छत्तीसगढ़ी कविता

दारू अउ नसा ह जब,
इंहा ले बंद हो जाही।
‎तभे, गांवे के लइका मन,
‎विवेकानंद हो पाही।।

जवानी आज भुलागे हे,
गुटका अउ खैनी मा।
देश कइसे चढ़ पाही?
बिकास के निंसैनी मा।।
जब गांवे ह गोकुल,
अउ ददा ह नंद हो जाही…
तभे गावें….

भ्रष्टाचार समागे हे,
जवानी के गगरी मा।
तभे लइका चले जाथे,
आतंक के पै-डगरी मा।।
देशभक्ति हो जाये तो,
परमानंद हो जाही….
तभे गांवे….

पढ़ादव पाठ नवा इनला,
देस बर आस हो जाही।
कोनों भगत इंदिरा तो
कोनो सुभाष हो जाही।।
नवा पीढ़ी म जब संस्कार,
सुगंध हो जाही…
तभे गांवे के………
दारू अउ…………

राम कुमार साहू
सिल्हाटी, कबीरधाम
‎मों.नं.9340434893
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संघरा-मिंझरा

2 Thoughts to “छत्तीसगढ़ी कविता

  1. Very nice ramkumar shahu ji aapki Kavita bahot achhi hai

  2. केजवा राम साहू 'तेजनाथ'

    साहू जी, गागर मं सागर

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