लघु कथा : ठेकवा नाव ठीक

एक ठन गांव मा ठेकवा नाव के एक-हजयन मइनखे रहाये, ओला अपन ठेकवा नाव बने नइ लागे ता हो हा नाव खोजे बर निकल जथे। ता हो हा एक ठन गांव मा जाथे उही मेरन एक-हजयन माइलोगिन गोबर बिनत रथे ता ओला ओकर नाव पुछथे ता ओ हा अपन नाव लक्ष्मी बाई बाताथे ता ठेकवा हा सोच थे एक-हजयन लक्ष्मी बाई रिहिस तेहा अंग्रेज मन संग लोहा ले रिहिस अउ एक-हजयन ऐ लक्ष्मी बाई ला देख ले गोबर बिनत हे।




रस्ता मे उहि कारा ओला एक -हजयन भिखारी मिलथे ता ओला ओखर नाव पुछथे ता ओहा अपन नाव दौलत बताथे ता ठेकवा कथे देख तो ऐकर नाव दौलत हे अउ ये हा भिख मांगत हे। रेगत-उचयरेगत जात रथे ता रस्ता मे मरे मइनखे ला ले गत रथे ता उही मेर के एक-हजयन मइनखे ला बुला के मरे मइनखे के नाव पुछथे ता ओ हा मरे मइनखे के नाव अमर सिंग बाताथे। ता ठेकावा हा कथे अमर सिंग असन हा मर गे ता हमर मन के का ठीकाना ददा। ठेकवा कथे लक्ष्मी बाई गोबर बिने, दौलत मांगे भिख, अमर सिंग मरगे भईया ठेकवा नाव ठीक।
संगवारी हो मइनखे के नाव कुछु रहये नाव ले कुछु नइ होवये मइनखे के काम ले ओखर पहिचान होथे। संगवारी हो तुहरो मन के नाव तुमन ला बने नइ लागत होही ता ओमा निरास होये के कोनो बात नइ होये। सुरता राखे रहू मइनखे के पहिचान ओकर काम ले होथे नाव ले नही।

रवि विजय कंडरा
सिर्रीखुर्द, राजिम
मो.नं.- 7440646486
ई-मेल- rav।v।jaykandra@gma।l.com

टीपनी: संपादक के मुताबिक ‘रेगत-उचयरेगत’ के जघा म ‘रेंगत-उचय-रेंगत’ अउ ‘एक-हजयन’ के जघा म ‘एक-झन’ के प्रयोग होना चाही

संघरा-मिंझरा

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