नान्‍हे कहिनी : नोनी

आज राधा अउ जानकी नल म पानी भरत खानी एक दूसर संग गोठियावत राहय।
राधा ह जानकी ल पूछथे-‘हव बहिनी! सुने हंव तोर बर नवा सगा आय रिहिस किके।’
जानकी ह बताथे-“हव रे! आय तो रिहिन हे!”
‘त तोर का बिचार हे?’
“मोर का बिचार रही बहिनी! दाई-ददा जेकर अंगरी धरा दिही ओकर संग चल देहूं। आखिर उंकर मुड के बोझा तो बनगे हंव”
‘पाछू घनी धोखा खाय हस रे! सोच समझ के निरनय लेबे।’-राधा किथे।
“मोर निरनय ल कब कोन सुने हे रे! पाछू समे में ह अउ पढहूं किके गोहरायेंव त हमर मुड के बोझा हलका होही किके मोला एक झन मंदहा मनखे संग बरोदिन।जब रोज के गारी मार ल नी सहे सकेंव त फेर उंकर मुड के बोझा बनके मइके म बैठे हंव!”-बतावत जानकी के आंसू चुहगे।
‘तभो ले रे! थोरिक मन म भंजाके दाई-ददा ल अपन अंतस के गोठ ल बताबे!’
“में नोनी जनम धरे हंव बहिनी!मोर जिनगी के निरनय लेयके अधिकार मोला नीहे। दाई-ददा जेन निरनय लिही उही म मोर हित समझके कलेचुप चल दुहूं।”
ताहने दूनों झन पानी भरके अपन अपन घर कोती चलदिन।
आज राधा एकेझन पानी भरे बर नल मेर आय हे। ओकर संगी जानकी ल काली कोनो दूसर घर म एकझन लोग-लइका वाला दूजहा मनखे के जोडी बनाके भेज दिन ओकर दाई-ददा मन। एती राधा ह मने मन गुनत रहय-का नोनी के जनम धरई ह अपराध हरे। कब ओला अपन जिनगी के निरनय लेयके अधिकार मिलही?

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

संघरा-मिंझरा

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