छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय – जनकवि कोदूराम “दलित”

(108 वाँ जयंती मा विशेष)

1717 ईस्वी मा जन्में गिरधर कविराय अपन नीतिपरक कुण्डलिया छन्द बर जाने जाथें। इंकर बाद कुण्डलिया छन्द के विधा नँदागे रहिस। हिन्दी अउ दूसर भारतीय भाखा मा ये विधा के कवि नजर मा नइ आइन।

पठान सुल्तान, जुल्फिकार खाँ, पंडित अम्बिकादत्त व्यास, बाबा सुमेर सिंह, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मन सुप्रसिद्ध कवि के दोहा के भाव मा विस्तार दे के अउ रोला जिद के ये विधा ला पुनर्स्थापित करे के कोशिश जरूर करिन।

हास्य कवि काका हाथरसी घलो कुण्डलिया जइसे दोहा अउ रोला मिलाके छै डाँड़ के बहुत अकन रचना मंच मा पढ़के प्रसिद्धि पाइन हें फेर उंकर रचना मन काका की फुलझड़ियाँ के नाम मा जाने जाथें। उंकर रचना मा कुण्डलिया असन आदि अउ अंत मा एक्के शब्द के प्रयोग नइ होइस हे। सन 2000 के बाद हिन्दी मा कुण्डलिया छन्द फेर प्रचलन मा आइस हे।

कोदूराम “दलित” जी अपन पहिली कुण्डलिया छन्द संग्रह “सियानी गोठ” (प्रकाशन वर्ष – 1967)मा अपन भूमिका मा लिखे रहिन – “ये बोली (छत्तीसगढ़ी) मा खास करके छन्द बद्ध कविता के अभाव असन हवय, इहाँ के कवि-मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करें।स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देवें।ये बोली पूर्वी हिन्दी कहे जाथे। येहर राष्ट्र-भाषा हिन्दी ला अड़बड़ सहयोग दे सकथे। यही सोच के महूँ हर ये बोली मा रचना करे लगे”

उंकर निधन 28 सितम्बर 1967 मा होइस, उंकर बाद छत्तीसगढ़ी मा छन्दबद्ध रचना लिखना लगभग बंद होगे। छत्तीसगढ़ी मा अब “छन्द के छ” के साधक कवि मन कुण्डलिया छन्द मा सुग्घर रचना करत हें।

छत्तीसगढ़ मा कुण्डलिया छन्द ला प्रतिष्ठित करे के श्रेय जनकवि कोदूराम “दलित” ला जाथे। इही पाय के दलित जी ला छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय माने जाथे।

जनकवि कोदूराम दलित जी छत्तीसगढ़ी के संगेसंग हिन्दी मा घलो कुण्डलिया छन्द लिखिन हें। उनकर कुण्डलिया छन्द के एक संग्रह 1967 मा सियानी-गोठ के नाम मा प्रकाशित हो चुके हे।

कोदूराम दलित जी के हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी ऊपर समान अधिकार रहिस। फेर छत्तीसगढ़ी कवि के रूप मा उन ला ज्यादा जाने जाथें। इनकर कविता मा कुण्डलिया छन्द के अलावा दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, सार, सरसी, चौपई, चौपाई, ताटंक, कुकुभ, लावणी, श्रृंगार, पद्धरि, पद पादाकुलक, घनाक्षरी आदि छन्द के दर्शन होथे।

गिरधर कविराय अपन नीतिपरक कुण्डलिया बर प्रसिद्ध हें त कोदूराम दलित के कुण्डलिया मा नीति के अलावा भारत के नव निर्माण, सरकारी योजना, विज्ञान, हास्य-व्यंग्य, देशप्रेम, छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति जइसे अनेक रंग के दर्शन होथे।




दलित जी के नीतिपरक कुण्डलिया देखव –

(1) कतरनी अउ सूजी
काटय – छाँटय कतरनी, सूजी सीयत जाय
सहय अनादर कतरनी , सूजी आदर पाय
सूजी आदर पाय , रखय दरजी पगड़ी मां
अउर कतरनी ला चपकय वो गोड़ तरी-मां
फल पाथयँ उन वइसन, जइसन करथयँ करनी
सूजी सीयय, काटत – छाँटत जाय कतरनी.
(2) पथरा –
भाई, एक खदान के, सब्बो पथरा आयँ
कोन्हों खूँदे जायँ नित, कोन्हों पूजे जायँ
कोन्हों पूजे जायँ , देउँता बन मंदर के
खूँदे जाथयँ वोमन ,फरश बनय जे घर के
चुनो ठउर सुग्घर, मंदर के पथरा साहीं
तब तुम घलो सबर दिन पूजे जाहू भाई.

