छत्तीसगढ़ी भूल भूलैया

समर्पन
धमधा के हेडमास्टर पं. भीषमलाल जी मिसिर महराज के सेवा मा :-
लवनी
तुहंला है भूलभुलैया नींचट प्यारा।
लेवा महराजा येला अब स्वीकारा।।
भगवान भगत के पूजा फूल के साही।
भीलनी भील के कंद मूल के साही।।
निरधनी सुदामा के ओ चाउर साही।
सबरी के पक्का 2 बोइर साही।।
कुछ उना गुना झन हाथ अपन पसारां
लेवा महराजा, येला अब स्वीकारा।।

जावलपुर, दिनांक 12. 04. 1918
तुहंर दया के भिखारी,
शुकलाल प्रसाद पांड़े

भूमका
ये बात ला सब जानथें कि आदमीमन धरम-करम, नीत-प्रीत, बुद्धू-बिबेक, चतुराई कहां ले कहों, भगवान घलोक ला अपन अपन बोली के प्रताप से पा जाथें। उनकर सब काम अउ सब इच्छा उनकर बोलिच से सिद्ध हो जाथैं। आदमी जउन देस-राज मा जनम पाथे, ओही देस के बाली हर ओकर असल बोली कहाथे। मनखे हर अपन जतका बढ़ती अपन बोली के परसाद से कर सकथे, ओतका दूसर बोली से नई कर सके।
आदमीमन ला अपने बोली मा दू उपाय से सिक्षा मिलथे :-
1. एक दूसर से बातचीत कराई से।
2. किताब पढ़ाई से।
जउन आदमी हर ये दुन्नोंं उपाय ला रोज 2 करथे, ओहर बहुत जल्दी बुद्धमान हो जाथे अउ सबो बात मां ओकर बढ़ती होथे। येही खातिर पोथी रचे जाथे, जेला पढ़के अउ ओमां लिखे अनुसार चल के कतको गवाँर आदमी मन तरह 2 के गियान सीख के खूब बुद्धमान बन जाथैं अउ संसार मा जस पाथैं।
जउन हिंदी हर हमर हिन्दुस्तान देस भर के बोली अय, हमर ये छत्तीसगढ़ी बोली हर ओही हिन्दी के रूप अय। छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी मा निंचट थोरक भेद है। बात ये है कि हिन्दी हर सुद्ध रूप अय अउ छत्तीसगढ़ी हर ओकर बिगड़े रूप अय। दुन्नों मा निंचट थोरक फरक है। हिन्दी मा अउ छत्तीसगढ़ी मा अतेक लकठा के नाता है, तबो ले खाली छत्तीसगढ़ी जनैया मनखे हर हिन्दी बोली ला बने नई समझ सकै। येकर असल कारन ये ही है कि छत्तीसगढ़ हर बिद्या मा खूबिच पाछू हावै। फेर अब सरकार अंगरेज बहादुर के दया से इहां ला ठौर 2 कतको मदरसा खुलत जात है अउ पढ़ैया-लिखैया आदमी मन के संख्या आगू ले बढ़त जात है, फेर तभो ले आज काल इहाँ ला किताब अउ अखबार बाँच के ज्ञानी बने के इच्छा रखैया आदमी अतेक थोरे हावैं कि जउन मन अँगठी मां गने लाइक हावैं।
एक बुद्धमान मनखे के कहना है कि ‘‘जिस देस के मनुष्य सदा पुस्तक पठन में अपना समय व्यतीत करते हैं, उन्हीं की उन्नति अवश्यसम्भावी है।‘‘ इहाँ ला ये बात ला माने बर एक लाख आदमी पाछे एक्को आदमी तैयार नइँये। हाय ! कतेक दुःख के बात अय ! कान्नों लैका हर कुछू किताब पढ़े के चिभीक करे लागथे, तौ ओकर दाई-ददामन ओला गारी देथें अउ मारपीट के ओ बेचारा के अतेक अच्छा अउ हित करैया सुभाव ला नष्ट कर देथैं। येकरे बर कहेबर परथै कि इहाँ के दसा निँचट हीन हावैं। इहाँ के रहवैयामन से किताब अउ अखबार पढ़के ज्ञान अउ उपदेस सीखे बर कोन्नों कहैं तौ ओमन अइसे कहथैं :-
‘‘हमन नई होवन पंडित-संडित तहीं पढ़े कर आग लुवाठ !
ले किताब अउ गजट-सजट ला जीभ लमा के तइँहर चाट !!
जनम के हम तो नाँगर-जोता नई जानन सोरा-सतरा !
भुरवा भैंसा ता ! ता ! ता ! ता !!! यही हमर पोथी पतरा !!!‘‘
धन्य है ! ऐसन बुद्ध के बलिहारी है ! अपन हित अनहित ला पसु-पक्षीमन घलोक जानथैं, जब आदमी अपन हित-अनहित ला नई समझै, तौ ओकर-साही अनाड़ी अउ कोन होही ?
मैं हर राजिम (चंदसूर) के पंडित सुन्दरलाल जी त्रिपाठी ला जतेक धन्यवाद देवौं, ओतके थोरे है। उनकर छत्तीसगढ़ी दानलीला ला जबले इहाँके पढ़ैया-लिखैया आदमी मन पढ़े लागिन हैं, तब ले ओमन किताब पढ़े मां का सुवाद मिलथै अउ ओमां का सार होथे, ये बात ला अब धीरे धीरे जाने लगे हावैं। ये ही ला देखके महूँ हर बिलायत देस के जग-जाहिर कवि शेक्सपियर के ‘‘भूलभुलैया‘‘ कथा ला छत्तीसगढ़ी बोली के पद्य मां लिख डारे हावौं। ये कहिनी हर श्री बाबू गंगाप्रसाद एम. ए. के रचे ‘‘हिन्दी शेक्सपियर के अधार से लिखे गये है, येकर खातिर मैं बाबू साहेब के निंचट अहसान मानत हावौं।
जबले छत्तीसगढ़ के रहवैया मन ला हिन्दी बर प्रेम नई हो जावैं अउ जबले ओमन हिन्दी के पुस्तक से फायदा उठाय लायक नइँ हो जावैं, तबले उँकरे बोली छत्तीसगढ़ीच हर उनकर सहायक है। येकरे खातिर छत्तीसगढ़ी बोली मां लिखे किताब हर निरादर करे के चीज नों है अउ येकरे बर छत्तीसगढ़ी बोली मां छत्तीसगढ़ी भाई मन के पास बड़े 2 महात्मामन के अच्छा 2 बात के संदेशा ला पहुंचावव हर अच्छा दिखथय।
हिन्दी बोली के आछत, छत्तीसगढ़ी भाईमन बर छत्तीसगढ़ी बोली मां ये किताब ला लिखे के येही मतलब है कि एकतो छत्तीसगढ़ी ला उहाँ के लैका, जवान, सियान, डौका डौकी सबो कोनों समझहीं अउ दूसर, उहाँ के पढ़े लिखे आदमी मन ये किताब ला पढ़के हिन्दी के किताब बाँच के अच्छा 2 सिक्षा लेहे के चिभिक वाला होजाहीं। बस अैसन होही, तौ मोर मिहनत हर सुफल हो जाही।
मोर मन मां छत्तीसगढ़ी भाषा मां कोनो किताब लिखे के इच्छा पं. नर्मदाप्रसाद जी मिसिर पैदा कराइँन, येकर खातिर मैं मिसिर जी के नींचट अहसान मानत हावौं। ये किताब के रचाई अउ लिखाई के काम मा मित्र पं. दुखीराम जी अवस्थी कोटा अउ पंडित गुरूप्रसाद जी ठाकुर हुशंगाबाद ये दुन्नों मनझन खूब सहायता देइन हैं, तेकर खातिर मैंहर इनकरो खूब गुन मानत हावौं।

जबलपुर, तुँमन के एकझन छत्तिसगढ़िया भाई
15.04.1918 ई. शुकलाल प्रसाद पांड़े

छत्तीसगढ़ी भूल भुलैयाँ

सवैया
राम-गनेस-गुरूजी के पाँव म मैंहर आपन मूंड़ नवाके।
भूलभुलैयाँ-कथा कहथौं हँसहीं पढ़ जेला सबेच्च ठठाके।।
होवैं चिरँजी बोलैया ये बोली के कान घलाय कभू झन पाकै।
फैलयँ नार के साही दिनोंदिन फूलें-फरैं सुख खूबिच पाके।।
दोहा – सिवपुर, हरिपुर नाँव के धन अउ बल चुचुवात।
राज रहिन संसार मा दूठन सुघर अधात।।
चौपाई
कभू लराई भये रहिस है। दुनों राज मां बैर रहिस है।।
दुनों राज के महराजा मन। कानुन कर देइन तब ऐसन।।
हमर हाट मां हमर डहर मा। हमर राज मां हमर सहर माँ।।
बैरी राज के कान्नों आही। ओकर मूंड़ कटाये जाही।।
देही रूपिया जब हजार ठन। तबे बांच पाही ओकर तन।।
ये कानुन रैयत जब सूनिन। सन्न खाय के मनमां गूनिन।।
कहिन, आज ले सुन ला भाई। छोंड़ा बैरी-राज जवाई।।
देइन छोंड़ खाय के किरिया। होथे जोहर सबला पिरिया।।
दोहा – अड़बड़ दुखिया जनम के भूले भटके बाट।
सिवपुर के मनखे कोनों आइस हरिपुर-हाट।।
ओला बैरी-राज के जान मने मन हाँस।
बाँध सिपाही ले गइँन आपन राजा-पास।।
चौपाई
रस्ता मा सुन बात मरम के। थाँह पा गइस अपन करम के।।
मैं सिवपुर के रहवैया हौं। येकर खातिर मारे जाहौं।।
दुख मां माथा ठोंके लागिस। तर 2 आंसू चूहे लागिस।।
राजा मेर पहुँचिस ओहर जब। करिस जोहार नवां मुंड़ ला तब।।
हाथ जोर आंसू बोहा के। कहे लागिस राजा ल सुना के।।
अनजाने मैं ईहां आयेवँ । एको हाल के गम नइँ पायेवँ ।।
छोंड़ मोला महराजा देवाँ। अउ जग मा भारी जस लेवा।।
जेहर पर के प्रान बचाथे। तेकर से इसवर सुख पाथे।।
दोहा – राजा हर अतका ल सुन दुन्नों नैन तनेर।
कहे लगिस तोर चाल हर नइँ चलही मोर मेर।।
चौपाई
जैसन राज के कानुन होथे। राजा ल पालेच बर होथे।।
नइँ मानै ओला ओहिच जब। अड़बड़ गड़बड़ मच जाथे तब।।
जेकर मन मां आथे जैसन। रैयत रस्ता चलथैं तैसन।।
येकरे बर बैठेवँ गादी जब। करे हवौं किरिया मैंहर तब।।
अबस मानिहौं कानुन मन ला। नइँ मेटिहौं कभू मैं उनला।।
छोड़ सकौं नइँ मैं येकरे बर। अबस के मारे जावे तैंहर।।
तेर राजा मोर मनखे पाइस। सब बपुरा मन ला मरवाइस।।
नइँ मालुम अतको का तोला ? निंचट बने हस भाँभर भोला।।
दोहा – बहँचे के जो मन हवै तौ सुन कान उघार।
गन दे आगू मोर तैं रूपिया एक हजार।।
मोला ये बिसवास है तोर देख के हाल।
सौ ले जादा लँग नहीं निकरही माल।।
जब सिरतो बेंच ऐसने अगा ! हाल है तोर।
तो फेर कैसे बांचही भला प्रान हर तोर।।
चौपाई
अतका जब ओ बपुरा सूनिस। पागा फेंक मूंड़ ला धूनिस।।
भुइयाँ मां पेटघैयाँ गीरिस। तिरिन चाब के ऐसन बोलिस।।
मलिक, दुखिया मैं हौं ऐसन। नइँ होहीं एक्को झन जैसन।।
मोला जिंदगी नइँये प्यारा। जल्दी मोरा मरवा डारा।।
महराजा, जब मैं मर जाहौं। तब सबेच्च दुख ले छुट जाहौं।।
पुजवैया मन ला बलवावा। मोला जल्दी पार लगावा।।
निंचट भार होगइस जिआई। अब अबेर झनकरा दोहाई।।
अच्छा भइस इहाँ जो आयेवँ। खोजत रहें तौन ला पायेवँ।।
मोला होगै ऐसन कहना। औंघावत अउ पाइस दसना।।
दोहा – कलकुत ऐसन मरे के ओकर जब सुनीस।
राजा के मन मां मया ओकर बर उपजीस।।
चौपाई
राजा हर ओला उठवाइस। ओकर से पूछे फेर लागिस।।
नइँ रहिस रूपिया-पैसा जब। काबेर घर ले निकरे तैं सब ?
