लघुकथा : बड़का घर

जब मंगल ह बिलासपुर टेसन म रेल ले उतरिच तव रात के साढ़े दस बज गय रहिस। ओखर गाड़ी ह अढ़ाई घंटा लेट म पहुंचिस, जेखर कारन गाँव जवैया आखिरी बस जेहा साढ़े आठ छूटथे कब के छूट गे रहिस।
ट्रेन ले उतर के वो हा सोचे लगिस के अब का करंव। फेर मंगल ह अपन पाकिट ले पर्स ल निकाल के देखिस, एक ठन पँचसौहा, दु ठन सौ रुपिया अउ दु ठन बिस्सी मने कुल सात सौ चालीस रुपिया वोमा रहिस। कातिक के महिना सुरु हो गय रहिस अउ थोर-थोर ठंढ परे बर चालू हो गय रहिस।
बिन चद्दर अउ गरम कपड़ा के टेसन म रुकना ओला सही नइ लागिस। अपन पीठ म पिट्ठूल बैग ल लादिस अउ ऑटो स्टेंड म आके पुराना बस स्टेंड जवइया ऑटो म बइठ गय।
जाके लॉज म पता करिस, सबले सस्ता वाला कमरा चार सौ के रहिस। ओला 6-8 घंटा के खातिर 400 रुपिया खरचा करना सही नइ लगिस।
अचानक वोला सुरता आइस, येदे लकठा म लिंक रोड म परताप भइया के बहुत बड़ मकान हवय दुमंजिला। परताप भैया वोला कई पइत बोले घलव रहिस “मंगल भाई बिलासपुर आथच तव एकाक पइत घर आबे न भाई, सीएमडी कॉलेज म लिंक रोड म हवय भाई”
“हव भैया आहंव न एकाक पइत” कहिके मंगल ह ह टाल जावय बात ल।
सुट-सुट रेंगत, अनुमान लगात वोहा घर पहुंच गे। सिरतोन म जब्बर बड़ दुमंजिला मकान रहिस। जब्बर बड़ महराजा गेट रहिस। ओखरे बगल म करिया संगमरमर म बड़े बड़े सोनहा अच्छर म लिखाय रहिस ‘प्रताप शर्मा, अभियंता जल संसाधन विभाग”। मंगल एक दु मिनट ले गेट म “काय करंव काय करंव सोचत खड़े रहिस, फेर ओखर नजर घंटी म परिस, वोला दबाइस। थोरकिन देर बाद दरवाजा खुले के अवाज आइस।
फेर गेट खुलिस, परताप ह मंगल ल उपर ले नीचे तक एक बार देखिस फेर बोलिस “अरे मंगल भाई तंय, अतका रात के, इँहा”
“हां भइया रायपुर ले आवत हंव, ट्रेन लेट म पहुंचिस जेखर सेती जरहगांव वाले आखिरी बस छूट गईस”
“एकाक ठो जीप-वीप मिल जातिच खोजते त, ठीक हे चल भीतरी” मंगल ल महसूस हो गय के अइसना रात-बिरात आना परताप भइया ल अच्छा नइ लगिस।
सामने इंट्रेंस के छोटकन कमरा म दुनो झंन बैठिन।
“भउजी मन सो गे हे का भैया”
“हां भाई, चाय पीबे का?”
“भइगे रहे दे भइया, रहन दे, चाय पिये ले नींद नइ आही, फेर सूबे ले निकलना हे”
“हव, येदे तखत म सोजा, ऊपर म कमरा हवय फेर चल इँहे सोजा, तोला सुबे ले निकलना हे”
मंगल ल जोर के भूख लगत रहिस, भइया ह तो पूछते नइ हे खाय बर, ऐति मोर आटी-पोटा ह जरत हे” मंगल सोचत रहिस। परताप ह अपन कमरा म चल दिस। मंगल ह पानी पिस, अपन बोतल निकाल के फेर उही तखत म सुत गए।
छै बजे नींद खुलगे, मंगल के। परताप आइस अउ एक कप चाय देईस।
“भैया भउजी लइका मन ले मिलवा देते”
“अरे आज इतवार आय मंगल इमन आज आठ नौ बजे ले सुतहीं, तय निकल, तोर बस हे 6:45म”
मंगल जइसेच निकलिस, परताप ह दरवाजा फटाक ले बंद करिस, मंगल ल भीतरी ले अवाज सुनाई दिस” चला गया आपका चचेरा भाई, कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं देहाती”
मंगल के नरी म जइसे कुछ अटक गे, दिल ह धक्क ले हो गय, अपमान के कारन आँखि म आँसू आ गइस। वोला अब बड़े मकान ह एकदम छोटकन लागे लगिस।

-महेश पांडेय “मलंग”
पंडरिया (कबीरधाम)
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संघरा-मिंझरा

3 Thoughts to “लघुकथा : बड़का घर

  1. Jay

    बहुत सुंदर कहानी है महेश भाई

  2. केजवा राम साहू / तेजनाथ

    बहुत बढ़िया पांडेय जी। बधाई हो

    1. Mahesh Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद साहू जी ,आपको लघुकथा पसंद आई

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