सामाजिक बुराई दूर करे बर दलित जी के संदेश –

(1) जुआ –
खेलव झन कोन्हों जुआ, करव न धन बरबाद
आय जुआ के खेलना, बहुत बड़े अपराध
बहुत बड़े अपराध, आय ये मा सब बिगड़िन
राजा नल अउ धरमराज जइसे सब्बो झिन
खो के धन फोकट जीवन भर दुख झन झेलव
सुखी रहव सब झन मन, जुआ कभू झन खेलव।।

(2) नशा –
गाँजा चरस अफीम अउ माखुर मदिरा भंग
इन्हला जे सेवन करयँ, छोड़व उनकर संग
छोड़व उनकर संग, तभे तुम रहू निरोगी
नशा बनाथे मनखे ला कँगला अउ रोगी
पियौ दूध फल मेवा खावौ ताजा ताजा
आवयँ जहर अफीम चरस मदिरा अउ गाँजा।।




दलित जी अपन प्रदेश के गरिमा अउ आहार के महिमा ये कुण्डलिया मा करिन संगेसंग छत्तीसगढ़ के पिछड़ापन के कारण तको बताइन –

(1) छत्तीसगढ़ –
छत्तिसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर-दार
हवयँ इहाँ के लोग मन, सिधवा अउर उदार
सिधवा अउर उदार, हवयँ दिन रात कमावयँ
दें दूसर ला भात, अपन मन बासी खावयँ
ठगथयँ ये बपुरा मन ला बंचक मन अड़बड़
पिछड़े हवय अतेक, इही कारण छत्तिसगढ़।।

(2) बासी –
बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव
ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला पुष्ट बनाव
तन ला पुष्ट बनाव, जियो सौ बछर आप मन
जियत हवयँ जइसे कतको के बबा-बाप मन
दही-मही सँग खाव शान्ति आ जाही जी -मा
भरे गजब गुन हें छत्तिसगढ़ के बासी मा।।

कोदूराम दलित जी के जनम टिकरी (अर्जुन्दा) गाँव मा होय रहिस फेर उंकर करम भुइयाँ दुरुग रहिस। अइसन मा भिलाई उंकर विषय वस्तु कइसे नइ बनतिस –

(1) भिलाई –
बनिस भिलाई हिन्द के, नवा तिरथ अब एक
चरयँ गाय गरुवा तिहाँ, बस गें लोग अनेक
बस गें लोग अनेक, रोज आगी सँग खेलयँ
लोहा ढलई के दुख ला, हँस हँस के झेलयँ
रहिथयँ मिल के रूसी हिन्दी भाई भाई
हमर देश के नवा तिरथ अब बनिस भिलाई।।

साठ के दशक मा हमर देश निर्माण के प्रक्रिया ले गुजरत रहिस। ओ बेरा मा सरकारी योजना ला सफल करे के आव्हान देखव –

(1) परिवार नियोजन –
अड़बड़ बाढ़िन आदमी, भारत मा भगवान
दू ले आगर होय झन, अब ककरो सन्तान
अब ककरो सन्तान, कहूँ होही नौ-दस झन
तो करना परिही सब ला, परिवार नियोजन
ज्यादा मनखे बाढ़े ले, हो जाथय गड़बड़
पूरय नहीं अनाज, सबो दुख पाथयँ अड़बड़।।

(2) पँचसाला योजना –
पँचसाला हर योजना, होइन सफल हमार
बाँध कारखाना सड़क, बनवाइस सरकार
बनवाइस सरकार, दिहिन सहयोग सबो झन
अस्पताल बिजली घर इसकुल घलो गइन बन
देख हमार प्रगति , अचरज होइस दुनिया ला
होइन सफल हमार, योजना मन पँचसाला।।




