नवरात्र परब : मानस में दुर्गा

हमर छत्तीसगढ़ मा महापरब नवरात ला अड़बड़ उछाह ले मनाय जाथे।नौ दिन तक गाँव के शीतला (माता देवाला) मा अखंड जोत जलाय जाथे अउ सेवा गीत गाय जाथे ।गाँव गाँव मा दुर्गा के मूरती मढ़ाके नौ दिन ले पूजा करे जाथे। गाँवभर के जुरमिल के ये परब ला भक्तिभाव ले मनाथे। छत्तीसगढ़ मा गाँव के संगे संग छोटे,मंझला अउ बड़का सहर मा दुर्गा माता के बड़े बड़े मूर्ति, बड़े बड़े जगमग जगमग करत पंडाल, नाच पेखन, जगराता, सांस्कृतिक कार्यक्रम के नवरात परब के दर्शन होथय।
नवरात परब मा छत्तीसगढ़ मा माता दंतेश्वरी, बम्लेश्वरी, महामाया, संबलेश्वरी, गंगामैय्या, चंन्द्रहासिनी,पताल भैरवी …. सबो देबी मंदिर मा हजारो कलस मढ़ा के जोत जलाय जाथे। मनखे मन घर मा घलाव अखंड जोत जला के, जवाँरा बो के नवरात परब ला मनाय जाथे।पूर्णाहुती मा नवकन्या भोज के रसम होथे।
कहे जाथे कि दुर्गा के उत्पत्ति सब देवता मिलके करिन हवय।महिसासुर ला मारे बर ब्रम्हदेव हा उदिम बताइस हे। काबर कि ओहा बरदान पाय रहिस कि ओकर मृत्यु कन्या(नारी) के हाथ मा होही।तब देवता मन महिसासुर के मारे बर नारी के रचना करिन , कोनों अपन तरफ से मुड़ी,कोन्हो हाथ तो कोन्हो गोड़, दाँत, आँखी, कनिहा, अउ अस्त्र सस्त्र दे के बनाय रहिन । आखिर मा शिव जी हा ओमे प्राण डारे रहिस। देवी हा नौ दिन तक नवा नवा रुप धरके लड़ई करिन अउ अाखिर मा कात्यायनी बनके महिसासुर ला मारिन।

हमर वेद पुराण मा एक बच्छर मा चार नवरात्र बताय हवय, जेमा चइत नवरात्र अउ कुवाँर नवरात्रि ला जादा फलदेवइया बताय हे।ये दूनो नवरात हा भगवान रामचंद्र ले जुड़े हवय।चइत नवरात्रि पाछू रामनवमीं ,रामजनम मनाय जाथे।वइसने कुवाँर नवरात्रि के पाछू दशहरा।वेद उपनिषद मा बताय हे कि शारदीय नवरात्र पूजा के शुरुआत भगवान रामचंद्र जी समुंदर के तीर मा करे रहिन अउ दसवाँ दिन लंका विजय बर आघू बढ़े रहिन।
तुलसीदास जी हा रामचरित मानस मा दुर्गा के जतका नाव ला बउरे हे , सीता माता के छोड़ अउ कखरो नाव ला नइ बउरे हे।दुर्गा हा परमशक्ति हरय। मानस मा सतरूपा, कौशिल्या, कैकई, सुमित्रा,उर्मिला, मांडवी, श्रुतिकीर्ति, अनुसुईया, अहिल्या, रति, सबरी, त्रिजटा, मंदोदरी, मंथरा नाँव के नारी पात्र के महिमा बताय हवय।
दुर्गा के सहस्त्र नाव मा सती, पार्वती(पारबती), उमा, भवानी, गौरी (महागौरी), गिरिजा, शक्ति, माता, जगदंबा, माया (महामाया), अंबिका, जगदंबिका,रिद्धीसिद्धि, इंदिरा,विधात्री,बनदेवी,शैलपुत्री,गिरिनंदनी, दक्षसुता, दच्छकुमारी, नाव मन घलाव आथय। रामचरित मानस मा तुलसीदास जी हा ये नाव ला राम कथा मा श्लोक, दोहा, चउपई, छंद मा बउरे हवय। रामचंद्र जी के नाव ला भोलेनाथ हा महामंत्र मानके जाप करथँय। सती, उमा, पारबती, गौरी, भवानी नाव ला ओकर अर्धांगिनी रुप मा बताय हवय।
तुलसीदास जी हा मानस के शुरुआत ही भवानी के बंदना से करे हवय।
।।भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरुपिणौ।।

