भोलापुर के कहानी : कहानी संग्रह

भूमिका
भोलापुर के कहानी : उपन्यास के सुवाद वाला कहानी संग्रह
डॉ. जीवन यदु

चाहे संस्कृत भासा होय के चाहे हिन्दी भासा होय – कविता के रचना पहिली होइस। पाछू कहिनी-लेख-नाटक लिखे गे हे। संस्कृत म त आने-आने गियान के पोथी मन ल घलो कविता म लिखे के परंपरा रहिस। बइद-गुनिया मन के ग्रंथ ल कविच मन ह उल्था करंय, हाथ-नारी देखांय, जड़ी-बुटी घला बतावंय। तउने सेती बइदराज मन ल जुन्ना जुग म कविराज घलो कहंय। छत्तीसगढ़ी भासा म कविता के लिखइ ह कहिनी ले पहिली होय हे। कविता के बहुत बाद म कहिनी-लेख-नाटक मन ल लिखे गे हे।

छत्तीसगढ़ी म कहिनी के लिखइ ह लोक कथा ल लिखे के रूप म होय हे। डोकरी दाई अउ ममा-दाई मन जउन कहिनी मन ल अपन नाती-नतुरा मन ल सुनावंय, उही कहिनी मन ल हमर सियान-विद्वान लेखक मन चारों मुड़ा ले सकेल-सकेल के छत्तीगढ़ी भासा म लिखंय अउ छपवावंय। छत्तीसगढ़ी साहित्त के नामी समीक्षक डॉ. नंदकिशोर तिवारी ह घलो मानथे के लोककथा के आधार म कहिनी लिखइ ह सुरू होय हे। कहिनी के सुरू म ‘ एक सहर म राजा रहिस, या बनिया रहिस, या बाम्हन रहिस’ जइसन वाक्य अउ आखरी म ‘जइसन उनकर दिन बहुरिस, तइसे सबके दिन बहुरे ‘ जइसे वाक्य लिखे जाय। डॉ. नंदकिशोर तिवारी ह यहू मानथे के छत्तीसगढ़ी मं कहिनी के रूप बने के पहिलिच उपन्यास के रूप ह प्रकास मं आ गे। उनकर कहना हे – ‘‘कहानी विधा की स्वतंत्र-धारा छत्तीसगढ़ी में औपन्यासिक-कृति से आरंभ हुई। ( छत्तीसगढ़ी साहित्य का ऐतिहासिक अध्ययन )।’’ इही तरा ले डॉ. विनय पाठक के किताब ले जानकारी मिलथे के सन् 1928 मं सीता राम मिश्र के कहिनी ‘विकास’ पत्रिका म छपे रहिस। सन् 1961 ले सन् 1964-65 तक श्री रंजन लाल पाठक के कई ठन कहिनी सरलग छपिस। ये कहिनी मन मं हंसी-ठठ्ठा के गोठ-बात जादा रहिस हे। कई झन लेखक मन इही समझ ले रहिन हे के छत्तीसगढ़ी ह हंसी-दिल्लगी के भासा आय, एमा गंभीर साहित्य नइ हो सकय। ओकर मन के भरम ह अब टूट गे होही। हमर सियान साहित्याकार मन ह अइसे-अइसे ठाहिल बिचार छत्तीसगढ़ी भासा म लिखिन, जउन ह कभू-कभू पोठ-भासा म घलो नइ मिलय। सर्व श्री नारायण लाल परमार, हरि ठाकुर, विप्र, भगवती लाल सेन, डॉ. नन्दकिशोर तिवारी, डॉ. बल्देव, भगत सिंह सोनी, जइसे लिखइया मन ह छत्तींसगढ़ी ल गंभीर बिचार वाला भासा बनाय के गंज उदिम करे हें। केयूर भूषण, लखन लाल गुप्त, जइसे गंज लेखक मन ये भासा म अपन गंभीर बिचार भरिन।