येहूला तैं बता मुसाफिर। आये हवस इहाँ का खातिर ?
निंचट बोहावत आंसू धारा। कहिस हाथ ला जोर बिचारा।।
अपने दुखला अपने मुंहले। कैसे कहिहौं कैसन मुंह ले।।
जब सब दुख के सुरता आथे। मन नींचट ब्याकुल हो जाथे !
तुहँर हुकुम ला टारौं कैसन ! अच्छा, कहथौं बनही जैसन।।
उहाँला ओकर कथा सुने बर। डटाडट्ट कचहेरी गै भर।।
दोहा – कहे लगिस कहिनी अपन राजा-अज्ञा मान।
सुने लगिन सब आदमी देके नींचट कान।।
चौपाई
जात के बनियां जाना मोला। तन के नाँव मोर है भोला।।
सिवपुरमां मैं जनम ल पायेवँ । उहेंल खेलेवँ कूदेवँ बाढ़ेवँ ।।
भयेवँ जवान उहाँ जब मैंहर। करेवँ बिहाव जात-अतमा-घर।।
नींचट सुन्दर सब गुन खानी। मिलिस मोला महराज परानी।।
रँग के ओकर प्रेम के रँग मां। रहे लगेवँ मैं ओकर सँग मां।।
कटक सहर मां मैंहर जाके। करत रहें रोजगार मजा के।
बुधमंता मन सिरतो कहथें। बनिजेच मां लछिमी जी बसथें।।
थोरेच दिन रोजगार करें मैं। खुब धनवंता होय गयेंवँ मैं।।
दोहा – एक बखत मोर संग के मरगै साझीदार।
चले गयें मैं कटक तब आपन हान बिचार।।
चौपाई
मैके मां करि के तिरिया ला। छय महिना मैं रहेंवँ उहांला।।
गरभवती हो गये रहिस जब। कहे रहिस सब हाल अपन तब।।
मोर सुरता कर 2 के रोवै। नइँ खावै पीवै नइँ सोवै।।
सह नइँ सकिस मोर बिछुरनला। तौ आ गइस रहें मैं जहं ला।।
दस महिना बीतिस जब गन गन। बाबू भइँन जरौंधा दूझन।।
निचट अचंभा का गुठियाबौं। नइँ पतियाहा कहत लजावौं।।
एके रूप-रँग एक्के तन के। दुनो रहिन एक्के मुहरन के।।
आगू जनमिस तेहर कौनै। पाछू जनमिस ओकर कोनै।।
कैसे कहौं अचंभो भारी। नइँ कोन्नो के मिलै चिन्हारी।।
दोहा – कंगालिन के एक झन ऊहेंला सरकार।
लेइँन जाँवर छोकरा ओही दिन अवतार।।
इसवर-माया का कहौं है ओ अपरंपार।
ओहू दूनो झन रहिन निँचट एके अनुहार।।
चौपाई
उनकर दाई अऊ ददा मन। निँचट रहिन हैं जनम के निरधन।।
बाबू मन सँग मां खेले बर। बिसा लिहें ओमन ला मैंहर।।
बाम्हन ला मैंहर बलवायों। चारों झनके नाँव दुवे ठन।।
बाबू मन के होइस पूर्रू। नौकर मन के होइस झुर्रू।।
बड़े पुरू-सँग बड़का झुर्रू। ननकी-सँग मां ननकी झर्रू।।
रहे लगिन अउ खेले लागिन। दूध-भात खा बाढ़े लागिन।।
नई रहिन हैं कोन्नो रोनहाँ। मुँच 2 हँसैं करैं खुब धोनहाँ।।
दोहा – देख चोचला हमन के छाती जावै फूल।
दुख मन ला हम दुनों झन नींचट जावन भूल।।
घर जायेबर एक दिन होयेन हमन तियार।
आऊ एक जहाजमां सबझन भयेन सवार।।
चौपाई
सुघर बोहावत महानदी मां। ओ जहाज पहुँचीस समुँद मां।।
समुँद म गइस थोरके दुरिहा। चले लगिस वैहर जमपुरिहा।।
देख के अंधाधुंधी गर्रा। उठिस परात हमन के थर्रा।।
आंसू बोहे लागिस झर झर। सुमिरे लागेन देंवता-पीतर।।
बांचे के भरोस तज देहेन। जानेन काल-परोसा होयेन।।
साहुन बाबू मन ला पायेन। लागिस अड़बड़ रोये गाये।।
रोवत देख अपन दाई ला। अऊ देख मुँड़ कचराई ला।।
लैको मन तब रोये लागिन। छातीम बरछी हूले लागिन।।
दोहा – केवट बूजापूतमन जानिन मरबो आज।
डोंगा मां झट बैठ के भाग गइन महराज।।
भगवानेहर विपत मां देथे जतन सुझाय।
मेला सूझिस ओ बखत मां एक उपाय।।
चौपाई
दुलरू पुरू-झूरू ला छोटे। जिनला मैंहर रहें अँगोटे।।
पागाला उतार झट लेहें। बांध तुरत धारन मां देहें।।
ओही छिन साहुन हर घला। बड़का बाबू अउ नौकरला।।
लुगरा तोर एक ठन लेइस। बाँध दुसर धारन मां देइस।।
दुनों परानी चिंत्तामां भर। चपट गयेंन लकठेच मां उनकर।।
बहे लागिस फेर निंचट गर्रा। जो होगे दुन्नों के हर्रा।।
येती-ओती खुब झोंका ले। लगिस जहाज निंचट्टे हाले।
जनेन, अब ये देथे खपले। बूढ़ेन अब सब समुँद म झपले।।
धुक धुक धुक धुक धुक्की धड़कै। डेरी भुजा-नैनहर फरकै।।
राम-हरोला सुमिरक लागेवँ। कथा भागवत मैं बद डारेंवँ।।
फेर सहाय करिन नइँ पतियैहा। रकसा-साही होगै बैहा।।
निंचट बोर्रकी देहे लागिस। चक्रदेय के किंदरे लागिस।।
जेती 2 बैहर दौड़ै। तेती 2 ओह दौड़ै।।
निंचट उँच्च लहरा चढ़ जावै। ओहू ओकरे सँग चढ़ जावै।।
ओकरे सँग मां खाल्हे गीरै। येती-ओती सरसर फीरै।।
दोहा – अतका कहि लागिस कहे हे महराज दयाल।
कहत बनै नइँ मोर से अब आगू के हाल।।
होइस होही जैसना लेवा तूंहीं ज्ञान।
सुरता कर ओ बातके रोये लगथे प्रान।।
चौपाल
राजा बोलिस, सुनगा भोला। होही सबेच कहेबर तोला।।
नींचट कर नइँ सकौं छमा मैं। तब ले करिहौं कुछू दया मैं।।
छातीला हाथमां मसक के। भोला बोलिस सुसक 2 के।।
दक्खिन कोती सन सन सन सन। लागिस बोहाये ओहर छत 2।।
ऐसने करते पांच कोसले। हमन ल ओहर आगू गै ले।।
भीतर मां पानी के खारी। रहिस चटान एक ठन भारी।।
पहुँचिस जब लकठा मां ओकर। निंचट जोर से खाइस ठोकर।।
पाछू घूंच जहाज टूटगै। देख हमन के छक्का छूटगै।।
अतको मां खुब धीरज धारे। लैका मन ला रहेन सँभारे।।
हाय ! हाय !! राजा, अतके मां। साहुन चढ़े रहिस है जेमा।।
ओ तखता हिंट के जहाज ले। बोहा गइस साहुन ला सँग ले।।
लैकन मन ला निँचट सँभारत। टुकुर 2 ओमन ल निहारत।।
बैठे अलग 2 कठवा मां। लगे न बोहाये हमन समुँद मां।।
दोहा – भगवाने ला सबेके रथे याद महराज।
हमर भागबर आ गइँन दू ठन उहाँ जहाज।।
चौपाई
लेइस एक चढ़ाय हमनला। दूसर चढ़ा लिहिस ओमनला।।
लिहिन चढ़ा मोला जौने मन। रहिँन चिन्हार मोर तौने मन।।
मनखे 2 होथे अंतर। कोनो हीरा कोनो कंकर।।
दया लगिस नींचट ओमन ला। सिवपुर पहुँचा दिहिन हमन ला।।
गइँन कहाँ साहुन-लैकन मन। जियत हवैं की मरगैं ओमन।।
सोर डोर मैं खूब लगायों। ककरो कुछू सोर नइँ पायों।।
राजा बोलिस जानेवँ मैंहर। येकरेबर दुखियाहस तैंहर।।
ऐसन अड़बड़ तोर कथा है। बिलम सहेबर मन नइँ चाहै।।
