छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

रद्दा मा काँटा बोवइया मन हर,
सूरुज ला जीभ देखइया मन हर।

देखौ, बिहनिया के सूरुज आगे,
हरदम आँसू बोहइया मन हर।

थोरको सोचौ, जानौ , समझौ रे,
दूसर बर खाँचा खनइया मन हर।

काबर पाछू तुम रेंगत हावौ,
आने के पाँव गिनइया मन हर।

बेरा आगे अब तो बरसो तुम,
बादर कस गजब घपटइया मन हर।

बलदाऊ राम साहू

रद्दा =रास्ता, मन हर = लोगों, बिहनिया =सुबह, खाँचा=गड्डा, काबर= क्यों, रेंगत हावौ =चल रहे हो, आने के =दूसरों के, घपटइया= छाने वाले



संघरा-मिंझरा

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