छत्तीगसगढ़ी मासिक पत्रिका निकले के पाछू कई ठन छत्तीवसगढ़ी पत्रिका निकले लगिस। समाचार पत्र मन घलो छत्तीसगढ़ी ल जघा दे खातिर तियार हो गें। नवा-जुन्ना लिखइया मन के रचना छपे लगिस। वोमा कविता के गिनती जादा रिहिस हें, कहिनी कमती। पन एमा दू मत नइ हो सकय के इही बहाना छत्तीगसगढ़ी कहिनी के रूप निखरे लगिस। कहिनी के जउन रूप के सपना हमर सियान समीक्षक मन देखत रहिन हे, अब वो रूप ह देखे मं आवत हे। अतका जरूर हे, के आज घलो छत्तीपसगढ़ी कहिनी ह गांव ले बाहिर नइ निकल सके हे। कहिनी लिखइया बहिनी मन के कहिनी ह अभी घलो घर के भीतरी मं खुसरे हे। काबर ? का छत्तीकसगढ़ी भासा ह लोकभासा के मेंड़ो ल नइ नहक सके ?

छत्तीगसगढ़ी ह जब ले राजभासा के पद मं बइठे हे, तब ले वोला लोकभासा कहे के मन नइ होवय। लोकभासा के अपन सीमा होथे, मेड़ो होथे। अब वो ह ‘ भाषा ‘ हे, आने भासा असन। एकर सेती वोमा लिखे कविता-कहिनी ल छत्तीसगढ़ी के मेंड़ो ल खुंदे बर परही, नहके बर परही। माने राष्‍ट्रीय अउ अंतर्राष्‍ट्रीय बिसे अउ समस्या ऊपर साहित्ये गढ़े बर परही। तभे हमर छत्तीरसगढ़ी भासा ह दूसर भासा मन के आगू मुंड़ी उठा के रेंग सकत हे।

जब ले छत्तीसगढ़ ह अलग राज के दर्जा पाय हे, वोकर प्रभाव ह छत्तीगसगढ़ी लेखन ऊपर घलो परे हे। आज कहानी लेखन के बिसे ह बदल गे हे। समय के संगे-संग गांव के रंग-रूप अउ सुभाव ह घलो बदलत जावत हे। गांव के लोगन मन भोला-भाला कहे के लइक नइ रहि गे हें। पहिली ‘भोला-भाला’ सब्द के प्रयोग बड़ चलाकी ले करे जाय। ‘ भोला-भाला कहिके वोला चुहके के मउका जादा हाकथे। चतुरा मनखे मन ककरो ‘अग्यानता’ ल ‘भोला’-भाल’ कहिके सहिंराय बर आजो ले नइ छोड़े हे। अइसन चतुरा मनखे मन ल दूसर के ‘भोकवा-पन’ ह जादा बने लगथे। ये चलाकी आय। अइसन चलाकी अब जादा दिन नइ चलय। सिकछा के प्रचार-प्रसार अउ नवा जमाना के बिग्यान अउ तकनीक के प्रभाव के सेती छत्तीगसगढ़ के गांव म एक कोती जागरन आइस त दूसरा कोती कई ठन समस्या घलो ठाड़ हो गे। आज के कहिनी लिखइया मन वो समस्या ल पकड़े के कोसिस करत हें। कुछ जुन्ना समस्या त अइसे हे, जेन ह अपन जर जमा ले हे। वोहू समस्या ल कहिनी म लाय के कोसिस होवत हे, पन अइसन समस्या के नवा अउ तर्क वाला समाधान दे जावत हे – ये ह नवा बात आय। अइसने कहिनी लिखइया मन मं एक नाव कुबेर के आय। पत्र-पत्रिका मं वोकर कहिनी मन सरलग छपत हें। अब कहिनी के सइघो संग्रह ‘भोलापुर के कहानी’आप मन के हाथ मं हे।