अपन सबोच्च कथा ला मोला। धरके धीर सुना दे मोला।।
दोहा – सुन राजा के बातला ओहर फेर कहीस।
साल अठारा घर रहत दुख मां बीत गईस।।
चौपाई
अतका दिन मां दुन्नों लड़का। होय गइँन चतुरा अउ बड़का।।
सुनिन हाल ला साहुन मनके। मन दुखिया होगै ओमन के।।
ओ तीनों झन ला खोजे बर। बिदा माँग के गोड़ ल धर धर।।
चिथरा 2 पहिर के जुन्ना। चल देइँन घर ला कर सुन्ना।।
निकर गइँन ओहूमन जबले।पता मिलिस नइँ उँकरो तबले।।
दुनोंदीन ले बिनसिन पांड़े। हलुआ मिलिस, मिलिस नइँ मांड़े।।
मैंहर छोड़ अपन सब धँधा। दुख मां उँकर गये अँधमंधा।।
घर मां लगा दिहें मैं आगी। निकर परायें बन बैरागी।।
जप सिय-राम-कृष्ण अउ राधा। डारें खोज जगत ला आधा।।
कहाँ कहौं गनियार-घुटकू। कहि देथौं एक्के ठन ठुपकू।।
ककरो कुछू सोर नइँ पायेवँ। भूलत भटकत इहाँ ल आयेवँ।।
अब ईहाँला मरना होही। दुख छुट जाही अच्छा होही।।
दोहा – जीवित हावैं सबो झनसुन पातें जो आज।
हांसत 2 घेंचला कटवातें महराज।।
चौपाई
राजा कहिस कहौं का तोला। निंचट करम फुटहा हस भोला।।
कानुन बाँधे रतिस निं मोला। देतें छोड़ अभी मैं तोला।।
मोर लचारी तहीं समझ ले। अतका दया करतहौं तबले।।
तोला देख दुःख मां कुहरत। देथौं आजेच भर के मुहलत।।
तैंहर मोर सिपाही-संग मां। जाके मोरेच इही सहर मां।।
भीख माँग नइँ तो उधार ले। कोन्नों बिध ले आज सांझ ले।।
माल होय या होवै रूपिया। एक हजार लान दे रूपिया।।
सँझा ले तैं नईं पटावे। तो जरूर तैं मारे जाबे।।
दोहा – ओ बपुरा के नइँ रहिन कोन्नो उहाँ चिन्हार।
देतिस कोन बिदेस मां रूपिया एक हजार।।
ओहर ये ही सोंच के छोड़ जिये के आस।
अपने अपन धँधा गइस जहल म होय निरास।।
सबे बात हर जगत के रहथै दई-अधीन।
ओकर दुन्नों बेटवा ओदिन उहें रहींन।।
चौपाई
छोटे पुरू-झुरू दुन्नोंमन। भाई मनला खोजत आपन।।
ळरिपुर मां आइन ओही दिन। भोलाहर आइस जेही दिन।।
एक आदमी कहिस उँकर सन। है ईहाँके कानुन ऐसन।।
सिवपुर के जे इहाँल आथै। तेकर प्रान लेलिहे जाथे।।
तुँमन उहेंके औ येकरेबर। समझा देथौं तुहँला मैंहर।।
पुछही कोन्नों कहिहा ऐसन। हमन कटक के रहवैया अन।।
सहर मा जब घूमेबर निकरिस। उहाँल पुर्रू ऐसन सूनिस।।
सिवपुर के बैपारी बनियां। पकरे गइसै आज बिहनियां।।
कहिस कहैया करके हाँसी। ओला होही संझा फाँसी।।
दोहा – अतकासुन ओला भइस मनमां खुब संताप।
बपुरा नइँ जानत रहिस की मोरेच अै बाप।।
चौपाई
अब बड़काके हाल-भलाई। सुन ला अगापढ़ैया भाई।।
सुना चुके हौं मैंहर तुहँला। बूड़त समुँद म साहुन मन ला।।
एक जहाज के मांझी देखिन। अपन जहाज म बैठा लेइन।।
ओमन दुन्नों लैकामन ला। छुड़ा के दुखिया साहुन-सँगला।।
बाँध जबरदस्ती डोरीमां। इेइन बेंच पांच कोरीमां।।
काकाहर सिवपुर राजा के। बिसालिहिस खातिर राजा के।।
राजा-घरमां खाय दुनोझन। होगै जबर जवान दुनोंझन।ं
पुरू-बल देख अपन नैना मां। ओला भरलेइस सेनामां।।
खांड़ा-फरसी गरू गरू धर। अड़बड़ बलके खान पुरूहर।।
एक लड़ाई मां सँग जाके प्रान बचा लेइस राजाके।।
दोहा – राजा हर परसन्न होकर करके निँचट उछाव।
हरिपुरेच मां पुरू के करदेईस बिहाव।।
चौपाई
बीस बरिस ले झुरूके सँग मां। पुर्रू रहत रहिस हरिपुर मां।।
राजामेर होयके नौकर। रहिस कमाये धन खुब होहर।।
बाप-हाल सुन ओहर पातिस। रूपिया गन छँड़वा ले लातिस।।
छोटे पुरू आइस हरिपुर जब। छोटे झुरू हर संग रहिस तब।।
मालिक के सब दिन सेवा कर। अच्छा 2 बात सुना कर।।
छिन 2 पुय ला हँसवा देवै। सबो दुःखला भुलवा देवै।।
थैली यपिया के झन्ना के। कहिस पुरू ण्ुर्रूल सुना के।।
ये यपिया के थैली लेजा। तैं सराय मां अभी चले जा।।
कुछू साग अउ दार-भात बस। राँध राखबे तैंहर सुनथस।।
नींचट भूखलगे है मोला। जादा अउर कहौंका तोला।।
दू कौरा जाथे जब भीतर। तभे सूझथे देंवता-पीतर।।
दोहा – मैं ये सहर म घूम के देख के हाट-दुकान।
लहुट देख मैं आवथौं तें सिरतो ले जान।।
चौपाई
जब नौकर सराय चल देहइस। पुर्रू घूमेबर मनदेइस।
आपन दुखके कर 2 सुरता। लगिस भिंजोय धोती-कुरता।।
हाय ! अतेक खोज में आयों। कोन्नों के पत्ता नइँ पायों।।
भटकत 2 गोड़ खियागै। भूख-प्यास मां देह सुखागै।।
भाई-दाई-ददा छँड़ाये। हाय ! दई ! काबर सिरजाये ?
लागिस मौत रामेसर मांगे। ओही बखत झुरूहर आगे।
भेजे रहिस सराय म जेला। कहे रहिस रांधेबर जेला।।
समझत होहा ओही होहै। नो है ! नो है ! ओहर नो है !!
दोहा – ये ओ झुर्रू अै सुना जेला बीस बरीस।
उहें ल बड़का पुर्रू-संग रहते बिते रहीस।।
चौपाई
भाई 2 पुर्रू मन मां। आऊ दुन्नों झुर्रूमन मां।।
बीस बरिस बित गये रहिस है। रूप-भेद नइँ भये रहिस है।।
जैसन बड़का पुर्रू दीखै। तैसन छोटे पुर्रू दीखै।।
जैसन दीखै बड़का झुर्रू। तैसन दीखै छोटे झुर्रू।।
ओला अपन जान के ण्ुर्रू। ऐसन पूछे लागिस पुर्रू।।
कसरे झुर्रू होगै काय ! ऐसन जल्दी काबर आये ?
बड़का पुर्रू आय जान के। ओला मालिक अपन जान के।।
कहे लगिस झुर्रू हर ऐसन। मालिक तूं गुटियाथा कैसन।।
आज कहाँ जल्दी आये हौं। खूब बेर करके आये हौं।।
जेवन हर चुर-पाक गयेहै। खाये के नइँ बेर भये है।।
कब के बाज गये है बारा। अब तो मालिक घर म पधारा।।
जुड़ा गइस नींचट जेवन हर। घर मां तूँ नइँ गया एकर बर।।
हमर मालकिन गुस्सा छाके। देबीसाही निंचट रिसाके।।
गारी देहे लागिन ऐसन। सुने कभूच्च रहें नइँ जैसन।।
‘‘छतफट्टा ! भड़ुआ ! ननजतिया ! निर्वंसी ! चंडाल ! असतिया !
जुठहा ! गऊमार ! मुड़पिरवा ! परै तोर जाँगर मां किरवा !!!
आज अतेक्क बेर हो आइस। घर मां मालकिन हर नइँ आइस।।‘‘
कहिके ‘‘संसो नइँये तोला‘‘। मारिन-बहिरिच-बहिरी मोला !
