गरीबा महाकाव्य (अठवइया पांत : अरसी पांत)

जग मं जतका मनसे प्राणी सब ला चहिये खाना ।
अन्न हवय तब जीयत जीवन बिना अन्न सब सूना ।।
माता अन्न अमर तयं रहि नित पोषण कर सब जन के।
तयं रहि सदा प्रसन्न हमर पर मंय बिनवत हंव तोला।।
बिरता हरा हाल के झुमरय, बजय बांसरी मधुर अवाज
गाय गरूकूदत मेंद्दरावंय, शुद्ध हवा राखय तन ठोस.
माटी के घर तउन मं खपरा, पबरित राखंय गोबर लीप
लइका मन चिखला मं खेलंय, हंसी तउन छल कपटले दूर.
मगर पूर्व के समय बदल गे, अब औद्योगिक युग के राज
बड़े बड़े उद्योग लगत हे, हरियर खेत ला करके नाश.
कल के भोंपू कर्कश बोलत, कल के कंझट फोरत कान
गर्द धुआं उड़ आंखी फोरत, जहर सनाय हवा जिव लेत.
पथरा र्इंट लोह के बंगला, सिरमिट डामर बिछत जमीन
लइका वाहन तरी रेतावत, खेलइ तजिन गिल्ली सुरपूक.
खोंचत पेड़ कारखाना मं, वायु प्रदूषण करे समाप्त
मगर पेड़ के बाढ़ नठत हे, भरे जवानी मुरझा जात.
कारावास रहत हे बंदी, सब अधिकार विकास छेंकात
चिरई धंधा पिंजरा मं कलपत, नरी मं अटकत मधुर आवाज.
मंय विकास के दुश्मन नइ अंव, पर अतका बोले अधिकार –
होत विकास तउन अनियंत्रित, बिगर समीक्षा होवत काम.
जिंहा कारखाना के जरुरत, धान उगे कहि करत प्रयास
जिंहा फसल कम श्रम मं छकबक, उहां कारखाना लग जात.
यदि माटी के घर हा टूटत, हो सकथय फिर गंसगंस धान
पर दस मंजिल भवन तउन तिर, कभू भविष्य फसल नइ होय.
जिंहा लौह सिरमिट हा उबजत, पथरा डामर ढंके जमीन
उहां के मन हर जिनिस ला खावत, ओकर पेटभरे दलगीर.
जिहां अन्न परमेसरी उबजत, बिरता कारन गद सब खार
उंकर पेट हा सपसप बोलत, भूख मरत बिन खाय अनाज.
मंगलिन जिंहा करत हे बासा, तउन भवन हा आलीशान
दुनिया मं सुख सुविधा जतका, सेवा करत हाथ ला जोड़.
भवन के आगू दरवाजा मं, जोधी नाम सुरक्षा गार्ड
सजग टंच बन पहरा देवत, एकर रुतबा बाघ समान.
चिरई घलो अंदर नइ जावत, जोधी के आज्ञा ला काट
जेला अंदर घुसना होथय, एकर पास इजाजत लेत.
एकर बीच ठाड़ हो जाथंय बुल्खू खलकट भाना ।
एमन ला जोधी गुर्रावत छटका दूनों आंखी ।।
घुड़किस – “”बिन बलाय आ जाथव, खड़े होत हव भूत समान
काकर पास आय का कारन, सब हुलिया फोरव तुम साफ?”
बुल्खू खलकट खड़े कलेचुप, पर भाना के चढ़गे क्रोध –
“”जोधी आय भृत्य मंगलिन के, यने परिस्थिति हमर समान.
लेकिन हम पर रुतबा झाड़त, हुलिया पूछत बन जासूस
एकर रउती आय लगत हे, मंय देवत हंव धुमड़ा खेद.”
बुल्खू हा भाना ला रोकिस – “”जोधी संग झन कर तकरार
आगन्तुक से प्रश्न चलाना, डांट लगाना एकर काम.
यदि फटकार झड़े ले मिलथय, जोधी ला भरपेट अनाज
एकर भोजन कार छिनन हम, क्रोध सुनन रहि के चुपचाप.”