‘भोलापुर के कहानी’ ल पढ़त खानी मन मं पहिली बिचार आथे के ये भोलापुर कहां हे ? मोला तो लगथे, के हमर राज्य अउ हमर देस के जम्मों गांव के नाव ‘ भोलापुर’ हे। काबर के एमा के कहिनी ह कोनो एक गांव के कहिनी नोहे, जम्मों गांव के आय। कहिनी लिखइया कुबेर ह घलो कहे हे – ‘‘भोलापुर गांव घला देस के दूसर गांव मन सरीखेच हे।’’ कहिनी लिखइया ह अपन कहिनी मन मं जइसन चरित गढ़े हे, वइसन चरित ह जम्मों गांव म देखे ल मिलथे। कुबेर ह गांव के चरित ल पकड़े के बढ़िया उदिम करे हे। संपत महराज, मुसुवा, मरहा, घना मंडल डेरहा बबा, फुलबासन, रघ्घू,, सुकारो दाई, नंदगहिन, लछनी काकी, – ये चरित मन ह कहिनी मं रहि के सिरिफ कहिनी के चरित नोहे, येमन जीयत-जागत दुनिया के जीयत-जागत मनखे आंय। संग्रह के कहिनी मन ल पढ़त बेरा अइसे लगथे, जइसे वोमा के चरित मन ह कहिनी ले निकल-निकल के हमर आगू म चलत-फिरत हें। ये ह कहिनी अउ कहिनी लिखइया, दुनों के सफलता आय।

ये बात सच आय के संग्रह के कहिनी मन ल छत्तीासगढ़ के गांव ल दृष्टि मं रख के लिखे गे हवय, पन छत्तीसगढ़ के गांव के समस्या असन समस्या ल देस भर के गांव के मन भुगतत हें। पन यहू बात ह सच हे, के कुछ समस्या ह सिरिफ छत्तीससगढे के आय।

छत्तीसगढ़ के सबले बड़े समस्या – आने-आने प्रदेस के वो मनखे मन के दबाव आय, जेमन ये प्रदेस के मनखे मन ल चुहकेच बर आय हें अउ अभी घलो आवत हें। वो मन छत्तीहसगढ़ के भुंइंया ल कभू अपन भुइंया नइ मानिन। इहां के मनखे मन ल कभू अपन प्रदेस के मनखे कस नइ जानिन, चाहे वो मन बैपारी होय, के कारखाना के मालिक। चाहे वो मन अफसर होंय के नानकुन बाबू-चपरासी। वोकर मन के मन म एके बिचार हाकथे – इहां के मन ल चाहे जितना चुहको अउ धन कमाव। पन कतको झन अइसे घलो परदेसिया आय रहिन जउन मन अपन तन-मन-जीवन ल इही धरती के उन्नति बर खपा दिन अउ खपावत घलो हें। एमन ल चीन्हें के जरूरत हे। अइसन परदेसिया मनखे के गिनती कमती हे। एक कोती बड़हर बैपारी मन ‘ऊन के दून’ दाम वसूल करत हें, त दूसर कोती कारखाना मालिक मन छत्तीोसगढ़ के सोनहा धान उपजइया खेत-खार ल औने-पौने दाम दे के बिसावत हें। जे किसान अपन खेत-खार ल नइ बेंचय तेकर बर लउठी-बंदूक उबावत हें। सरकारी साहेब मन घलो ओकरे मन कोती हो गे हें। चारों कोती ‘पइसा के मेख, तंय खड़े तमासा देख’ के तमासा होवत हे। अइसन मं ‘मरहा राम’ के संघर्ष ह छत्तीसगढ़ ल बचा सकत हे। अब जम्मो मरहा राम मन ल एकजुट होय ल परही। ‘मरहा राम के जीव,’ ‘मरहा राम के संघर्ष ,’ ‘साला छत्तीनसगढिया,’ ‘अम्मा हम बोल रहा हूं आपका बबुआ’ – ये कहिनी मन गांव के मनखे मन के सोसन ल दृष्टि म रख के लिखे गे हे। गांव म घलो सुवारथ ले भरे मनखे होथें। एमन परदेसिया अउ देसिया , दुनों के चुहकइ के काम मं मदत करथें। अइसन सुवारथी मन ल थोरिक-बहुत चुहके ल मिल जाथे। गांव म एको झन मनखे मरहा राम अउ मंगलू राम कस हो जाथे, तभे गांव ह मनखे चुहकइया रक्साबानी मनखे मन के फांदा ले छूट पाथे। छत्तीनसगढिया मन के सबले बड़े कमजोरी ये आय के वो मन एकजुट नइ हो पांय। कुबेर के मंसा हे के इहां के मनखे मन एकजुट हो के अपन सोसन के बिरोध म मुंह ल उलोवंय।