मेंहर किरहा कूकुर-साही। बहिरी-मुठिया खा कदमाही।।
कान-देह फटकारत भागैं। भागत 2 इहाँल आगैं।।
दोहा – तुँहला लागे भूख नइँ होवै कतको बेर।
तूंहर पाछू मोला तो लेथे सनीचर घेर।।
चौपाई
कहे लगिस पुर्रू हर ऐसन। करत हवस ठट्ठा तैं कैसन।।
रूपिया दिये रहें मैं तोला। डारे कहाँ ? बतातैं मोला ।।
झूर्रू कहिस ‘बापरे ! येहे ! रूपिया कहाँ रहा तूं देहे !
ओदिन दूठन दिये रहे हा। कापी मां लिख लिये रहे हा।।
चलथौं तुहँर हुकुम के भीतर। तुहँरे हुकुम से ठकुराइन बर।।
कहथौं तुहँर गोंड़ ला छूके। लेयें लुगरा पौनेदूके।।
दू आना के लेहें फुँदरी। अउ ओतके के लेहें मुँदरी।।
करा हिसाब भइस दू रूपिया ? अऊ कहाँ के लानौं रूपिया ?
ओकर ऐसन बात ल सुनके। कहिस पुरू हर मूँड़ ल धुनके।।
मोला तो रूपिया के चिंन्ता। ये बूजा ला हँसिच के चिन्ता !
अरे ! बता, हजार रूपिया ला। कहाँ करे ? देहे तैं काला ?
कहिस झूर्रू ‘हाँसी नइँ करथौं। सिरतो 2 मैंहर कहथौं।।
हवै हँसे के इच्छा मन मां। हँसिहा कतेक चला तो घर मां।।
खसल गये है बेरा नींचट। भात जुड़ावत होही नींचट।।
परथम करैं पेट के पूजा। पाछू करैं काम ला दूजा।।
चला 2 अब बेर करा झन। करहीं गुस्सा निंचट मालकिन।।
थोरको अउर बेर हो जाही। मोर केश नइँ बाँचे पाही।ं।
पुर्रू कहिस ‘देत हौं घुस्सा। कोन करत होही रे गुस्सा !
सुन के ऐसन कहिस झूर्रू हर। ‘होही मुंड़ढक्की हर मुंहर‘।।
सुन पुर्रू ला गुस्सा लागिस। गुर्री 2 देखे लागिस।।
दोहा – जब झुर्रू घर चलेबर नींचट टेंक करीस।
पुर्रू के मन मां गुसा तब अड़बड़ उमड़ीस।।
कहिस कुवाँरा हौं अभी कहथस तैं अजगूत।
डौकी कहाँ के पाइहौं कस रे बूजापूत।।
कह अतका मारे लगिस मुटका-गोड़ेच-गोड़।
देह छँड़ा के झुरू हर भागिस मूंड़ा छोड़।।
चौपाई
अपन पीठ ला छूवत 2। पहुँचिस घर मां कुहरत 2।।
देख के ओला ठकुराइन हर। पूछिस ‘आइस रे ! मालिक हर ?‘
कहिस कहौं का मैं ठकुराइन। खूब कहें मालिक नइँ आइन।।
सिरतो कह देवत हौं मैंहर। करम फूट गै बाई तूंहर !
कहिस बगधरा, कहथस कैसन ? बैहा साही बकथस कैसन।।
झुरू कहिस मैं औं नइँ बैहा। मालिक हर होगै है बैहा।।
दोहा – मैं कहेवँ घर चला तौ मालिक हाथ पसार।
मांगे लागिस मोर से रूपिया एक हजार।।
कहें कि जेवन हो गइस ढरक गये है बेर।
कर देइन कनघेंटरी रूपिया मांगिस फेर।।
चला बबाजी घर कहें गोड़ म मूंड़ मढ़ाय।
हवैं अगोरत इस्तिरी तूंहर निंचट रिसाय।।
कहे लगिन चिल्लाय के गुस्सामां झकझोर।
भाड़ म जावै इस्तिरी कहाँ के इस्त्री मोर।।
हाय ! बबारे ! का कहों मारे लगिन अघात।
जरै करम बहिरी इहाँ, उहाँल खायेवँ लात !!
चौपाई
पुर्रू के दुलही भड़भड़ ही। रहिस सुभाव के खुब चिड़चिड़ ही।।
जे भतार नित रहै धरम मां। तेला भरमै दूसर संग मां।।
जब सूनिस भरतार कहै है। की मोर डौकी कोन्नो नइँ है।।
गुस्सा मां भर रकसिन साही। होगै खूंदे नागिन-साही।।
चड़चड़ अँगठी फोरे लागिस। पति ला अपन सरापे लागिस।।
का अतको मालुम नइँ मोला। चोरिच के गुर भाथै तोला ?
घरके खांड़ घरै मां सड़थै। छाती मां पांजर मां गड़थै।।
सुन के ऐसन गारी-गिल्ला। फते करे बर जस के किल्ला।।
चँपहिन, धमधीहिन, धमतरहिन। जुर आइन तीन परोसिन।।
उँकर मेर डौका के निंदा। करे खुब लगिस बाइ्र बिन्द्रा।।
हला 2 नथ ओमन फिरतो। करे खुब लगिन बहिनी अै सिरतो।।
डौका मन हम डौकी मनके। नइँ जानैं कुछ दुखला मन के।।
धोती पहिर लाल धारी के। बन के बैला देवारी के।।
अली-गली मां हाँसत फिरथैं। येती ओती घद्दकत रहथैं।।
अब गोई ! झन बेर लगातैं। मना पथा उनला ले लातैं।।
बिन्द्र कहिस कहत हा ठौका। ऐसने हावै मोरो डौका।।
सिरतो अब मैं जाथैं दाई। इही म दिखथै मोर भलाई।।
झुर्रू हर लेकर डोरी। चल देइस छाँदे बर घोड़ी।।
संग मां ले बिन्द्रा छै नौकर। चलिस अपन पति ला पकरे बर।।
दोहा – अतका मां छोटे पुर्रू किँदरत उहाँ गईस।
भात राँध नौकर झुर्रू बैठे जहाँ रहीस।।
चौपाई
कहिस पुरू गुस्सा कर ओला। कस झुर्रू का होगै तोला।।
कोन गढ़न के ऐसन झुर्रू बपुरा। हाट-बाजार म हाँसी करथस।।
सुन के ऐसन झुर्रू बपुरा। नींचट गइस मने-मन चकरा।।
खोजत डौका ला अतका मां। बिन्द्रा पहुँच गइस सराय मां।।
ठाढ़े देख पुरू ला पाइस। हौहाँवत झट दौड़त आइस।।
हाथ-मूंह भउँ ला चमकावत। कहे लगिस लुगरा घिरलावत।।
हाय ! हाय ! का होगै तुहँला। बाय समागै कैसन तुहँला।।
रोज 2 जाके गुरू-द्वारा। धरम ल अपन बोर तूं डारा।।
जब बिहाव नइँ भये रहिस है। तूंहर कैसन प्रीत रहिस है !!
कुँअर कन्हैया बन के आवा। हँस 2 के मोला ललचावा।।
आगू तो मोला देखे बिन। बीते जुग 2 साही छिन छिन।।
जबले मिल गै ओ लमगोड़ी। मोर मोल होगै दू कौड़ी।।
मया-दया भुरिया के सरगै। सबो प्रीत आगी मां जरगै।।
दोहा – बपुरा बिन्द्रा ला कभू देखे नहीं रहीस।
बात ल सुन के अकबका ओहर निँचट गईस।।
चौपाई
कहिस बिचारा लछिमी, सुनला। थोरको नइँचीन्हतहौं तुँहला।।
बात कहे हावा तूं काकां नइँ समझेवँ कुद काँचा-पाका।।
ऐसन ओकर बात ल सुन के। कहे लगिस बिन्द्र हर गुन के।।
मेर भाग फुट गै हा ! दाई। अब तैं जुड़ा हई ! अन्यायी।।
न्इँ चीन्हें मोहूं ला इन तो। चाबे कोथे लागैं झिन तो !
कहिस नौकरन मन से ऐसन। अरे ! तुँमन ठाढ़े हा कैसन।।
ये आपन मालिक ला बैहा। ले जैहा की ठाढ़े रैहा।।
ओमन पुरू के पाँव ल परके। पाछू ओकर हाथल धर के।।
धरे हरू झन परै फफोला। कोरकिर 2 लेगै ओला।।
मालिक ला लेजावत देखिस। झुर्रू हर भितरीले निकरिस।।
ओला नौकर अपन जान के। बिन्द्रा कहिस भउँ ल तान के।।
तहूँ इहे हस ? हुँड़हुँड़-पीला। च लना तउँ खाबे मोर जीला।।
दोहा – बिन्द्रा घर मां पहुँच के परछी झार बटोर।
भात परोसिस कहिस अऊ खावा राजा मोर।।
आलु-डुबकी साग हर रहिसै मीठ अघात।
जनम के भुखमर्रा पुरू खाइस अड़बड़ भात।।
चौपाई
इन्द्रा नाँव पुरू के सारी। रहत रहिस बहिनी-घर क्वांरी।।
मुँड़ गड़ियाये खेतल अट्ठा। करे लगिस ओकर से ठठ्ठा।।
चोरिच के गुर भाथै तोला। निँचट अचंभा लगथै मोला।।
मेंछो ला चाबै नइँ चांटो। धन 2 धन गा तोला भांटो।।
घोड़ी छाँद बड़े झुर्रू हर। गइस बजार लिये बर माखुर।।
मिलगै ऊहां ला पुर्रू हर। मालिक आय असल जो ओकर।।
घर के द्वार म दुन्नों आइन। अउ भीतर मां जाये लागिन।।
द्वारम लेहे लौठी भारी। एक सिपाही गंगापारी।।
बड़े 2 मेंछा ला ऐंठे। चीलम पियत रहिस है बैठे।।
दू दिन आये भये रहिस है। उनला बने चिन्हत नइँ रहिसै।।
दोहा – रोक के रसता ला कहिस उन ला दूसर जान।
मालिक रोटी खात हें अबै देब नहिँ जान।।
चौपाई
सुन ऐसन खुब अचरज करके। कहिस पुरू गुस्सा मां भरके।।
मालिक तो औं अरे ! महीं हर। कहाँ के मालिक आगै दूसर !