लोकतंत्र मा वोट के महत्ता अउ चुनाव के प्रक्रिया बतावत दलित जी के कुण्डलिया –

(1) वोट –
सोना चाँदी घीव गुड़, रुपिया पैसा नोट
होथय सबसे कीमती, आप मनन के वोट
आप मनन के वोट, अधिक पाथयँ जउने मन
राज काज के अधिकारी बनथयँ तउने मन
यही पाय के उन्हला चाही अच्छा होना
परखो वोट डलइया मन, पीतल अउ सोना।।

(2) राजा –
अब जनता राजा बनिस, करय देश मा राज
अउ तमाम राजा मनन, बनगें जनता आज
बनगें जनता आज, भूप मंत्री-पद माँगे
ये पद ला पाए बर घर घर जायँ सँवागे
बनयँ सदस्य कहूँ जनता मन दया करिन तब
डारयँ कागद पेटी ले निकलय राजा अब।।

लोकतंत्र मा प्रिंट मीडिया के भारी महत्व होथे। अखबार के भूमिका बर उंकर विचार ये कुण्डलिया मा देखे जा सकथे –

(1) पेपर –
पेपर मन –मां रोज तुम, समाचार छपवाव
पत्रकार संसार ला, मारग सुघर दिखाव
मारग सुघर दिखाव, अउर जन-प्रिय हो जाओ
स्वारथ – बर पेपर-ला, झन पिस्तौल बनाओ
पेपर मन से जागृति आ जावय जन-जन मां
सुग्घर समाचार छपना चाही पेपर-मां.

5 मार्च 1910 मा जन्मे कवि दलित जी प्रगतिशील विचारधारा के रहिन अउ जन हित के सबो किसम के परिवर्तन ला स्वीकार करिन। विज्ञान के समर्थन मा उंकर कुण्डलिया देखव –

(1) विज्ञान –
आइस जुग विज्ञान के , सीखो सब विज्ञान
सुग्घर आविस्कार कर , करो जगत कल्यान
करो जगत कल्यान, असीस सबो झिन के लो
तुम्हू जियो अउ दूसर मन ला घलो जियन दो
ऋषि मन के विज्ञान , सबो ला सुखी बनाइस
सीखो सब विज्ञान, येकरे जुग अब आइस.

(2) बिजली –
तार मनन मा ताम के, बिजली रेंगत जाय
बुगुर बुगुर सुग्घर बरय, सब लट्टू मा आय
सब लट्टू मा आय, चलावय इनजन मन ला
रंग रंग के दे अँजोर ये हर सब झन ला
लेवय प्रान,लगय झटका जब येकर तन मा
बिजली रेंगत जाय, ताम के तार मनन मा।।




दलित जी कवि सम्मेलन के मंच मा हास्य अउ व्यंग्य के कवि के रूप मा विख्यात रहिन। उंकर शिष्ट हास्य के सुग्घर उदाहरण आय ये कुण्डलिया –

(1)खटारा साइकिल –
अरे खटारा साइकिल, निच्चट गए बुढ़ाय
बेचे बर ले जाव तो, कोन्हों नहीं बिसाय
कोन्हों नहीं बिसाय, खियागें सब पुरजा मन
सुधरइया मन घलो हार खागें सब्बो झन
लगिस जंग अउ उड़िस रंग, सिकुड़िस तन सारा
पुरगे मूँड़ा तोर, साइकिल अरे खटारा।।

दलित जी आडम्बर ला नइ मानत रहिन। आडम्बर ऊपर उंकर व्यंग्य देखव –

(1) ढोंगी –
ढोंगी मन माला जपयँ, लम्भा तिलक लगायँ
हरिजन ला छीययँ नहीं, चिंगरी मछरी खायँ
चिंगरी मछरी खायँ , दलित मन ला दुत्कारयँ
कुकुर बिलाई ला चूमयँ, चाटयँ पुचकारयँ
छोंड़ छाँड़ के गाँधी के सुग्घर रसदा ला
भेद भाव पनपायँ, जपयँ ढोंगी मन माला।

