काकर लइका होइस – छत्‍तीसगढ़ी लघु कथा

सुखिया ह नवा-नवा बहू बनके आय रहिस। गांव के मन नवा बहूरिया ल देखे बर आवय त काहय,मनटोरा तय हर अपन सास-ससुर के एके झन बहू अउ तोर घलो एके झन टुरा,एक के एक्कइस होवय बहिनी, एक दरजन होवन देबे, झट कुन अपरेसन झन करवाबे। मनटोरा ह कहिस,नइ करवांवव बहिनी, महूं लउहा अपरेसन नइ करवाय हंव, मोर टुरा हर सतवासा हरे, छय झन टुरी के बाद होइस हे।




सुखिया ल सास-ससुर अउ ओकर मनखे हर अड़बड़ मया करय। दु बछर बीतिस तहां ले मया ह कमतियागे, आधा शीशी नइ होवत हे कीके मुँह ल फुलोय बर धरलिस।कोन डॉकटर, कोन बइगा, चारों मुड़ा घुमावय अउ अइसने करत-करत सात बछर ह बीतगे, फेर सुखिया के कोरा ह सुक्खा के सुक्खा।
मनटोरा ह एक झन घर कांके पानी पिये बर गिस त बुधिया ह पूछिस, कस मनटोरा तय हर कब कांके पानी पियाबे दई।मनटोरा कहिस,मोर कहां भाग बहिनी,कांके पानी पियाय के, हमर घर ठगड़ी के अब काय लइका होही।तहां सबो झन कहे बर धरलिस,अइ सिरतोन ताय मनटोरा,अब काय होही बंदवा के।ठगड़ी-बंदवा सुनत-सुनत सुखिया के कान पाक गे रहिस, कुरियां मं चिहर- चिहरके रोवय फेर ओकर आंखी के आंसू पोछइया कोनो नइ रहिस।मनखे घलो करू-करू गोठियावय।
सुखिया ह देवी-देवता करन अपन दुख ल गोहरावय अउ जगा-जगा बदना तको बदय। सूजी-पानी ह लगिस अउ नव बछर बाद मं सुखिया ह अड़बड़ पीरा मं टुरा ल होइस। फटाका फूटिस तहां ले गांव मं गोहार परगे, सुकलू के टुरा होइस हे। सबो झन के जबान ले इही निकलय सुकलू के टुरा होइस, कोनो नइ काहय कि सुखिया के टुरा होइस कीके।
मोर मन ह गुनय लइका नइ होवत रहिस त सुखिया के नाव होवय अउ लइका होइस त सुकलू के नाव होइस।

कु.सदानंदनी वर्मा
रिंगनी {सिमगा}



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