एक दूसर समसया जो छत्तीसगढ़ भर मं नइ हे, पूरा देस के गांव मं हे , सहर ल घलो बियापे हे, वो समस्या हे धरम-करम के नांव मं आर्थिक अउ सामाजिक सोसन के समस्या। आज जउन ह जतका बड़ पाखंडी, लबारी मारे मं वस्ताज अउ गोठकारा होही, वोहा वोतके बड़ महात्मा अउ बिदवान बाजही। आज त यहू देखे मं आवत हे, पढ़े-लिखे मनखे, छोटे-बड़े अपीसर, बड़े-बड़े नेता मन घलो इही ‘तीन-पांच’ मं फंसेे हवंय। वोमन के देखा-सीखी जम्मों सिधवा मनखे मन ढ़ोंगिहा मन के फांदा म फंस जाथें। ढ़ोंगिहा मनखे मन सोंच-समझ वाला मनखे मन ल ‘फूटे आंखी नइ भांय। वोमन ल डर रहिथे के ये सोंच-समझ वाला मनखे मन ऊंकर लबारी के दुकान के बेंस ल झन दे देवंय। कुबेर ह अइसने किसिम के समस्या ल दू ठन कहिनी म उजागर करे हे – ‘घट का चौंका कर उजियारा’ अउ ‘चढौतरी के रहस’ । ये कहिनी मन मं ‘नंदगहिन’ अउ ‘समधी’ के चरित ह कहिनी के परान आय। ये दूनों चरित ह अइसे आंय, जेमन अपन तर्क अउ बुध ले ढ़ोंगिहा मन के धरम-करम ह कतेक पोन्डा हे, तेला देखा देथंय।

वइसे त संग्रह के जम्मों कहिनी ल जोर के पढ़े म उपन्यास के सुवाद मिलही, पन एमा के दू कहिनी – ‘संपत अउ मुसुवा’ अउ ‘लछनी काकी’ ल एके कहिनी मान के सरलग पढ़े मं एक बड़े कहिनी के मजा मिलही। टोनही-भुतही के गोठ ह हमर राज्ये भर म नइ हे, देस के जम्मों गांव मं हे। टोनही मन गांवेच मं काबर मिलथें ? सहर-पहर म काबर नइ मिलंय? येकर कुछ कारन हे – आपस के इरखा अउ लड़ाई, नारी परानी ले अपन सुवारथ ल साध नइ सके के घुंस्सा, पर के जमीन-जैदाद ल रपोटे के चलाकी। इरखहा, गुस्सौल अउ चलाक मनखे मन एकर-ओकर बहू-बेटी ल फोकटंउहां ‘टोनही-भुतही’ कहके दोसदारी बनावत रहिथंय।

कुबेर ह अपन कहिनी मन मं एक ठन कारन ल तपासे हे, अभी कई ठन कारन ह बांचे हें। कहिनी-कविता लिखइया मन ह एक ठन कारन कोती अंगरी देखा देथें। इही साहित्यह अउ साहित्यदकार के बुता आय। मनखे मन साहित्यककार के इसारा ल समझके, अपन हिरदे अउ मन के आंखी ल उघार के जाग जाथें, तहां ले आने कारन मन ल अपनेच ले तपास लेथें।