पुर्रू हर अतका कह पाइस। आगू बढ़े के डौल लगाइस।।
कहिस सिपाही नाँव के गंजन। देखौ लट्ठ खोपड़ा भंजन।।
बित्तउ भर भी बढ़े अगाड़ी। समुझौ पहुँची मौत तुम्हारी।।
अतका कह रिस मां भन्नाये। लौठी नींचट लगिस घुमाये।।
दोहा – गुस्सा मां नींचट भरे ओला जब देखीन।
सिरतो झन मारै समझ दुन्नों परा गईंन।।
चौपाई
नींचट सुन्ना ठौर म जाके। बड़े पुरू बोलिस खिसिया के।।
सुने आज रे झुर्रू तैंहर। डौकी है दोषी की मैंहर ?
मोला दूसर-संग भरमथै। अपन निंचट पतिबरता बनथै।।
आज भेद मिल गै पापिन के। बिखभरही कारी सांपिन के।।
कतको हरनी ऊपर कुदही। आखिर भुइयें मां पग धरही।।
काला आज खुसेरे हावै। लगा कपाट जेवाँवत हावे।।
अपन मुँह नइँ देखौं छुतही के। डाइन चंडालिन भुतही के।।
झुरू कहिस मोरो ला सूना। तूं कुच्छू ऊना नइँ तूना।।
क्ह देथा तूं तो भसरँग ले। झट आगी बर जाथै बँगले।।
दोहा – आज अवैया रहिन हैं मामा ससुर तुम्हार।
ओही आये होइहीं मन मां करा बिचार।।
चौपाई
ओ दिन आइस गंगापारी। ओला काकर हवै चिन्हारी।।
हावैं सतवंतीन मालकिन। नाहक गुस्सा-भरम करा झिन।।
पुरू कहिस भिथिया मां ओधे। चलरे ! तैंहर लागे बोधे।।
जा पूजा ! ओकरे मेर जीबे। दुनों गोड़ ला धो धो पीबे।।
मैं जाथौं सालिक भाई-घर। भूख म थर्रा गै है जीहर।।
ऐसन कड़ुवा बात सुनाके। रेंगिस पुरू अउ थोरक जाके।।
छींके लागिस ‘‘आः छू ! आः छू‘‘। रेंग के झुर्रू पाछू पाछू।।
क्हिस की हाहाक आवत हावौं। तूँहर पेट ल छूवत हावौं।।
ठठ्ठा जब ऐसन सुन पाइस। पुरू भुला दुख नींचट हाँसिस।।
दोहा – सालिक-घर बड़का पुरू नौकर-संग गईस।
भौजाई मेर नतैतिन खाये बर मांगीस।।
ओहर पानी हेर के देइस पिढ़ा मढ़ाय।
गोड़ धोय के पुरू हर जेंये लागिस जाय।।
औंहां-झौंहां प्रथम तो ओहर खुब खाईस।
धीरे 2 खात फिर ऐसन कहे लागीस।।
चौबोला
धन ! धन ! भौजी-रानी, तुँहला राँधे हावा ऐसन।
पांडोमन बर द्रुपदा जेवन रहिस बनावत जैसन।।
ये थारी हर सब कोती ले ऐसन निँचट सफा है।
जैसन भीतर अउ बाहिर ले मन हर तुहँर सफा है।।
तात बफात भात ले ऐसन सुगँध अघात उड़त है।
जैसन तूंहर निरमल जस हर जग मां बगर उड़त है।।
घारी-गोभी-कांदा-भांटा साग मीठ हैं ऐसन।
तूंहर बोली-ठोली भौजी मीइ लागथे जैसन।।
मिलवट दार चला-राहेर के बटुरा आऊ तिवरा।
तुँहर देह-साही दीखत है सुन्दर पिउँरा पिउँरा।।
धनिया-मिरचा लसुन-पुदेना डारे चुरपुर चटनी।
उँटनी भौजी, तुँहरे साही येहू है मनलुटनी।।
दीखथे ऐसन चेंच के भाजी मनराजी चुटपुटुवा।
दिखथै जैसनकरिया 2 भैया हर करलुठुवा।।
जरे बिजौरी अउ पापर मन दीखत हावैं ऐसन।
दिखथें कबरी जरे तेल मां तूंहर मौसी जैसन।।
दोहा – आऊ थोरक खायके सबो भूख ला खोय।
भौजी मेर कहे लगिस धो मुँह-हाथ अँचोय।।
नींचट अच्छा रांधथा लेइहा मोरो नाम।
सँकरी सोन के देइहौं संझा आज इनाम।।
चौपाई
छोटे पुरू-झुरू मन खाके। बैठ गइन कुरिया मा जाके।।
साम्हूं जा पुर्रू ल सुनाके। बिन्द्रा कहिस निँचट झन्ना के।।
अब जादा मुँड़ मां झन मूता। दसा दिहे हौं जाके सूता।।
चल देइस अतका कह ओ जब। कहिस पुरू हर झुर्रू से तब।।
भाई झुर्रू बता तो तैंहर। सपना अै की काये येहर ?
जहाँ ले सुरता हावै मोला। किरिया खाके कहथौं तोला।।
दोहा – मैं हर करें बिहाव नइँ कोन्नो डौकी संग।
फेर आगइस कहाँ ले ये अड़बड़ परसंग !
ये डौकी, डौकाथे मोला डौका जान।
टूरी हर भांटो कथे, कहाँ हवस भगवान !
सूत भुलाये मां कभू होये होय बिहाव।
तेला नइँ जानौं बबा ! तोर लँग कौन दुराव।।
चौपाई
ऐसन सुन झुर्रू हर बोलिस। तुहँर बिहाव भये जो होतिस।।
ते पागा बांधे मनहरिया। बन के सुघर अघात बरतिया।।
तुँहर बिहाव म मैं नइँ जातेवँ। अउ लडुवा-पपची नइँ खातेवँ।।
रब्बस रब्बस खावत लडुवा। डौकिन के नइँ बनातेवँ भड़ुवा।।
पुरू कहिस आँखी ला फरिया। कुच्छू हवै दार मां करिया।।
ये डौकी ला लागै आगी। चले भाई ! इहाँ ले भागी।।
अतका कह के ओमन ऊहाँ। देखे लागिन ईहाँ ऊहाँ।।
भागे लाइक मोरी देखिन। पारी 2 मूंड़ खुसेरिन।।
निकर के हपटत गीरत भागिन। जल्दी जा बजार मां पहुँचिन।।
दोहा – उहाँ ल उनला गोरिया एक सुनार मिलीस।
ओहू जान बड़े पुरू ओला कहे लगीस।।
चौपाई
ओ दिन तूंहीकहे रहे हा। की दू सँकरी बनवा देहा।।
बाबू मन से बनवा तेला। ले लाने हौं येला लेला।।
कहिस पुरू कहथस का तैंहर। चिन्हते नइयौं तोला मैं हर।।
सँकरी बर मैं कहे रहें कब ? गजब रीत है ईहाँ के सब !
बोलिस ओ हँस खुलखुल खुलखुल। पेट हलावत थुलथुल थुलथुल।।
काबर चिन्हिहौं रथौं सरग मां। अउ तूं बस था देस अरब मां।।
ले लेवा झट के तूं सँकरी। पाछू लेनइँ पाहौं मछरी।।
दोहा – नइलौं नइलौं पुरू हर कतको बेर कहीस।
सँकरी जबरन हाथ मां देके चल देईस।।
ऐसन ढँग ला देख के पुर्रू गै घबराय।
नौकर मेर कहे लगिस कान म मुँह ल लगाय।।
चलरे ! ईहाँ ले अभिचजाई हमन पराय।
लान कँवरियाखोज के काँवर सिँका धराय।।
अजगुतइहाँ के हाल है देख प्रान घबराय।
टोनही मन मे सहर ला देये हवैं सिहाय।।
चौपाई
सँकरी देइस जे सुनार हर। रिनियाँ रहिस काकरो तेहर।।
पुलिस-सिपाही बलवा लेइस।ओहर ओला बँधवा लेइस।।
जब सुनार फांदा मो परगै। मछरी-बछरी सबो बिसरगै।।
रहिस सुनार जहल जब जावत। बड़े पुरू हर मिल गै आवत।।
कहिस जहल ले बहँचा लेवा। सँकरी के रूपिया ला देवा।।
पुरू कहिस सँकरी दे मोला। तब तो रूपिया देहौं तोला।।
ऐसन ओकर बात ला सुन के। मन मां निंचट अचम्भा गुन के।।
कहिस सुनार अभी तो देहेवँ। पुरू कहिस मैंहर नइँ पायेंव।।
बाते बात म बढ़िस कड़ाई। दुन्नों लागिन करे लराई।।
सोरठा – पुरू कहिस तोर बात ऐसन अड़बड़ है निंचट।
नइँ उपास नइँ धात लकर 2 फरहार बर।।
दोहा – रूपिया नइँ पाइस अपन ते खातिर खा खार।
लिहिस पकड़वा अपन सँग ओहू ला सोनार।।
चौपाई
दूनों जहल मां जात रहिन जब। छोटे झुरू ला देखिस पुरू तब।।
गये रहिस कँवरीहा खोझे। आत रहिस चुचुवाये सोझे।।
बड़े पुरू गुन बोलिस आतो। घर मां हमर दौड़ के जातो।।
हाल परानी मेर बताबे। जल्दी सौ रूपिया ले लाबे।।
नौकर घला खाय गै धोका। अपने मालिक जानिस ओका।।
सन्न हो गइस देख बँधाये। कहिस मने मन अचरज छाये।।
कब ये मुँड़ मां मौर बँधाइन। कब ले येहू डौकी पाइन।।
उहेँ ल भेजत हावैं का इन। जहाँ ल आलू-डुबकी खाइन।।
जहाँ बैठ के कुरिया-भीतर। रोइन नाक ल छींकर छींकर।।
कहथैं अब ऊहें जा तैंहर। इन ला का होगै परभेसर।।
ऐसन गुनत झुरू चल देइस। घर जाके रूपिया ले लेइस।।
दोहा – नौकर झुरू ल भेज के लाने बर बनिहार।
डरत 2 किंदरे लगिस छोटे पुरू बजार।।
चौपाई
धीरे धीरे सटका टेंकत। खाँसत हाँफत निहुँरे रेंगत।।
कानी भैरी देह के सुखरी। आइस एक पुरू मेर डोकरी।।
पूछिस तैं बाबू अस कागा ? आज निँचट बाँधे हस पागा !
