मितानी के बिसरत संस्कृति

हर बच्छर राखी तिहार के आगू नीते पाछू नवा पीढी के नान्हे-नान्हे लइका अउ सग्यान नोनी-बाबू मन ल एक-दूसर के हांथ म आनी-बानी रंग-बिरंगी सुंतरी बांधत देखथंव त अचरित लागथे।एला ओमन फरेंडशीप बेल्ट किथे।अउ ये बेल्ट बांधे के तिहार ल फरेंडशीप-डे।माने संगी जंहुरिया ल बेल्ट बांधके अपन संगी होय के दोसदारी जताय के परब।पहिली ये बिदेसी तिहार ल बडे-बडे सहर के नोनी-बाबू मन मनावय।फेर धीरे-धीरे येहा हमर छत्तीसगढ़ के गंवई म घलो संचरत हे।उही भुइंया म जिंहा हर परब म मितानी बधे के परंपरा अउ ये बंधना ल जिंयत भर निभाये के संस्कृति हवय।दुवापर जुग म भगवान किसन ह सुदामा संग अउ तरेता जुग म भगवान राम ह सुगरीव संग म मितानी बधे रिहिन अउ एक-दूसर के जम्मो कारज म सहयोग करिन।तिही पाय के मितानी नता ल भगवान घर के नता केहे जाथे।




छत्तीसगढ़ ह बड धार्मिक अंचल आय।इंहा के मनखे देवधामी ल बड मानथे।कोन्हो मनखे ह दरस खातिर जगन्नाथ पुरी जाथे त ओला किलोली करके उंहा के महापरसाद आजो मंगवाथे।काकरो गंगा मइया के दरस के संजोग बनथे त ओला गंगाजल अउ गंगाबारु लाने बर खंधोथे।अतिक आस्था अउ सरधा रखथे इंहा के मनखे ह।फेर इंहा के पोठ लोक जीवन म तीज-तिहार अउ जंवारा,भोजली जइसे संस्कृति त घला हमाय हे।मितानी बधे के सुघ्घर परंपरा ह इंहा के लोक जीवन म रचे बसे हे।आनी बानी के परब नीते धार्मिक जिनिस के चिन्हारी ल माध्यम बना के मितानी के परंपरा ल छत्तीसगढिया मन उमर भर निभाथे। छत्तीसगढ़ म मितान के नांव नी लिये जाय।नांव के जगा म जेन जिनीस ह मितानी बधे के माध्यम बनथे उही संबोधन म सीता-राम काहत गोठ-बात होथे।जइसे महापरसाद,गजामूंग,गंगाजल,गंगाबारु,तुलसी दल,जंवारा,भोजली,दौनापान ,गोबरधन,सहिनाव आदि।छत्तीसगढ़ ले सबले लकठा म भगवान जगन्नाथ ह पुरी म बिराजे हे।तेकरे सेती छत्तीसगढ़ म रथयातरा ल बड उछाह के संग मनाय जथे।रथयातरा के दिन भगवान जगन्नाथ म गजामूंग के भोग लगथे।इही गजामूंग ल साखी मानके गजामूंग बधे जाथे।वइसने ढंग ले गंगाजल,गंगाबारु,भोजली,जंवारा,तुलसी दल ,दौनापान अउ जगन्नाथ महापरभु के भोग म महापरसाद बधे जाथे।
मितानी बधे के घलो परब मुताबिक समे होथे।जइसे गजामूंग ल अषाढ महिना के रथयातरा परब के समे,भोजली ल भादो म अउ जंवारा ल नवरात परब म बिसरजन खानी बधे जाथे।देवारी तिहार म गोबरधन खुंदाय के बेरा गउ माता के गोबर ले गोबरधन बधे के परंपरा देखे बर मिलथे।एके जइसे दू नांव के मनखे मन सहिनांव बदधे। महापरसाद,गंगाजल,गंगाबारू,तुलसीदल,दौनापान ल कोनो भी शुभ कारज अउ तीज-तिहार के मउका बधे जा सकथे।




मितानी बधे बर अमीर-गरीब,जात-पात अउ उमर के बंधन नी राहय।येमा नारी पुरुष के भेद घलो नीहे।गंवई म जेन सियानिन-सियान मन काकरो संग नाती के नता मानथे,ओमन ह उंकर संग मितानी बध लेथे।अउ भेंट होय के बेर सीताराम कहिके एक-दूसर ल जोहारथे।एके जंहुरिया लइका मन मितानी बधथे त उंकर दाई-ददा मन घला मितानी के बंधना म बंधा जाथे अउ उमर भर सुख-दुख के जम्मो कारज म एक दूसर के साथ निभाथे। मितान बने के बाद मितनहा मन मितान के ददा ल फुलबाबू अउ महतारी ल फुलदाई कथे।एक दूसर के परवार म फूलवारी नता ल सग नता बरोबर माने जाथे।हर तिहार बार म मितान के घर ले दार-चाउंर अउ रोटी-पीठा मितान-मितानिन बर पठोय के रिवाज हे।
मितान-मितानिन ह सबले लकठा के मयारु अउ हितवा नता आय जेहा मया अउ बिश्वास के डोरी म बंधाय रथे।शायद इही कारन शासन ह घलो गांव गंवई म स्वास्थ्य सेवा अउ नवा नवा जानकारी पठोइय्या महिला मन ल “मितानिन” नांव देहे।आज समे के संग हमर माटी के जम्मो संस्कार अउ परंपरा ह नंदावत हे।त अइसन बेरा म हमर ये मितानी परंपरा ल सइत के राखे के जुरूरत हे।मितान बधई ल भगवान घर के नता माने जाथे।हमर ये पोठ संस्कृति ल सहेजे अउ जतने के जुरूरत हवय।
कइसे मितान!!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा) 493996



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