संग्रह के छे ठन कहिनी ह बिसेस समसया ल धियान म रख के लिखे गे हवय। जइसे – ‘डेरहा बबा’ ( इक्कीसवीं सदी मं छुआछूत के समसया ), ‘राजा तरिया’ ( पर्यावरण अउ जल समस्या ), ‘सुकारो दाई’ ( परिवार नियोजन ), ‘सरपंच कका’ ( गांव के राजनीति ), ‘पटवारी साहब परदेसिया बन गे’ ( राजस्व विभाग के लुचपतखोरी ) अउ ‘पंदरा अगस्त के नाटक’ ( निसा-पानी )। संग्रह म एक ठन नाटक घलो हे, पन उहू म कहिनी के सुवाद मिलथे।

जुग बदल गे पन मनखे के बिचार नइ बदलिस। बिचार ल बदलना चाही, तभे जुग बदले के कुछू अरथ हे। बिगर बिचार बदले जुग बदले के गोठ करना – निचट लबारी आय, सिरिफ फदूली आय। डेरहा बबा के इही बिचार ह कहानी ल पोठ बनाथे। पर्यावरण संतुलन अउ पानी के समस्या चारों मुड़ा ठाड़े हे। हमर पुरखा मन के ‘मानता’ के पाछू कुछू कारन होथे। वो कारन मन ल खोज के लिकाले ल परथे। नइ ते पुरख मन के मानता ह अंध-बिसवास मं संघर के रहि जाथे। ‘ छे आगर छे कोरी तरिया ‘ के बात ह आज हाना अउ कहिनी बन के रहि गे हवय। ‘जमीन माफिया’ मन तरिया ल पाट-पाट के बिल्डिंग खड़ा करत जावत हें। भुंइया के कोख ह सुक्खा अउ जुच्छा होवत हे। गरमी के मउसम मं पानी बर त्राहि-त्राहि मचे रहिथे। ‘जमीन माफिया’ ल न जनता ह रोकन सकत हे अउ न सरकार। पटाय तरिया ल फेर खनाय बर कोनों सरकारी योजना नइये। हावा-पानी आरूग नइ रहिगे। पिये के पानी ल बोतल म बिसाय ल परथे। ‘पर्यावरण-पर्यावारण’ चिल्लाय मं पर्यावरण ह आरूग नइ हो जाय, उदिम करे मं होथे। हमर पुरखा मन तरिया के बिहाव करावत रिहिन हे। एकर पाछू कारन रहिस हे। बिहाव के बहाना म तरिया के साफ-सफाई घलो हो जाय। कुबेर ह अपन कहिनी ( राजा तरिया )मं इही कारन ल फरिहा के बतावत हे।

हमर देस ह दुनिया मं सबले जादा घन आबादी वाला देस आय। चीन देस ह घलो आय पन वोकर तिर जमीन के रकबा जादा हे। घन आबादी वाला देस के बिकास ह धिरलगहा होथे। चीन के बिकास होइस, पन वोकर आने कारन हे। वोकर बिकास के रद्दा अलग हे। पढ़े-लिखे लइका मन ह आबादी ल जल्दी बढ़ाय के पक्ष म नइ रहंय। वो मन ‘सुकारो दाई’ के लइका किसुन के बिचार ल मानथें।

पंचायती राज मं सरपंच अउ पटवारी ह गांव के धुरा आंय। ये मन बने नीत-नियाव वाले होथे त गांव के किसान मन सुखी होथंय, अउ नइ रहंय त दुखी होथंय। सरपंच के बिगड़े ले पंचायती राज के मजा उखड़ जाथे। आज कल के नेता मन के आगू-पाछू लंगू-झंगू मन के भीड़ रहिथे। एकरे मन के ‘कनफुंकउनी’ मं नेता मन रेंगथे। गांव के बिकास बर धियान नइ देवंय। गांव म एको झन रघ्धू कस, सरपंच कका ल रद्दा देखइया अउ गांव के जवान-लइका मन ल एकजुट करइया हो जाथे, तभे गांव के बिकास ह होथे। काबर के बिकास ह बाते-बात के जमा खरचा नो हे। बिकास बर हांथ -पांव डोलाय बर परथे, नवा पीढ़ी ल आगू आय बर परथे।