जात रहें तोरेच मेर मैंहर। येही मेर मिल गये तैंहर।।
तोर बहुरिया मोर बहू मन। गींया बदबो कथैं दुनोंझन।।
हवैं डेरावत ओमन तोला। हुकुम का देवत हस मोला।।
कौवा गै पुर्रू सुन ऐसन। कहिस कि बुढ़िया कहथस केसन।।
पुर्रू कहिस बात अउरे कुछ। बुढ़िया समझ लिहिस अउरे कुछ।।
दोहा – टेढ़वा देखत एके ठन आँखि ल निँचट बटेर।
टेंटा ला लिब 2 करत बोलिस पुर्रू मेर।।
चौपाई
पूछे हस तैंहर का बदहीं ? सुन बेटा ! तुलसी दल बदहीं।।
पुरू कहिस आफत के पुड़िया। कहाँ ले आगै इहाँ ल बुढ़िया।।
रकस 2 मुँड़ ला खजुवावत। बोलिस बुढ़ियादेह डोलावत।।
हाहो लुगरा-नरियर ओमन। बिसा लिहे हैं चिन्ता कर झन।।
कहिस गुसा मां भर पुरू हर। अरे परेतिन बुढ़िया तैं मर।।
बुढ़िया बोलिस तैं का कहथस। घर के मोर साग ला पुछथस ?
बने रहिस बरबटी मसलहा। अउ सेमी-भांटा तेलपरहा।।
दोहा – समझ के ओला टोनही मन मां अपन डराय।
ओकर मेर ले पुरू हर दुरिहा गइस पराय।।
चौपाई
कहाँ ले आके झट्ट उहों ला। छेंकिस एक कोसटिन मोला।।
बड़े पुरू ला रँग के पिउँरा। देहे रहिस पोतिया लुगरा।।
ओला बड़का पुर्रू जानिस। दाम के रूपिया मांगे लागिस।।
देख के ओला धामर धूसर। समझिस पुरू टोनहीं दूसर।।
कहिके आऊ आइस ! आइस !। हाय ! बाप ! कह उहों ले भागिस।।
कोस्टिन जब रूपिया नइँ पाइस। अड़बड़ गारी देहे लागिस।।
चमकुल मुलमुलही अउ फुलही। पहिर पोतिया येकर दुलही।।
सारी-परछी-खोल म बुलही। ये भड़ुवा के छाती फुलही।।
रूपिया मांगे लगें भगाइस। हाय ! मोर कुरिया जोर गाइस।।
चौबोला
मिलिस एक झन खोरवा नाऊ बड़ गोटकार रसीला।
हाँसत पूछिस कब ले होहीमालिक बाबू पीला।।
मोर नवाइँन दुन्नों झनमनलीला अउ कौंसीला।
पुछथैं कब ले लुगरा पाबो खाबो रोटी-चीला।।
मिलिस एक झन राउत आढ़े कमरा, पीयत चोंगी।
कहिस चला घर रौताइन ला भूत धरे है ढोंगी।।
देथे छोंड़ फेर धर लेथे खिसिया गइन झरैया।
मोला तुहँरे बांधेबर है बैला-बछरू-गैया।।
दोहा – येती ओती टरक के धुकधुकी ला थाम।
पिंड दँड़ाइस सबो ले पुर्रू हर जप राम।।
कहिस मने मन अभी ले आइस नइँ बनिहार।
टोनहां-टोनहीं सबोच हैं इहाँ के नर अउ नार।।
चौपाई
ओही बखत झुरू हर आइस। रूपिया के थैली ल धराइस।।
पूछे लागिस ओहर ऐसे। छूटा तूं थाना ले कैसे ?
ये रूपिया मन ला बिन्द्रा हर। भेजे है लागा छूटे बर।।
जहल म जात रहिस पुरू बड़का। पकड़े गये रहिस नइँ छोटका।।
येकरे खातिर अचरज मां भर। लागिस मन मां कहे पुरू हर।।
थाना कब मैं गयें अभी कन। नांच नचाइन हां टुनहीं मन।।
अभिच कहाँ ले लागा होगै। ये बूजाहर बैहा होगै।।
दोहा – गुन है इहाँ के पवन मां देथे झट बैहाय।
नइँ तो काबर झुरू हर बैहा होतिस हाय।।
देवी दाई कहाँ हस ? मौंहू झन बैहावँ।
देहौं जांवर बोकरा पहुँच के दूसर गाँव।।
अपन द्वार मां एक झन डौकी खड़े रहीस।
हाथ के चूरी मां अपन देखत मुँह ल रहीस।।
पढ़त हनूमत चालिसा पुर्रू चले लगीस।
ओ डौकी-नजदीक मां सँकरी धर पहुँचीस।।
चौबोला
डौकी रहिस कछौरा भीरे पहिरे लाली लुगरा।
सोने सोन के गहना लादे करे रहिस मुँड़ दघरा।।
छेख पुरू ला छोर कछौरा जल्दी मुँड़ ला तोपिस।
म्ुसकावत आँखी ल नचावत लुगरा झारत बोलिस।।
अहो दुलरूवा देवर बाबु, अभी कहाँ जावत हा ?
हां हां, जानेवँ, मोला सँकरी देहेबर आवत हा !
चारेच तोरा के बनवाया ठग्गू हौजी हौजी !
कहाँ छोटकन सँकरि कहाँ, अउ तूँहर रानी भौजी !
जबरन भौजी बनवैया के मुँह ले सुन के ऐसन।
कहिस लजाय पुरू ‘मोला तूं ठठ्ठा करथा कैसन !‘
ओहर बोलिस देख लजावत, अहो ! नवा लजकुरहा।
अतके सुन चेथी कौवागै अउ है उरहा-धुरहा !
भौजी औं की हँसी-खेल है पिया नून अउ मठ्ठा।।
तुँहला खोले खोल रेंगैहौं बोहा के जंगी गठ्ठा।।
तुँहर परानी दिलजानीला हमर देवरानीला।
खवा के चीला धान कुटाहौं पिया 2 पानी ला।।
आज मँझनियां बेर हमर घर आके जब तूं खाया।
मोर रँधाई तुंहला भाइस साग ल खूब सिहाया।।
कोरा मां ले नोनी ला मोर अपन भतीजिन छोकरी।
कहे रहा इनाम देहे बर साँझ ले सोन के सँकरी।।
धरे हवा, देवा खीसा मां काबर अभी लुकाया ?
जब छूरा के डरेच रहिस तौ काबर मूंड़ मुंड़ाया ?
जाथौं काम कुछू मैं करिहौं हँसी निं भावै मोला।
धोकर 2 पाँव ल परके तूंहिँच देहा मोला।।
दोहा – अतका सुन के पुरू हर घबरा निँचट गईस।
चिल्ला के खुब जोर से ओकर मेर कहीस।।
निकरिस येहू टोनहीं अरे बाप ! रे बाप !!
बोल लबारी मूंड़ मां कुछू देय झन थाप।।
कस ओ ! घर मां तोर कब मैंहर खायें भात ?
कब सँकरी देहौं कहें ? लबरी हवस अघात ?
अनचिन्हार हन दुनोंझन यही ल कहथें राम ।
जान नहीं पहिचान नहीं मुन्नू मियाँ सलाम !
चौपाई
अतका सुन के ओ बपुरी हर। सन्न होय के गै घर भीतर।।
उँचकुल के बेटी अै भोरी। नाता जान के करिस ठिठोरी।।
गुनिस कि इनला होगै काये। इन बैहा होगै हैं काये।।
अैसन मन मां गून गुना के। कहे लगिस ब्रिन्द्रा मेर जाके।।
होगै हाय ! गजब देवरानी। बया गइँन देवर धुरधानी।।
उनला लान बैद बलवावा। कुछू दवा-दारू करवावा।।
ओही बखत हतकड़ी पहिरै। आइस बड़े पुरू घर-भितरे।।
रहिस मँगाये ओहर रूपिया। घर ले ज बनइँ आइस रूपिया।।
तब थाना के इस्पेट्टर हर। भेजिस पुरूला रूपिया बर घर।।
कहिस कि जा यपिया दे देबें। अउ हतकड़ी ल कटवा लेबे।।
रहिन संग मां चार सिपाही। किरिच खोंच पहिरे बरदाही।।
छोटे झुरू-हाथ बिन्द्रा हर। अपन पती ला छुँड़वाये बर।।
थैली मां सौ रूपिया भेजिस। बड़का पुरू मेर नइँ पहुँचिस।।
छोटे झुरू भेद नइँ समझिस। जा छोटे पुरू ला दे देइस।।
घर जा बड़े पुरू गुस्सा कर। कहिस अरे पापिन, तैं काबर।।
घर-कपाट दे दिहे रहे तैं। काला आज जेंवात रहे तैं।।
मूंड़ मुड़ाय चढ़ा गदहा मां। रहि जा किँदरै हौं रस्ता मां।।
नौकर ला भेजें रूपिया बर। रूपिया तैं नइँ देहे काबर ?
चौबोला
मन मां बिन्द्रा गुने लगिस मैं पर ला कहाँ बलायें !
अत्तिस-सालन बत्तिस भोजन इनहीं ला तो जेवायें।।
फेर ये कैसे बकरत हावैं सिरतो कहिंन जेठानी !