छत्तीसगढ़ मा बाहिर ले आये मनखे मन इहाँ के सिधवा मन के शोषण करिन हें। ये पीरा ला व्यंग्य के माध्यम ले दलित जी खूब सुग्घर लिखिन हें –

(1) फुटहा लोटा –
फुटहा लोटा ला धरव, जाओ दूसर गाँव
बेपारी बन के उहाँ, सिप्पा अपन जमाव
सिप्पा अपन जमाव, छोंड़ के जोरू जाँता
नौ ला सौ कर कर के लिक्खो रोकड़ खाता
खिचड़ी खावौ पहिनो कुछ दिन कपड़ा मोटा
बना दिही लखपतिया तुम्हला फुटहा लोटा।।

नवा भारत मा औद्योगीकरण बाढ़िस। विकास बर जरूरी घलो रहिस। फेर किसानी बूता ला छोड़ के नौकरी करे बर गाँव ला छोड़ना दलित जी के हिरदे मा पीरा ला जनम देवत रहिस। ये कुण्डलिया उंकर मन के पीरा ला बतावत हे –

(1) नौकरी –
पढ़े लिखे मनखे मनन, भइन सुस्त सुखियार
खोजे खातिर नौकरी, किंजरयँ हाथ पसार
किंजरयँ हाथ पसार, न भावय खेती बारी
करिही कोन बताव, अन्न के पैदावारी
करथयँ खेती खूब, जगत के लोग सबो झन
खोजयँ नित नौकरी, इहाँ के पढ़े लिखे मन।।

जनकवि कोदूराम दलित जी पक्का गांधीवादी विचारधारा के रहिन। अपन कविता मा नान नान जिनिस ला तको विषय वस्तु बना के ओखर महत्व ला रेखांकित करत रहिन –

(1) राख –
नष्ट करो झन राख –ला, राख काम के आय
परय खेत-मां राख हर , गजब अन्न उपजाय
गजब अन्न उपजाय, राख मां फूँको-झारो
राखे-मां कपड़ा – बरतन उज्जर कर डारो
राख चुपरथे तन –मां, साधु,संत, जोगी मन
राख दवाई आय, राख –ला नष्ट करो झन.




दलित जी के बचपन गाँव देहात के वातावरण मा बीतिस तेपाय के उंकर रचना मन मा प्रकृति के प्रेम साफ साफ झलकथे। उंकर पर्यावरण बर जागरूकता देखव –

(1) पेड़ –
भाई अब सब ठउर –मां, अइसन पेड़ लगाव
खाये खातिर फल मिलय, सुस्ताये बर छाँव
सुस्ताये बर छाँव , मिलय लकड़ी बारय बर
मिल जावय लौड़ी , दुष्टन – ला खेदारे बर
ठण्डी शुद्ध सुगंधित हवा मिलय सुखदाई
सबो ठउर – मां अइसन पेड़ लगावव भाई.

छत्तीसगढ़ी के संगेसंग दलित जी के हिन्दी मा घलो समान अधिकार रहिस। उंकर हिन्दी के कुण्डलिया –

(1) कुर्सी –
सबसे कुर्सी है अधिक, जग में तेरा मान
तुझको पाने के लिए, तरसे हर इन्सान
तरसे हर इन्सान, जिसे तू मिल जाती है
उसको चुम्बक जैसी ही तू चिपकाती है
तुझसे करते नेह, लोग अपने मतलब से
तेरा मान अधिक है कुर्सी, जग में सबसे।।

जिनगी के निस्सारता बर उंकर हिन्दी के ये कुण्डलिया छन्द एक कालजयी रचना आय –

(1) नाम –
रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार
अतः सभी का कर भला, है इसमें ही सार
है इसमें ही सार, यार तू तज के स्वारथ
अमर रहेगा नाम, किया कर नित परमारथ
काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है
किन्तु सुनाम सदा दुनिया में रह जाना है।।

आज 5 मार्च के 118 वाँ जयंती मा जनकवि कोदूराम “दलित” जी ला नमन।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाइल – 9907174334, 8319915168
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2 comments

  • रविकर

    सुंदर प्रस्तुति। नमन आदरणीय दलित जी को

  • अरुण कुमार निगम

    बहुत बहुत आभार संजीव तिवारी भाई

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