बुल्खू हा जोधी ला बोलिस – “”मंगलिन से करना हे भेंट
ओकर तिर आवश्यक बूता, अंदर मं इतला कर देव.”
जोधी हा मंगलिन तिर पहुंचिस, बुल्खू के सब खबर बतैस
सुन मंगलिन के टेंशन बढ़थय, बुल्खू काबर मुंह ला लैस !
जोधी ला आदेश सुनाथय – “”बुल्खू तिर तंय कहि संदेश
हवय फलानी हा अनुपस्थित, ओकर साथ भेंट नइ होय.”
जोधी हा बुल्खू तिर अमरिस, बोलिस – “”हमर मालकिन नेक
आगन्तुक ला इज्जत देथय, करथय मदद रखत सम्मान.
मगर मालकिन अभि अनुपस्थित, हम नइ जानत कतिंहा गीस
तुम्मन लहुट अपन घर जावव, फेर बाद मं पता लगाव.”
बुल्खू निश्चय वापिस होतिस, मगर देखथय ओकर आंख –
जेन कार पर मंगलिन बइठत, उही कार हे आगुच ठाड़.
बुल्खू सच रहस्य ला जानिस-मंगलिन हाजिर अपन निवास
पर हमला खेदे बर चाहत, तब भेजत झूठा संदेश.
बुल्खू हा जोधी ला हकनिस- “”मंगलिन हवन सर्व सम्पन्न
भारत मं जेवन कर सकथय, हाथ अंचोहय पहुंच विदेश.
यने विश्व के जमों ठउर पर, मंगलिन पहुंच सकत बिन आड़
लेकिन अभी हवय बंगला मं, सुरुज असन मंय बोलत सत्य.
मंगलिन मनसे मंय तक मनसे, ओकर मोर कहां कुछ भेद
जब मंय आय दउड़ ओकर तिर, भेंट बिना वापिस नइ जांव”
बुल्खू हा बरपेली घुसरत, खत्नकट भाना ओकर साथ
जोधी हा भिड़ कतको छेंकत, लेकिन असफल जात प्रयत्न.
नांगर मं लेटा छबड़ावत, बूता पुरो सकय नइ नास
तब किसान हा इरता हकरा, आगू तन लेगत सब काम.
बुल्खू बइठक कक्ष मं अमरिस, बइठिन उहां गाड़ के खाम
मंगलिन जानिस-बुल्खू घेक्खर, बिना भेंट वापिस नइ जाय.
आखिर मं तीनों तिर आइस, जोधी अ‍ैस आंख कर लाल
कहिथय-” एमन बण्ड झगरहा, बरजत तभो पेल दिन बात.
तोर इशारा भर मंय देखत-मंय पालन करिहंव कत्र्तव्य
घेक्खर मन के मुंह करिया कर, बाहिर फेंक दुहूं चेचकार.”
मंगलिन हा जोधी ला खेदिस- “”तंय हा लहुट बजा खुद काम
जलगस एमन इहां रुके हें, एकोझन अंदर झन आय.”
जोधी ओतिर ले हटजाथय, मंगलिन के सुन आज्ञा।
अब कमरा मं शांति बिराजत यने बसत सन्नाटा।।
सन्नाटा ला मंगलिन टोरिस, बात ढिलत गंभीर अवाज –
“”काबर आय मोर तिर दउड़त, मोर बिना अरझे का काम ?”
बुल्खू कथय उग्रता ला तज- “”कारखाना के खोल कपाट
जम्मों श्रमिक कमाय चहत हें, ओमन अब टोरत हड़ताल.”
मंगलिन टांठ शब्द ला हेरिस – “”तहूं श्रमिक नेता विख्यात
लगवा आग कारखाना मं, मालिक होय निहू कंगाल.
गलत बात कहि श्रमिक ला उभरा, घर बइठार करा हड़ताल
मालिक श्रमिक लड़ंय दुश्मन बन, उच्च सिंहासन पर तंय बैठ.
पर तंय अभी बात जे बोलत, सुन के मंय होवत आश्चर्य
नांग सांप यदि अमृत बांटत, अजरज झझकइ हे अनिवार्य.”