नींचट होगैं बैहा दाई जरै मोर जिँदगानी।।
देय सिपाही मन ला रूपिया पति ला छुँड़वा लेइस।
फेर अपन सब झन नौकर ला ऐसन हूकुम देइस।।
तूँ मन जबरन बाँध के इनला भर दा अँधियारी मां।।
मैं हर जाथौं बैद बलाये हवै अपन बारी मां।।
नौकर बाँधे लागिन जबरन हाथ-गोड़ ला धर के।।
देह छँड़ावै गारी दैवै पुरू गुसा कर कर के।।
कहे लगिस मैं नइँ बैहा मोला झन बाँधा रे।।
लमचोंची हरामजादी ओ बेंदरी ला बाँधा रे।।
बैहा जान के बात ल ओकर कोन्नों मन नइँ सुनैं।।
जतके 2 ओ गुस्सावै ततके बैहा गूनैं।।
झुरू घला ला समझ के बैहा दुनों ल धाँधिन झटके।।
चौपाई
बिन्द्रा बेद ले आत रहिस जब। एक झन नौकर आय कहिस तब।।
अभी देख के मैं कौवा गैं। छुट के दुन्नों झनमन आगैं।।
बनियापारा बूलत हावैं। हाथी साही झूमत हावैं।।
लगत हवै डर अड़बड मोला। चाबैं कोथैं झन कोनोंला।।
बिन्द्रा ऐसन सुन कौवा गै। बपुरी हर दुख मां थररागै।।
दूसर मनखेमन ल युना के। कहे लगिस लकठा जा 2 के।।
दौंड़ा रे भई ! दुख के साथी। फेर ढिलागै बैहा हाथी।।
ठुला गइन मनखे दस बारा। दौंड़े लागिन ओमन झारा।।
दोहा – येती-ओती दौड़ के खोजे सबो लगीन।
उहिदे मंदिर मेर मां ठाढ़े हवैं कहींन।।
चौपाई
बड़का पुरू-झुरू रहिन बँधाये। अँधियारी मां रहिन धँधाये।।
ओमन जिनला उहाँ निहारिन। बड़का पुरू-झुरू अैं जानिन।।
बड़े पुरू-झुरू नोहै ओमन। छोटे पुरू-झुरू अैं ओमन।।
देख हाल ऊहाँ के ओमन। करत अचंभा रहिन मने मन।।
बोझा के अंताज मढ़ावत। रहिन भगे के डौल लगावत।।
ओमन इन दुन्नोंल धरे बर। दाँत चाब के दौड़िन सर सर।।
झुरू देख ओमन ला पाइस। मालिक मेर कहे अस लागिस।।
ज्ेकर घर डुबकी खाये हन। दुख देई ओही नँगनाचन।।
कमरू-कामँछा के डउकी। आगय फिर मोहे बर गउकी।।
इही इहाँ के मुखियाइन अै। टोनहीँ मन के गुरवाइन अै।।
दोहा – मंदिर-भीतर जाइके झटले लुका गईन।
उहें रहिस है महंतिन तेकर मेर कहीन।।
अओ महंतिन, परत हन हम दुन्नों झन पाँय।
धरवैया मन ले आओ ! हम ला ले बहँचाय।।
चौबोला
मंदिर के साम्हूँ मां अड़बड़ हल्ला होये लागिस।
करके बंद कपाट पुजेरिन झट बाहिर मां आइस।।
बिन्द्रा कहिस कि तोला देहौं खोवा-खांड़-मिठाई।
दे निकार बैहा भतार ला अओ पुजेरिन दाई।।
पूछे लागिस भेद लेय के ओ भक्तिन हर ऐसे।
नोनी, बता तोर घर केहर बैहा होगै कैसे ?
सब धन चोरी होय गइस की ? मरगैं कोनों येकर ?
की ककरो सँग हवै भुलाये कस ओ बेटी, येहर ?
बिन्द्रा हाथ हलावत मटकत कहिस कहे तैं ठौका !
चार बरिस दू महिना होगै हाव पर-संग डौका।।
जेतर-मंतर जानत हसतो मैं पाँ परौं सिखादे।
सुख पाये के मोर बनौकी दाई, कुछू बनादे।।
चौपाई
पुर्रू ककरो तीन-पाँच मां। नहीं रहै नित रहै साँच मां।।
अपने रस्ता आवै-जावै। कभू धरम ला नहीं डिगावै।।
डौकी मन ला देख पराई। समझै बेटी बहिनी दाई।।
क्बले रहै घरे मां खुसरे। बाहिर जावै बूले-किँदरे।।
अतके खातिर जरा के चोला। बिन्द्रा भरमै पर-संग ओला।।
किँदर-घूम जब घर मां आवै। बिन्द्रा चिर्र चिर्र चिर्रावै।।
भरमेभरम के गोइ निकारै। गारी के आरती उतारै।।
सुन गारी चेथी झन्नावै। बपुरा घर ले फेर परावै।।
दोहा – भक्तिन बिन्द्रा ला निँचट चिड़चिड़ही समझीस।
गूनिस इही सुभाव मां लैका बया गईस।।
चौबोला
पूछिस भक्तिन भेद लिये बर तैं कुछ अकिल लगाते।
करके रोज लराई नोनी ओला नइँ समझाते ?
बिन्द्रा कहिस भऊँला चमका अओ पुजेरिन दाई।
गउ की कहथौं मैं इनकर से रोजे करौं लराई।।
खात उठत बैठत मां जब 2 मैंहर औसर पावों।
गारी दे 2 के मैं इनला रोज 2 समझावौं।।
जब ये सूते लागैं मैंहर इनला सुतन निँ देवौं।
करौं लराई खातो खानी खान घला नइँ देवों।।
कहिस पुजेरिन, मर ! हत्यारिन, मुँह मां आगी लागै।
रोज 2 के काँव काँव मां बपुरा हर बैहागै।।
होथै चिड़चिड़ही डौकीके गारी बिखहर ऐसन।
बैही कुतिया के दाँतों मां बीख रहै नइँ जैसन।।
चल ! किटकिटही तोर हाथ मां नइँ दौं येला मैंहर।
दू दिन मां अल्हरा कल्हरा के मार डारवे तैंहर।।
हाथ देख के जूड़ 2 में येला दवा खवाहौं।
हो ही दया नरायन के तौ जल्दी बने कराहों।।
दोहा – अैसन बोल कपाट मां तारा करके बंद।
गइस पुजेरिन अपन घर मन मां होत अनंद।।
चौपाई
दिन गै बीत सांझ हो आइस। भोला रूपिया नहीं पटाइस।।
आठ सिपाही मन ओला धर। ले गईन फांसी देहे बर।।
लकठेच मां मंदिर के सुन्दर। बने रहिस फांसी के घर हर।।
गुदुम 2 बजवावत बाजा। आइस हाथी मां चढ़ राजा।।
फांसी ला देखे के खातिर। खूबिच मनखे जुरिन तिरे तिर।।
राजा के मन दया समाइस। डौँड़ी पिटवा के कहवाइस।।
दयावान कोनों मनखे हर। ये बुढ़ुवा ला छँड़वाये बर।।
मोर मेर रूपिया गन देवै। जग मां अपन नाँव कर लेवै।।
देतिस उहाँ ल कौन रूपैया। रहिन तमासा सबो देखैया।।
चौपाई
अतके मां ओ पुरू-झुरू मन। घर मां रहिन बँधाये जेमन।।
नौकर मन ला लालच देके। आइन राजा मेर जी लेके।।
पुरू कहिस अरजी सुन लेवा। महराजा नियाव कर देवा।।
मोर जीवलेई डौकी हर। रिछिनी साही सुभाव है जेकर।।
झुर्रू नौकर ला अउ मोला। बैहा जान के निंचट दुनोंला।।
जबरन डोरी मां बँधवाइस। सोज्झे बर दुर्गत करवाइस।।
फोकटे फोकट बर चिचियाथै। बया गये के दोष लगाथै।।
मैं हौं चंगा नींचट ऐसन। रथें निरोगि ल मनखे जैसन।।
जो मैं हो हौं कहत लबारी। बैद बला देखवा ला नारी।।
बड़का पुरू-झुरू दुन्नों ला। येकटक देखे लागिस भोला।।
समझिस छोटे पुरू-झुरू अैं। ये दुन्नों छोटका बाबू अैं।।
भाई-दाई ला खोजे बर। गये रहिन बपुरा मन नींकर।।
खुब दिन मां देखत हौं इनला। भेंटिन की नइँ भेटिन उनला।।
मोर हाल जब ये सुन लेहीं। तो रूपिया गन छँड़वा लेहीं।।
ऐसन गुन लकठा मां जाके। कहे लगिस आँसू चुचुवाके।।
इहाँ तुँमन कब आया बेटा। साहुन-भाई मन ला भेंटा ?।।
ऐसन सुन गुसियाये मने मन। टेढ़वा मुँह कर लेइन ओमन।।
देख हाल ओमन के ऐसन। कहे लगिस भोला हर ऐसन।।
ये मन कैसन होगे लेड़गा। काबर कर लेथें मुँह टेड़गा।।
पाँओं घला परैं नइँ काबर। बतरावत हावैं नइँ काबर।।
बेटा, का होगै रे तोला ? नइँ चीन्हस तैं अपना ददोला।।
अतका सुन पुर्रू कौवा के। कहे लगिस नींचट खिसिया के।।
दोहा – बुड़गा, कैसन बकत हस निँचट अनाप-सनाप।
चिन्हौं निं जानौं अउ नहीं कैसे के अस बाप।।
ये मन जब लैका रहिन तबे बेचाय गईन।
येकरे खातिर बाप लाये मन नइँ चीन्हींन।।
चौपाई
भोला के मन मां दुख छागै। कहिस कि कलऊ निँचट खरागै।।
जेकर पैर निँ फटिस बिमाई। ओ का जानै पीर पराई।।
बिपत ल मोर देख आंखी भर। लाज के मारे ये मूरख हर।।
देखत बटबट कहथै अटपट। मोर बाप तें नोहस चल हट !!
मनखे ला बिपदा जब आथै। तब अपनो दूसर हो जाथै।।
ओही बखत पुजेरिन आइस। छोटे पुरू-झुरू ला सँग लाइस।।
अब तो उहाँ ल दूझन पुर्रू। आऊ होगैं दूझन झुर्रू !
