गंगार : नान्‍हें कहिनी

(1)
मनखेमन गड़े धन के पाछू भागत रइथे, कमाय बर झन परे अऊ फोकट मा धन पा जई, एकझिन मनखे बन मा जात रइथे, ता एक जगहा मा एकठन गंगार देखते, जेहर लाली रंग के कपड़ा मा बंधाय रइथे, ओहर ओला छूये बर डराथे, काबर कि वोहर सूने रइथे, ओला बिना मंतरा मा बाँधे छू देते, ता वो मनखे हर मर जाथे, आके ओहर आपन संगी मनला बताथे, ओकर संगी मन बाम्हन देवता मेर जाथे, सबो मिलजूर के बन कोति जाथे, गंगार ला देख के बाम्हन देवता मंतरा पढ़थे, देखे रइथे ओ मनखे हर फेर छूथे, ता वोहर हाड़ी लागथे, बाम्हन देवता बिना कपड़ा ला छोरे फोरे बर कइथे, एकठन पत्थरा के तीर जमो गुलियाथें, फेर जोर से हाड़ी ला पखना मा कचारथे, जमो के मुँहूँ मा गुँहूँ हर छिटक जाथे।
(2)
एकझिन मनखे हर हाड़ी मा रोज पखाना करके वोला लाली कपड़ा मा बाँध देवे। इही हाड़ी ला वो मनखे हर देखे रिहिस। कछु दिन पहिली इ मनखे हर पहार उपर ले डँहक दे रिहिस अऊ मरगे रिहिस।

सीताराम पटेल ” सीतेश”
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)



संघरा-मिंझरा

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