक नेता, पत्रकार-साहितकार, कलाकार-कलमकार, अधिकारी-करमचारी अऊ जम्मो छत्तीसगढ़िया बर गुनान करे के दिन ए । सबे कहिथे के छत्तीसगढ़ी बड़ गुरतुर भासा ए। एकर गोठ ह अंतस म उतरथे। एकर ले अक्तिहा छत्तीसगढ़ी के सरूप नइ दिखे।




छत्तीसगढ़ अऊ छत्तीसगढ़ी हमर गरब ए। छत्तीसगढ़ी सिरतो बहुंत गुरतुर अऊ सहज-सरल हे। एकर गीत-संगीत लाजवाब हे। फेर, एला लिखे-पढ़े म थोरकुन कठिन लगथे। काबर के लिखे बर सही रूप म काम नइ होहे। हर जिला, तहसील, कस्बा, गांव अऊ टोला म छत्तीसगढ़ी सब्द के उच्चारन अलग-अलग ढंग ले होथे । एकरे ले लिखइया जइसने गोठियाथे, तइसने लिखथे। लिखइया ह अपन छेत्र के हिसाब ले ठीके लिखथे। फेर, पढ़इया बर कठिन हो जथे । काबर के, अलग-अलग पाठक ह सब्द के उच्चारन अलग-अलग करथे। अइसन म पाठक ह रचना पढ़े म सहज नइ हो पाय, ठठक जथे।

जादा दुख तब होथे, जब एक छत्तीसगढ़िया भाई ह छत्तीसगढ़ी म गोठियाथे अऊ दूसर छत्तीसगढ़िया ह हिन्दी जवाब म देथे । हिन्दी गोठियइया छत्तीसगढ़िया ह सायद ये समझथे के वो हिन्दी जानथे त जादा समझदार हे । ये गिरे हुए मानसिकता ए । अइसने होतिस त हिन्दी, अ्रंगरेज अऊ बड़े बिदेसी भासा के गोठियइया मन सबके-सब सुजान होतिस । ओ भासा म कनो चोर-डांकू, गंवार-जाहिल, बेरहम-बदमास नइ होतिस । भासा फकत गोठ-बात अऊ बिचार जनाय के जरिया ए । भासा ले न कोई गंवार हो जथे, न कोई गियानी । गंवार या गियानी होना मनखे के निजी बात ए । माईभासा ह माटी, महतारी अऊ ममता के मान ए ।




छत्तीसगढ़ी के एक दिक्कत इस्कूल-कालेज पढ़इया-लिखइया लईका मन के हे । नर्सरी ले अंगरेजी- हिन्दी भासा म पढ़त-लिखत हे । घर-परिवार-समाज म सब छत्तीसगढ़ी नइ बोले । एकर ले लईका मन छत्तीसगढ़ी ल सजह रूप म नइ गोठिया पाय । उंकर गोठ-बात म हिन्दी या अंगरेजी के परभाव रहिथे । ये सुभाविक हे । एकरे ले भासा ल निरमल जल समान माने जाथे । जइसे नंदिया म नरवा-ढोड़गा के पानी समा जाथे, तइसने किसम के भासा ल घलो नंदी समान होना चाही । छत्तीसगढ़ी ल घलो दूसर भासा के सब्द ल अपनाना चाही । एकर ले छत्तीसगढ़ी के कोठी च भरही ।

छत्तीसगढ़ी के मानकीकरन नइ होय ले लिखे-पढ़े म दिक्कत हे । छत्तीसगढ़ी लेखन म बिबिध रंग-ढंग देखे ल मिलथे, जइसे अऊ-अउ-आऊ, जइसे-जईसे-जैसे, लिखइया-लिखईया-लिखैया, पीरीत-पिरीत-पीरित, परमेश्वर-परमेस्वर-परमेसवर, रायपुर-रयपुर, दुर्ग-दुरूग, बिलासपुर-बेलासपुर अनुष्का-अनुश्का-अनुस्का, मृत्युदण्ड-मृत्युदन्ड-मीरीतयुदण्ड, प्रकाशक-परकासक-प्रकासक, कहानी-कहिनी-काहनी, स्कूल-इसकूल, कॉलेज-कलेज, प्रकृति-परकीरीति, धृतराष्ट्र-धीरीतरास्ट्र, श्रीमती-सिरीमती, श्रीकृष्ण-सिरीकिरीस्न । अइसने असंख्य सब्द हे । जिंकर कई रूप साहित्य अऊ समाचार पत्र म मिलथे । लिखे-दिखे म उटपुटांग, पढ़े म परान छोड़ान । एकर ले छत्तीसगढ़ी कठिन हो जथे । भासा जतना सहज-सरल होथे, वतना ओकर परसार होथे। ये खातिर छत्तीसगढ़ी सब्द मन के मानकीकरन सबले जरूरी हे ।




छत्तीसगढ़ी लिखे बर देवनागरी लिपि हे । देवनागरी म सब्द के उच्चारन म समय के अनसार लघु-दीर्घ मांत्रा लिखे जाथे । मोर बिचार म मनखे, जगा अऊ जीनिस के नाम ल हिन्दी रूप म लिखना चाही । काबर के नाम के वर्तनी म अंतर होय ले भासा के सहजता खतम हो जथे । छत्तीसगढ़ म पहिली सिक्छा बंहुत कम रीहिस । असिक्छा के सेती हिन्दी सब्द ल सुभिता अनसार छत्तीसगढ़ी म बोले-गोठियाय । एकरे ले छत्तीसगढ़ी म पहिली ”ण, व, श, ष, क्ष, त्र, ज्ञ, प्र, त्य“ के उच्चारन नइ हाय । त सहज रूप म “न, ब, स, क्छ, तर, गिय, पर, ति” उच्चारन किये जाए । अब सिक्छा के बिकास होगे हे, त अब हिन्दी के सब्द मन ल छत्तीसगढ़ी म उपयोग करना चाही । अंगरेजी, उर्दू, अरबी, फारसी, उड़िया, बांग्ला, मराठी, तेलगू, कन्नड़, संस्कृत सबो भासा के सब्द ल सहज रूप म लिखना चाही । सबले बड़े बात ये हे छत्तीसगढ़ी गोठियाय म कनो छत्तीसगढ़िया ल लाज-सरम नइ होना चाही । रद्दा-बाट होय के, दुकान-दफ्तर जइसन भासा गोठयइया मिले, तइसन तंहू गोठियायव । हिन्दी म हुंकारो । अंगरेजी म फटकारो ! छत्तीसगढ़ी म दमोरो ! छत्तीसगढ़ी गोठियाय म कोई लाज-सरम नहीं । तभे छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अऊ छत्तीसगढ़िया के बिकास होही । मान बड़ही ।
जय भारत ! जय छत्तीसगढ़ !!

लोकनाथ साहू ललकार
बालकोनगर, कोरबा (छ.ग.)
मोबाइल- 9981442332



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