पटवारी के गोड़ तरी गांव के जम्मों किसान के हाथ चपकाये हे। वोला कोन बोल सकत हे। किसान के नान-नान काम ल सिधोय बर अपन जेब ल गरम करे के उदिम करइया पटवारी ह ‘देसिया’ हो के घलो ‘परदेसिया’ बरोबर लगथे। सवाल ये हे, का आजो घलो हमर देस म परदेसिया मन के राज चलत हे ? गरीब के पुछन्तर काबर कोनों नइ हे ? कहिनी लिखइया के मंसा हे के येकरो जुवाब खोजे जाय। जेन सवाल के जुवाब बिदवान मन तिर घलो नइ रहय, वोकर जुवाब जनता मेर होथे। ‘ भोलापुर ‘ के जनता ह जरूर जुवाब खोजत होही।

कथा-रस ह ये संग्रह के सबले बड़े बिसेसता आय। कहिनी मं कथा रस नइ रहय त वो ह पढ़इया मन ल बांध के नइ राख सकय। पढ़इया के मन ह घेरी-बेरी उचाट खाथे। कुबेर के जम्मों कहिनी मन मं कथा-रस के बहाव हे। अइसने वोकर भासा म घलो मधिम नदिया के धार कस बहाव मिलथे। कोनों-कोनों जघा हाना के लहरा के अनुभो घलो होथे। ये कहानी मन ल पढ़त खानी अइसे लगथे, जइसे हम कहिनी ल पढे के बल्दा सोंच-समझ वाला सनीमा देखत होवन। कहानी के चरित मन आंखी-आंखी म झूले लगथे। हम कतका बेर भोलापुर पहुंच गेन, तेकर गम नइ मिलय। कहिनी ल पढ़ते-पढ़त मोला श्री लाल षुक्ल के ‘राग दरबारी’ के खियाल आथे, त कभू प्रेमचंद के । मंय ह कुबेर के कहिनी के तुलना ओकर मन ले नइ करत हंव, कुबेर के कहिनी मन मं कुछ अइसे बात हे, जेहा पुरखा अउ सियान लेखक मन के सुरता देवा देथंय।

कहिनी लिखइया कुबेर म एक ठन बिसेसता अउ हे। जब वो ह कहिनी म बरनन करथे, तब आज के जिनगी म जउन विसंगति आय हें, वहू ल ओरियावत रेंगथे। ये ह कहानीकार के सजगता आय। समाज मं, धरम-करम मं, राजनीति मं जउन गिरावट आय हे, वो ह बरनन म पढ़े ल मिलथे। कुबेर ह गांव के मनखे आय। एकर सेती वो ह गांव के चाल-चलन अउ बोली-बात ल निचट लकठा ले देखे-सुने हे। इही कारन वोकर कहिनी मन मं गांव के सच्चाई के दरसन होथे। गांव के अतेक निमगा अउ आरूग कहिनी सहर-पहर मं रहवइया लेखक मन बर असंभो नइ तो कठिन जरूर हे। संग्रह के जम्मों कहिनी मन पढ़े अउ गुने के लइक हें कुबेर ह भविस म एकरो ले बढ़िया कहिनी, पोठ अउ ठाहिल बिचार के कहिनी लिखहीं अउ छत्तीिसगढ़ी साहित्ये के कोठी ल भरही – इही बिसवास के संग, वोला हिरदे ले बधाई देवत हंव।

डॉ. जीवन यदु
गीतिका , दाऊ चौंरा
खैरागढ़ ( छ. ग. )
मो. – 975202392

Bholapur ke kahaniभोलापुर के कहानी
(छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह)
लेखक: कुबेर
सर्वाधिकार: लेखकाधीन
प्रथम संस्करण 2010
मूल्य: 120
प्रकाशक
मेघ ज्योति प्रकाशन, तुलसीपुर, राजनांदगॉंव ( छ. ग. )

किताब के आघू भाग सरलग …..

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