दू मुहरन के देख दुदू झन। निँचट अकबका गइन सबो झन।।
दोहा – बिन्द्रा कौवा गइस जब दू डौका देखीस।
तरी मूँड़ करके लजा मन मां कहे लगीस।।
चौपाई
धरती अभी फटजा जा तैंहर। समा झट्ठ ले जावौं मैंहर।।
दई, तोर जौंहर हो जावै। तोला भैंसासुर हर खावै !
दू डौका मोर होगै दाई !। होगै नींचट मोर हँसाई।।
एक्के साही गोरिया गोरिया। कहाँ ले आगैं इहाँ ल छलिया।।
एक्क साही हवें मेंछर्रा। दुन्नों हावैं कर्रा कर्रा !
स्मझ सकौं मैंहर नइँ ठौका। काला कहौं अपन मैं डौका !
एक रूप-रँग एक्के मुहरन देख पुरू-झुर्रू दू दू झन।।
समझ गइस राजा हर झटकन। ये दू जोड़ी चारों झन मन।।
बेटा-नौकर अैं भोला के। भाग जाग गैअब बपुरा के।।
दोहा – बाप ल लेइस चीन्ह झट छोटे पुरू घलाय।
करिस बाप के पैलगी गोड़म मूँड़ मढ़ाय।।
दोहा – राजा ला ओ मेर जब बिन्द्रा हर देखीस।
गिर के डंडा सरन तब बिनती करे लगीस।।
राजा-महराजा सुना कहथवँ हाथ ल जोर।
बया गये हावैं निंचट घर-गोसैयाँ मोर।।
उनला मँदिर म धाँध के भक्तिन गइस पराय।
तिरिन चाब के कहत हौं तूं देवा निकराय।।
अतका सुनराजा कहिस चपरासी ल सुनाय।
घर मां हावै महंतिन झटके लान बलाय।।
चौपाई
जनम-दुखी बुढ़वा भोला ला। चार पुरू-झुरूये पाँचो ला।।
आँखी ला अराम देहे बिन। ऐसन देखे लगिन पुजेरिन।।
पुन्नी के चंदा ला लकलक। देकथे चकही जैसन येकटक।।
परिस पाँव मां झट भोला के। ऐसे कहे लगिस घिघियाके।।
तुहीं मोर धन अउ कौड़ी औ। तुहीं मोर जाँवर-जोड़ी औ।।
हमर-तुम्हर ये मन अैं बेटवा ! करिस दया दइ देइस भेंटवा।।
ऐसन कह सुन हो खुब पुलकित। होय गइन दुन्नों झन मुरछित।।
मन मां खूबखुसी जब होथे। तब के हाल ऐसन होथे।।
बड़का पुरू-झुरूमन ला धर। केवट जब लेगैं बेंचे बर।।
तब रोवत 2 भर दुख मां। आय गइस साहुन हरिपुर मां।।
तब मुखिया 2 मनखे मन। उहें के रहवैया अैं जेमन।।
बने चाल ओकर जब देखिन। ओला देइन बना पुजेरिन।।
दोहा – मुरछा ले झट जाग के दुन्नों पुरू ल पोटार।।
फलप 2 के रोये लगिस साहुन हर बम्फार।।
चौबोला
मोर कन्हैया ! अउ बलदाऊ ! मोर राम ! अउ लछिमन !
मोर अभगिन के मुंह पोंछन ! मोर परान-रतन-धन।।
मोर लवाई आवा बछुरा ! चाट देह ला झारौं।
उर मां मसक कसक लाजी के मैंहर अपन निकारौं।।
अँधरी के मोर लाटी-बिड़गा, मोर कहैया दाई।
मोर पढ़ैया मैना सूवा, दुख के मोर दवाई।।
मोर गरीबिन के ओंटी के रोटी-मुर्रा-लाई।
मोर अधीनिन भुखमरहिन के मेवा अउर मिठाई।।
कतको सहर गाँव अउ जंगल, परबत डाँकत डूंकत।
काँटा-गोटी गड़त सहत दुख मनखे मन ला पूछत।।
गाय के साही मैं बोंबियावत गुनें निं अहिरा-बिछुरा।
येती-ओती चारों कोती खोजें तुहँला बछुरा।।
तुंहर दुख मां रो 2 बेटा फुटगै रे मोर आंखी।
आँसू पोंछत नई सुखाइस भैगै जीव असाखी।।
जर 2 होगै निँचट सुखागै मोर मुरही के चोला।
कहाँ प्रान हर रहिस लुकाये यही अचंभा मोला !
मोर खिलौना जौंरा-भौंरा ! तूंहीं घोड़ा-हाथी।
तुंहीं दुवे झन हावा साथी पुरखा मन के थाथी।।
उजरे घर के मोर बसैया, कुल के दू ठन दीया।
जाँवर-जीया जुग 2 जीया दूध-बतासा पीया।।
कुर्री के साही रोवाई सुन दुखिया साहुन के।
आँखी ले आँसू चुचुवागै अैर-गैर सब झन के।।
राजो रोये लागिस मुँह मां लाल रूमाल छबक के।
काला नइँ पिघलाय रोवाई जग मां डौकी मन के ?
राजा हर बिरदांत्त ल अैसन देख मने मन गल गं।
ओकर मन के सब बिचार हर छिन मां एक बदल गै।।
कहिस इसारा मां भोला ला लकठा अपन बला के।
देहें छोंड़ अगा भोला ! मैं तोला बिन रूपिया के।।
राजा के दया ला अैसन देख सबो मनखे मन।
उज्जर, लाल फूल बरसा के कहिन सबो झन धन ! धन !!
भोला मन राजा ला झुक 2 खूब पैलगी कर कर।
मन मां होत अनंदित नींचट गइँन बड़े पुर्रू-घर।।
बिद्रा सास के सीखापन ला गांठ बाँध धर लेइस।
पति बर भरम रहिस जो राखत ते सबला तज देइस।।
बड़े पुरू हर सुख पा मन मां, नींचट बने लगन मां।
भाई के बिहाव कर देइस इन्द्रासारी -सँग मां।।
दुख ला सबो भुला आगू के खूब खुसी हो मन मां।
रहे लगिन भोला साहुन मन बेटा-पतो सँग मां।।
फिरिस सिरी भगवान-दया से दिन हर जैसन इनकर।
अगा पढ़ैया ! फिरै तैसन सब्बो झन के दिन हर।।
रहिन हवैं पुरू-झुरू मन एक्के साही दू दू भैया।
मनखे मन ला होये लागिस आऊ भूलभुलैया !
एक पुरू अउ एक झुरू ला दूसर पुरू, झुरू जानैं।
भेद खुलै ला घोलँड 2 के हँस 2 कपड़ा सानैं।।
चौपाई
हाँसत 2 बीन बजावत। नारद रिखि भगवत-गुन गावत।।
पुर बैकुंठ गइँन ओही दिन। भेंटिस भोला सब ला जे दिन।।
जहाँ रहिन लछिमी-नारायन। बैठे रहिन देवता सब झन।।
जब भगवान मुनी ला देखिन। उनकर से तब ऐसन पूछिन।।
मुनि कोती लै आवत हावा। काबर मुँच 2 हाँसत हावा।।
परथम हरि के पाँव म परके। कहे लगिन नारद बल करके।।
का गुठियावौं अंतर जामी। तूं सब जानत हावा स्वामी।।
मरत लोक मां अड़बड़ सुंदर। सहर एक है नाँव के हरिपुर।।
उहें आज मैं जाय गुसैयां। देखेवँ अड़बड़ भूलभुलैयाँ !!
अतका कह के नारद झुल झुल। हाँसे लागिन खुल 2 खुल 2।।
दोहा – पुरू-झुरू के हाल जब देइन मुनी सुनाय।
हँसे लगिन सब देवता नींचट खल खलाय।।
चौबोला
जब गनेश जी हाँसे लागिन थाम 2 के स्वांसा।
तब तो माच गईस उहाँ ला अड़बड़ एक तमासा।।
समझ बिलाई के ‘म्याऊं ! म्याऊं !‘ मुसुवा उँकर हँसी ला।
डर के मारे भागे लागिस पीठ म बोहे उनला।।
अगिन देवता हाँसे लागिन होके निंचट बिहाला।
निकरे लागिसउनकर मुँहले तब अगिनी के ज्वाला।।
येती-ओती सब्बो कोती आगी खूबिच बर गैं।
जरी-मूल ले जमराजा के डांढ़ी-मेंछा जरगैं।।
पवन देवता हाँसिन ऐसन तूँमन सबो सुना गा !
उँकर हँसी मां उड़ा 2 गै देवता मन के पागा।।
मेघ देवता हाँस 2 के जल बरसाये लागिन।
गइस बुझाआगी सब देवता ओमा तौंरे लागिन।।
ऐसन अड़बड़ महादेव जी हाँसिन, सुन के जेला।
डरा गइस अउ कूदे लागिस उनकर नँदिया बैला।।
डँकर हँसी के धक्का खाके हाथ के डमरू ऊहाँ।
डिमिक 2 डिम 2 डिम बाजे लागिस औहाँ झौँहा
हाँसत 2 कहिन नरायन ब्रह्मा जी से अैसन।
दू 2 मनखे एक्के मुहरन तूं सिरजाया कैसन।।
मनखे मन दुख पाबेच करथें गारी मिले हमन ला।
देखा, कैसे आज सरापिस बिन्द्रा हमला-तुहँला।।
ब्रह्मा कहिन लजावत हाँसत हे भगवान कहौं का !
बुढ़ा गयें मैं येकरे खातिर आइस अैसन मौका।।
एक्के पुर्रू एक्के झुर्रू रहें बनैया मैंहर।
फहम भुलागै तौ दू 2 झन गढ़ डारें झट मैंहर।।
सिरतो अै जब एक्के साही दू मनखे हो जाथैं।
होके नींचट भूलभुलैयाँ बपुरा मन दुख पाथैं।।
मनखे-गढ़त-बखत मां अब मैं सुरता नइँ बिसराहौं।
अब मैं आने 2 मुहरन मनखे मन ल बनाहौं।।

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प्रस्तुतकर्त्ता
प्रो. अश्विनी केशरवानी
‘‘राघव‘‘, डागा कालोनी
बरपाली चौंक, चांपा-495671 (36 गढ़)

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