छत्तीसगढी उपन्यास – माटी के बरतन

रामनाथ साहू

छत्तीसगढ राजभाषा आयोग रायपुर के आर्थिक सहयोग ले प्रकाशित

प्रकाशक : वैभव प्रकाशन, अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर (छत्तीसगढ) दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748

आवरण सज्जा : कन्हैया, प्रथम संस्करण : 2017, मूल्य : 200.00 रुपये, कापी राइट : लेखकाधीन

समरपन
हिन्दी अउ छत्तीसगढी के बरकस साहित्यकार डॉ. बिहारीलाल साहू जी ला सादर समरपित !




अध्याय – 1

दूनों परबत के मांझा म जात वो सॉकर डहर जइसे चलत-चलत जाथे तौ वो पहुँचथे रैनपुर । हाँ …,वो गाँव के नाव रहिस रैनपुर अब ले… घलो वोला वोइसनेहेच कथे ।
जब दूनों परबत के माथा मन ह सुरूज नरायन के पहिली किरन ल छूथें वोकर पहिली ये गाँव हर जाग जाय रथे। सुरूज नरायन ल ए गांव वाला मन ला… चलौ अब उठा कहे बर नई लागै। सुरूज नरायन अपन खाता म ऊँकर हर करनी के हिसाब राखथे… ए विस्वास हर ये गाँव के सब्बे रहवासी मन म कूट-कूट के भरे हावै वोकरे खातिर ऊँकर आत ले सब एकदम तियार… अपन-अपन बूता म… । बिहनिया ले संझा तक।
बिसराम बाबू रैनपुर के मंझोलन काठी के मनखे । मंझोलन काठी एकर बर एक दू घर ला वोहर अपन ले अब्बड उच्च मानथे,उँहे दू चार घर ल अपन ले कम घलो । फेर येहर वोकर मानना ये। जडन घर म साल भर म गिनबे तौ कम से कम छह महीना बरोबर बने कर के संझोती बेरा हॉडी नई चढे वोहर कई सन मंझोलन आदमी ! फेर विसराम के संतोस ल का करबे जेकर सेती वोला अपन ले पोठलगहा मन ल देख के अमरिसई नइ होवे फेर अपन ले तरी मन ल देखके जरूर संताप होथे।
कनकी बाई आईस बोकर डहर। कनकी बाई वोकर जीवन साथी सात भाँवर के बरे-बिहाय । वोहर आईस वोकर करा अउ तीर म बइठ गिस डेहरी म ! विसराम हर गेरवा बनाय के खातिर डोर मन ला जोड-तोड करत रहिस।
”कस हो… सुनत हा…।” – कनकी कहिस।
” यहींच तो बईठे हों तोर आगू म… ।” विसराम डोर ल फेसोत कहिस हाँस के… ।
‘ ‘संझोती बर…”
” कहि ले पूरा के संझाती बर अठिया नई ये… । कोन हे एकरा सुनइया।”
‘ठीक हे कनकी… संझौती बर हमर घर अढिया नईये…।”
”फेर जाके किंजर देख… कै झन के घर अभी बिहनिया चूल्हा चढे है।”
करा तो कुछू कहना भी पाप हे…।” कनकी बाई थोरक रिसावत कहिस।
”का सिरतोच संझा बर नई ये…?”
”मैं करा ठठ्ठा-मसखरी करिहाँ?” कनकी तुरंतेच कहिस । येला सुनके विसराम सिरतोच गुनान म पर गिस ।
विसराम उठिस अपन जघा ले गेरवा बनाय ल छोड के… । घर म एक ठन हे गाय… वोहर कै ठन गेरवा ल टोरे सकिही जेकर खातिर दर्जन-दर्जन गेरवा बनाके राखे बर लागही। वोहर उठके आगिस अपन भाँठी के तीन… । भाँठी म आगी धधकत रहिस । वोला देख के वोहर मुचमुचाईस | जात जन्मन के वाहर कोहार… माटी के बुता म रमे हे रचे हे… । वोहर करत हे ये बुता ल… वोकर पुरखा करसि हे अब वोकर लईका मन घलो करत हें अड सायद वोकरो लईका… पिचका मन घलो ये बुता ल करिही…।
विसराम देखिस… एकठन भाँठी म आगी हर घुमरत हे… धधकत हे… अउ दूसर भाँठी रचा के माढे हे। थोरकुन धुरिहा म करन वोकर बड्खा बेटा हर खाँचा म माडी भर कन्हार गैरी म रमे रहै । माटी तियार करत रहै । तपती दुपहरी के सूरज हर वोकर मुँह ल करिया परई कस करिया कर देय रहे । खाँचा के उपर म वोकर माथा ले चूहत बूंदी हर गिरत रहै… टप… टप… जइसन वोहर ठान ले रहै कहूँ माटी म पानी के जरूरत परिही त वोकर ये पसीना के बूँदी हर काम आ जाही।