भवानी शब्द ला अउ बहुत जगा मा अपन श्लोक, दोहा, चउपई, छंद मा बउरे हवय। जइसे –

कीन्ह प्रश्न जेहिं भाँति भवानी।
जद्यपि प्रकट न कहेउ भवानी।
यह प्रसंग मै कहा भवानी।
गई भवानी भवन बहोरी।
सुमिरि भवानी संकरहि, कह कबि कथा सुहाई।

दुर्गा अउ राम मा एक समानता घलाव हवय। दूनो झन अतियाचारी राक्षस मन ला मारिन हे।दुर्गा माता हा चंड, मुंड, शुंभ, निशुंभ, महिषासुर जइसन राक्षस ला मारिन।भगवान रामचंन्द्र हा मारीच, सुबाहू, ताड़का, कुम्हकरण, रावण ला मारिन ।मानस मा अइसने उमा, गिरजा नाव ला अड़बड़ अकन पद मा बउरे हे।जइसे

बहुरी कृपा करि उमहिं सुनावा।
उमा महेश बिवाह बाराती।
जब ते उमा शैलगृह आई।
उमा राम गुन गुढ़।
नाथ उमा मम प्राण सम।
उर धरि उमा प्राण प्रिय चरना।
यह इतिहास पुनीत अति, उमहिं कही वृषकेतु।
कलि विलोकि डाग हित हर गिरजा।
जौ न मिलहिं बरु गिरिजहिं जोगू।
सुन गिरिजा हरि चरित सुहाए।
राम कथा गिरजा मैं बरनी।
रामचरित मानस मा सती प्रसंग के विशेष महत्तम बताय हवय।सती हा सीता रुप धरके राम के परिच्छा लेइस।येकर सेती भोलेनाथ घुसियागे अउ रिसागे।बोलचाल बंद होगे समाधी ले लीस। आखिर मा दक्ष के बेटी हा पति के हिनमान ला नइ सह सकिस अउ अग्नि समाधी ले लीन।पाछू उँखर जनम गिरिराज हिमांचल के बेटी के रुप मा होइस।एकर सेती वोला बनदेवी, शैलसुता, शैलकुमारी, गिरिनंदिनी, दच्छसुता, तपस्वनी कहे जाथे।दुर्गा के पहिली दिन के पूजा शैलपुत्री के रूप मा होथय। मानस मा दुर्गा के इही नाव मन आय हवय।जइसे –

दच्छ सुता कहूँ नहिं कल्याणा।
कलिमल तृण तरु मूल निकंदनी।
बनदेवी बनदेव उदारा।
धन्य धन्य गिरीराज कुमारी।
सीता माता हा गौरी के भक्तिन आय ।रोज ओखर मंदिर जाके पूजा करथे।धनुष जग के बेरा मानस मा गौरी पूजा के बखान हवय।बिहाव मा गौरी गनेश के पूजा के बखान हवय।अइसे तो दुर्गा के एक रुप महागौरी घलाव हरय।यहू मानस मा हवय।

रिबिन गौरी देखी तह कैसी ।
जानि गौरी अनुकूल सिय हिंय…….
रामचरित मानस मा दुर्गा के नाव ला कथा प्रसंग के अनुसार जोड़े गय हवय। कोन्हो जगा जगदंबा, अंबा, अंबिका, जगदंबिका, इंदिरा, विधात्री लिखे हावय-

सती विधात्री इंदिरा, देखी अमित अनूप।
नमामि इंदिरा पतिम्।
नाम उमा अंबिका भवानी।
जगदंबा तहं अवतरी, सोपुर बरनी न जाई।
जगदंबिका जानि भव माया।
संसार मा दुर्गा ला जगत जननी माता कहे जाथे।रिद्धि सिद्धि दात्री, पारबती, नाव ले घलाव जाने जाथे।तुलसीदास के मानस मा यहू मन ला जगा मिले हवय।
पारबती भल अवसर जानू।
पारबती सम पति प्रिय होऊ।
जब हरि माया दूर निवारी।
माता सुनी बोली सोमति डोली।
हे गज बदन षडानन माता।
रिद्धि सिद्धि सिर धरि मुनिबर बानी ।
राम के सुरुआत किये परंपरा आज हमर हिन्दू संस्कृति मा रच बस गे हवय। न माता के मान कम होय न राम के परभाव मिटय।जब तक दुर्गा के पूजा होही तब तक राम जन्म अउ दशहरा होही।अइसने जब जब राम कथा होही दुर्गा के रुप भवानी, गौरी, उमा, गिरजा के बंदना होही।

हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा,जिला-गरियाबंद

संघरा-मिंझरा

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