बुल्खू बोलिस – “”मोर करा हे, एक सेक बढ़के कटु वाक्य
भाषा व्यंग अगर मंय मारत, बाण झेल कउनो नइ पाय-
पूंजीपति मन होत लुटेरा, ओमन चुहकत श्रमिक के खून
पर हक मारत बन के शोषक, ओमन होत वतन गद्दार.
इसने पथरा अस बोली ढिल, मार सकत तोर दिल मं शूल
मगर शत्रुता हा बढ़ जाहय, सच उद्देश्य विफल तत्काल.”
मंगलिन बला टरय कहि बोलिस- “” होत मोर तिर कमती टेम
तोर मांग का तंय चाहत का, झपकुन फोर बात दलगीर ?”
बुल्खू बोलिस- “”मांग सकत मंय, कारखाना ला हमला देव
मगर व्यवस्था अभि हे दूसर, कार रखंव अनुचित प्रस्ताव ?
मोर विचार तउन ला सुन ले, मंय का चहत बतावत साफ
जहर करूअस बोली लगिहय, पर परिणाम स्वाद हा मीठ-
आलीशान भवन मं तंय रहि, वातानुकूलित होय प्रबंध
अउ हम बसन स्वयं के घर मं, पंखा या कूलर तो होय.
तुम्मन हवई जिहाज मं बइठव, जब मन होवय जाव विदेश
पर हम बइठ फटफटी घूमन, देखन देश के जम्मों ठौर.
तुम कोंहकोंह ओंड़ा तक खावव, बासमती चांवल घी शुद्ध
लेकिन हमर खाय बर चहिये-सफरी चांवल फल्ली तेल.”
एकर बाद किहिस अउ बुल्खू- “”मंय बोलत तेकर सुन सार
खुलय कारखाना हा झपकुन, जमों श्रमिक मन फेर कमांय.”
मंगलिन टरकिस -“”काबर खोलंव, कारखाना के बंद कपाट
करत श्रमिक मन क्रांति के बूता, भूख मरंय पावंय तकलीफ.
अपन जिद्द ला माने बर तुम, बाध्य करत हव डार दबाव
पर मंय ककरो ला नइ मानंव, मंय चलिहंव खुद मन अनुसार.”
बुल्खू बोलिस -“”मोर मान तंय खोल तुरुत कारखाना।
श्रमिक कमा वेतन पाहंय तंय घलो लाभ अमराबे।।
बुल्खू खलकट भाना उठथंय, रेंगिन लहुट उहां ला छोड़
मंगलिन होइस एके झन तंह, मन में सोचत बन गंभीर-
“”जब ले बंद परे मोर मिल हा, मंय झेलत नंगत नुकसान
माल जाम ते बिक नइ पावत, नव उत्पादन तक हा बंद.
बैंक कर्ज के ब्याज बढ़त हे, गिरत बजार के जम्मों साख
सिरी गिरत उद्योग जगत मं, फिकर हा तन पर लावत रोग.
अब यदि मंय हा अंड़िया बइठत, टेस मं बंद रखत उद्योग
भागे मछरी जांग बरोबर- मुड़ धुनधुन पछताहंव बाद.
बुल्खू मन आ करिन निवेदन, तब मंय सुन लंव उंकर गोहार
मोर प्रतिष्ठा ऊंच सदा अस, ककरो कहां परत मंय पांव!
दूसर दिन के फजर हा आथय, सबझन धरत स्वयं के काम
दूध बेचइया दूध ला बेचत, व्यापारी मन चलत दुकान.
हाकर झपझप घर घर जावत, दैनिक के प्रति देवत बांट
रिक्शा चालक हा रिक्शा धर, खोज करत हे यात्री ठोस.
मिल के श्रमिक असाद असन हें, काम बिना बइठे झखमार
कोन तनी जीविका ला मांगंय, एकोकन नइ दिखत प्रकाश.
तभे अचानक मंगलिन मिल के, भोंपू दिस लगातार अवाज
ओकर अर्थ श्रमिक मन समझिन – मिल के दरवाजा खुलगीस.
हम्मन जावन कारखाना अब, महिनत करन पकड़ के काम
अगर देर तब हालत अइसे – डारा ले बेंदरा चुक जात.