करन उही खाँचा म वोईसनेहेच गैरी मचावत हॉसीस थोरकुन अपन बाप कती ल देखत- ” ददा तैं काबर आये हस ये डहर मंझनिया बेरा म… ।’
” अईसनेहेच आ गयेंव बेटा…
” आगै हस तौ थोरकुन बतर ल देख ले ये माटी के । मोला ये हर थोरकुन गजमजहा लागत हे ।”
”गजमजहा तो पूरा संसार हे बेटा। कोन इहॉ निकता हे सोरा आना खाँटी… सबे कोती मिलावट के राज हे बेटा…” विसराम कहिस अउ आगू बढके खाँचा के माटी ल अपन मुठा म धर लिस। माटी ल मुठियाईस विसराम सब चिक्कट माटी पिल… पिल ले निकल गै फेर हाथ म एकठन गोटर्रा गोंटी बाँचे रहि गइस । विसराम वोला देखके हाँसथे…
”देख अईसन तो हावे ये हर।”
”इही तौ महू हर कहत रहेंव ददा । बतर ह ठीक हे के नहीं।”
”काकर बेटा अस?” – विसराम हॉसत कहिस त करन घलो मुचमुचा उठिस।
”ददा ये पईत तो बड अच्छा माल निकाले बर हे…
” काबर…?”
”ठिकादार हर कहे हावे… जौनमन के बरतन हर अच्छा रहही वोला कुछू न कुछ इनाम-इकराम दिही वोहर…।”
”इनाम दीही वोहर…।”
‘हाँ कहे तो हे वोहर।”
”चल ठीक इनाम लेके आबे अड अपन महतारी ल धरा देबे।”
”ददा…।” करन बोकर मुख ल बने देखत कहिस।
”काय ये…?”
”तैं एक ठन जिनिस ल जानत हस का…?”
”बता… काये तडउन ल ?”
”हमर हाथ ले सिरझे पकाये बरतन मन अब हमरेच हाथ ले नई बेचाय…।”
” हॉ… वो तो हे गॉव गराम के हाट-पटान नन्दावत हे… ।
सिल्वर स्टील के बरतन आवत हे।”
”तेकरे सेती हमर ये जिनिस मन सहर के वो चठक म जाके बैपारी मन के हाथ म खप जाथे। जडन हर बिसाही… चार पइसा दिही तेकरे तो बात ल मानबे।” करन माटी ले बाहिर आके हाथ धोवत अपन ददा के आधू म ठाढ हो गै।
विसराम वोला देखत रहिस…। देखतेच रहिस वोला आँखी गड्य के… कइसे पचहत्था चेलिक फुट गै हे ये करन हर… । कालेच्च नानकुन रहिस । कतेक जल्दी बाढ गै अड खाली बाढिस भर नहीं दुनियादारी के गोठ ला वोकर ले जादा जानत हे । वोला निज बुता म, जात जन्मन के काम म चिभिक लेवत देख विसराम ल अब्बडु आत्मसंतोस होइस। बोला लागिस मुडी के उप्पर जउन बड्खा छाता… मस रंग के छाता तनाये हे तउन हर वोकर ले अब बड्खा हे जडन हर दिखत हे, अउ ये टूरा हर वो छाता के दण्डी ल धर के ठाढे हे बोकर आगू म खम खम ले… । वो अब भुला गै के ये छाता धरा लइका के महतारी अउ वोकर सुख-दुख के साथी कनकी बाई हर का कहत रहिस… । ये नीला छाता धरा बलखरहा के पेट भर वोइरे बर दू मुठा… बस्स। बस्स।
विसराम ये गुन… दू मुठा के गोठ लइका सुरता करके ये लइका के मन ल मइला करना नई चाहत रहिस । वो चुपेचाप वोला देखत भर रहिस।
”ददा… !’
”हाँ…।”
फेर खाँचा म…?”
‘ हॉ… नहीं…।”
” कइसे बता नइ बनत हे ।”
”ये… ! वइसन गोठ नोहै बेटा…
”त फेर का बात ए ? तैं चुप काबर हवस ?”
”मैं कहाँ चुप बने गोठियावत तो
”ये भातरंधनी हड्या मन बने बनत हावे न…?”
” भात… भातरंधनी… हंड्या! हॉ बने बनत हे।” विसराम कहिस तहाँ ले फेर अपन जेवनी हाथ के तरजनी अंगुरी ले वो माटी कोती इसारा करे लागिस जेती खेप के खेत हँडिया म बन के माढे रहें। बोला लगिस के वोहर अब अपन आप ल अउ न रोके सकै वोकर मुख ले कनकी के हंडिया अउ भात के गोठ निकलिच जाही अड ये लइका के मन हर मइला होही… मन मइला होही त देंह गरूवा जाही… ।
” अड बेटा तैं… वो दुलपुतरी बनाय के नही…?”
”ये देख तो… करन माथा ला छूवत कहिस, ” मरे कस भुला गयेंव।”




संघरा-मिंझरा

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