छत्तीसगढ़ी भाषा : समस्या अउ संभावना

छत्तीसगढ़ी भाषा के अपन अलग महत्तम हवय जइसे कि हर भाषा के होथे। छत्तीसगढ़ी भाषा में गोठियाय ले हमन ला अड़बड़ आनंद के अनुभव होथे काबर कि ये हर हमर माई भाखा आय। जब ले जनमें हावन ये भाखा हर तब ले हमर कान में घर कर ले हावय। अपन दाई-बबा के अउ महतारी-बाप के गोठ-बात ला हमन यही भाखा में सुने हावन। अपन अंतस के सुख अउ दुख ला हमन यही भाखा में बताथन तभे हमर जीव ला संतोष मिलथे फेर जइसे-जइसे हमन तरक्की करत जावत हावन हमन अपने भाखा ला नंदावत घलाव देखत हावन अउ कतको झन ला एखर प्रचार-प्रसार में लगे घलाव देखत हावन कुल मिलाके अइसे लागथे कि ए भाखा के नवा जनम होवत हावय। हमन अपन लइकन मन ला इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेज के अइसे लगथे कि अपने बोली भाखा ले दुरिहा कर डारेन का ? कोनो दूसर बोली-भाखा ला बोले में, सीखे में कोनो बुराई नई हे फेर अपन बोली-भाखा ला बिसराए ले अड़बड़ नुकसान उठाए बर परथे ये बात हर खच्चित आय। अइसे लागथे के हमर छत्तीसगढ़ी भाषा हर संक्रमण काल ले गुजरत हावय। एक डाहर हमर बोली-भाखा के रद्दा में अड़बड़ अकन समस्या हावय तो दूसर डाहर हमर भाखा के विकास ले हमर बर आगू बढे़ के अड़बड़ अकन संभावना घलाव हावय। ए दूनो के बारे में बिचार करना हमन ला बहुॅत जरूरी हावय-

समस्याः-हमर विचारक मन एखर उपर अड़बड़ विचार करथें कि छत्तीसगढ़ी भाषा के मानक रूप का होना चाही ? काबर कि छत्तीसगढ़ी भाषा के रूप हर लगभग हर जिला में अलग-अलग देखे बर मिलथे। ए बात हर जम्मों झन ला भरम में डार देहे हावय जबकि एमा समस्या वाले कोनो बात ही नई हे। ये तो छत्तीसगढ़ी भाषा के विशेषता होना चाही। एखर वर्ण ला लेके घलाव भरमाए मनखे मन कतको शब्द के रूप ला बदल के लिख देथे जइसे ज्ञान ला कोनो मन ग्यान तो कोनो मन गियान लिखथें जबकि अइसे होना नई चाही। हमन ला हिन्दी के जम्मों वर्णमाला में काट-छांट करके आदिकाल से चले आ रहे समृद्ध छत्तीसगढ़ी भाखा ला कुरूप बनाए के प्रयास नई करना चाही। छत्तीसगढ़ी भाषा हर तो आदिकाल से ही समृद्ध भाषा आय तभे तो एला आधार मानके हमर छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना करे गै हावय। दुनिया के अइसे कोन से भाषा हावय जेखर अनुवाद हमन छत्तीसगढ़ी भाषा में नई करे सकन यहू हर अड़बड़ सोंचे के बात हरै। अइसे कोन से भाषा हावय जेमा अउ कोनो दूसर भाषा के एको ठन शब्द नई समाय हे यहू हर हमर बर जबर विचार करे के बात आय।

संभावनाः- छत्तीसगढ़ी राज भाषा आयोग के गठन के मूल उद्देश्य हरै छत्तीसगढ़ी भाषा ला आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाना अउ एखर बर छत्तीसगढ़ी राज भाषा आयोग अड़बड़ अकन काम घलाव करत हावय फेर जउन दिन ए काम में हमन ला सफलता मिल जाही ओ दिन हमर छत्तीसगढ़ी भाषा के असली रंग-रूप हर देस अउ दुनिया के मानस पटल में अपन आन बान अउ शान से अंकित होही। हमर छत्तीसगढ़ के संपूर्ण विकास तभे संभव होही। भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रसिद्ध कविता मातृभाषा के प्रति में एक ठन दोहा हावय- निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत ना हिय को सूल।।

हमर छत्तीसगढ़ी लोक कला, संस्कृति, लोक व्यवहार,राज-काज अउ रोजगार, व्यापार, व्यंजन, खेल, रीति-रिवाज ला तभे पूरा सम्मान मिलही जब हमन अपन भाषा ला ओखर पूरा मान-सम्मान ला देवाबो नई तो अधकचरा ज्ञान के कोनो मेर सम्मान कभू नई होवय। हमर छत्तीसगढ़ के मनखे के मान अउ प्रतिष्ठा सबके लिये जरूरी हावय के हम अपन भाषा ला ओखर पूरा मान सम्मान देवावन नई तो जब तक हमन ए बुता ला नई करबो हमन आन कोनो के ऑखी ले देखबो अउ आन कोनो के कान ले सुनबो हमर माई भाखा के विकास हर सीधा हमर छत्तीसगढ़ के मूल निवासी जनता के आर्थिक, मानसिक अउ शारीरिक विकास ले जुडे़ हावय। हमर छत्तीसगढ़ के सर्वांगीण विकास तभे होही जब हमर माई भाखा ला आठवीं अनुसूची में स्थान मिलही अउ ओखर पूरा मान-सम्मान मिलही। ए सब बात ला देखते हुए हमर छत्तीसगढ़ के अनवरत विकास के संभावना हमर छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास ले सीधा जुडे़ हावय यही एक बात हर सोला आना सहीं साबित होथे। अपन भाखा से ही उन्नति संभव हे काबर के यही सकल उन्नति के आधार आय।

जय हिंन्द जय भारत जय छत्तीसगढ़

रश्मि रामेश्वर गुप्ता
बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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