छत्तीसगढ़ी भाषा का मानकीकरण : कुछ विचार

डॉ. विनय कुमार पाठक और डॉ. विनोद कुमार वर्मा की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पढ़ने को मिली। इसमें देवनागरी लिपि के समस्त वर्णों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की गई है। यह भी ज्ञात हुआ कि डॉ. वर्मा और श्री नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ की पुस्तक ‘ छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका’ भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है।

यहाँ मैं ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पुस्तक पर अपने कुछ सवाल और विचार रखना चाहता हूँ। क्या व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए ही देवनागरी लिपि के सभी वर्णों को स्वीकार किया गया है? क्योंकि प्रशासनिक शब्दकोश खण्ड में हिन्दी के बहुत से शब्दों को अपभ्रंश रूप में लिखा गया है। यथा- आकास, अनुसासन, अब्दकोस, असासकीय, आचरन, सीघ्रलेखक, आदेस, रास्ट्र, वरिस्ठ, वेधसाला, कार्यसाला,संदेस, सिफारिस, अनुसंसा, गियापन, ससर्त, अकुसल, सुल्क, सून्य, सपथपत्र, विसय, सारनी, उपसीर्स, संदेस आदि।
शब्दकोश खण्ड में इसारा, इस्लोक, ईसान आदि।





संधि खण्ड में विसम, विसाद, सुसमा, प्रनाम, भूसन, निस्फल, निस्चिंत, दुस्सासन, मन-अभिलासा आदि। इस प्रकार श, ष, ज्ञ और ण की छुट्टी कर दी गई है।

‘व’ की जगह ‘ब’ के प्रयोग से बचने का सुझाव तो है लेकिन बकालत, बिसय, बिस्तार, बित्तीय, बिदेसी, बिधान, बिबेक, बिक्रय, बिभाग, साबधानी आदि को बेखटके इस पुस्तक में स्थान देने का क्या अर्थ निकाला जाए? पुस्तक शुद्ध छत्तीसगढ़ी की बात करते-अपभ्रंश छत्तीसगढ़ी की चपेट में दिखता है। कुछ उदाहरण और जो छंद खण्ड से लिए गए हैं-

बरम्हा, धरम, परान, इंदिरावती, दुरुग, करन, नकसान, परबत, बिनास, निरासा, लछमी, लछमन, आसुतोस, नियारी, पियारी, रक्छा, गनेस आदि।
नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ जी भी ‘छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण’ पुस्तक से जुड़े हैं। उनका कहना है कि अर्ध ‘र’ की जगह पूर्ण ‘र’ लिखकर हम ‘प्रदेश’ को ‘परदेश’ बना लेते हैं। हम लोग ‘प्रभाव’ को ‘परभाव’ लिखेंगे तो इसका अर्थ पर का भाव (दूसरे का भाव) हो जाएगा। इसे छत्तीसगढ़ी शब्द का हिन्दी अर्थ निकालना कहा जाएगा। यह सुविज्ञात तथ्य है कि शब्द का केवल एक ही अर्थ हो यह कोई जरूरी नहीं है। एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ी में ‘श्रम’ या ‘परिश्रम’ लिखने की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि इसके लिए छत्तीसगढ़ी में मिहनत शब्द है। धरम, करम, गरम, मरम, गरभ, सरम, करन, को गलत कहना कहाँ तक उचित है? धर्म, कर्म, गर्म, मर्म, गर्भ, शर्म, कर्ण आदि के आधे ‘र’ को पूर्ण ‘र’ करना कहीं से भी अनुचित नहीं है।





अर्ध ‘र’ कहाँ जरूरी है इसका उदाहरण देखिए- ‘कार्य’ यदि इसे कोई ‘कारय’ लिखता है तो गलत है।
अब हम क्रम, प्रण, प्रकार, प्रभाव, प्रणाम, प्रचार, प्रपंच, प्रबंध, प्रमाण आदि को देखें तो इन शब्दों में प्रथम वर्ण ही आधा है और ‘र’ पूरा है। इसमें प्रथम वर्ण को पूर्ण बनाकर आदिकाल से आजतक छत्तीसगढ़ी में सहजता से बोला जाता है।
यथा- करम, परन, परकार, परभाव, परनाम, परचार, परपंच, परबंध, परमान आदि। यहाँ करम और परभाव जैसे कुछ शब्दों के दो-दो अर्थ बताने होंगे।

ङ, ञ का प्रयोग तो हिन्दी में भी बंद हो चुका है। ऋ का महत्व भी सिर्फ मात्रा लगाने तक सीमित हो गया है। अतः हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले सभी वर्णों के छत्तीसगढ़ी में प्रयोग से कोई ऐतराज न होने के बावजूद मतभेद मुख्यतः ष, श, ण, और संयुक्ताक्षर क्ष, त्र, ज्ञ को लेकर होता है। छत्तीसगढ़ी में इन वर्णों का उच्चारण नहीं होता। क्योंकि छत्तीसगढ़ी न तो इनसे शुरू होनेवाले शब्द हैं न ही अन्य किसी शब्द में इनका प्रयोग होता है। इसलिए सभी वर्णों को शामिल करने का मुख्य कारण अन्य भाषा के शब्दों को जस का तस स्वीकारना भर है। दूसरी समस्या है अर्द्ध अक्षरों को किस सीमा तक पूर्ण बनाकर प्रयोग किया जाए। जैसे धर्म- धरम, कर्म- करम ( आधा र को पूर्ण र करके) दोनों का प्रयोग सही है। क्रम- करम, प्रण- परन, प्राण- परान (आधा क और प को पूर्ण करके) यहाँ भी दोनों प्रयोग सही है। अत: अपभ्रंश को गलत मानना हमेशा उचित नहीं है। छत्तीसगढ़ी भाषा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक डॉ. सुधीर शर्मा की टिप्पणी एकदम सही है- “अपभ्रंश शब्द छत्तीसगढ़ी की एक बड़ी विशेषता है।” अपभ्रंश से परहेज करे तो कविता लिखना बंद हो जाए।

“मोर छुटगे ‘परान’
जीव होगे हलाकान
मैं बेटी अटल कुवाँरी
मइके म रहितेंव वो…”

“मोर कतका सुग्घर गाँव
जइसे ‘लछमी’ जी के पाँव।”

-दिनेश चौहान

संघरा-मिंझरा

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