श्रमिक प्रसन्न उछल नाचत हें, मुरझुर मुंह हा हरियर रुप
मरत फसल पर पानी बरसत, पोंगा फुटत करेरी मार.
उत्ता धुर्रा श्रमिक सम्हर गें, मिल तन दउड़त पल्ला छोड़
एक दूसरा ला ढकले बर, होड़ चलत हे ताकत मार.
आखिर मिल के आगू पहुंचिन, जेन सुनिन तेहर सच बात –
खुले हवय मिल के दरवाजा, अंदर जाय निमंत्रण देत.
लेकिन झनक खड़े आगुच मं अंड़िया राखे छाती ।
जेन श्रमिक हा घुसरत तेला ढकलत बाहिर कोती ।।
बोलत – “”तुम हड़ताल करे हव, ओकर बाद काम पर जात
कतका प्रतिशत मिलत बढ़ौत्री, पहिली एकर बता हिसाब.
हम नुकसान खाय हन नंगत, कर्ज करे हन कई झन पास
सब नुकसान भरय मंगलिन हा, रिन पटाय बर अग्रिम लाय.”
जमों श्रमिक मन धथुवा रुकगें, भाना गीस झनक के पास
कथय – “”तोर तिर कान फुंकावत, बिन बलाय आ जाहय कष्ट.
मिल के कइ मशीन मन टूटिन, होतिस लाभ तउन रुक गीस
अगर नदानी करत जरा भर, भरना परिच जहय क्षतिपूर्ति.
पहिली हम्मन काम बजावन, पाय कारखाना डंट लाभ
तेकर बाद मांग यदि रखबो, मंगलिन मान लिही सब मांग.”
कथय झनक के शांति निवेदन, समझौता बंधुत्व सलाह
एमन औद्योगिक जग के अरि, श्रमिक ला देवत हें नुकसान.
अगर मांग ला चहत मनाना, मालिक के मुड़ चहत झुकाय
इंकर मदद खत्तम लेवव तुम – तोड़फोड़ अनशन हड़ताल.”
झनक किहिस भाना ला खखुवा – “”मंय जानत तुम तीन के पोल
बुल्खू खलकट तंय सुम्मत बंध, श्रमिक विरुद्ध रचत षड़यंत्र.
तुम मंगलिन के तिर पहुंचे हव, भोभस भरे अपन भर स्वार्थ
तब मंगलिन के चहत भलाई, जमों श्रमिक के हित ला खात.”
भाना के तन आगी लगथय, बिन कारन मुड़ आवत दोष
ओहर झनक ला पेल हटाइस, मिल मं गीस करे बर काम.
बचे श्रमिक मन काबर बिलमंय, खाता पहुंच करत श्रम खूब
भर उत्साह चुहात पसीना, थकत तभो ले जोंगत काम.
मंगलिन उंकर काम ला देखिस, होत श्रमिक पर अब विश्वास-
अपन इमान श्रमिक मन राखत, मोला मिलिहय निश्चय लाभ.
जम्मों श्रमिक रिझा जावय कहि, फट बंटवा दिस अग्रिम नोट
जहां श्रमिक मन रुपिया झोंकिन, मंगलिन के बोलत जयकार.
मंगलिन हा उपकार करत नइ, एमां हवय स्वयं के स्वार्थ
अब मजदूर झड़क के जेवन, करिहंय काम दून उत्साह.
खलकट भाना के मुंह हरियर, रुपिया धरे बहुत दिन बाद
जिनिस बिसाय हाट गिन ओमन, लेना काय करत हें सोच.
उभे दुकनहा के तिर पहुंचिन, जेन किराना अन्न दुकान
कहिथय उभे – जिनिस उत्तम ला, रखे तोर बर बने सम्हाल.
निमरा फुना साफ चांउर हे, चिलकत बरन के राहेरदार
गंहू रिलियहा के छींटा नइ, पोहा हे ते दगदग साफ.
हरदी चाय मसाला शक्कर, कम लगाय हंव इनकर दाम
सिरिफ मोर तिर उंचहा साबुन, शुद्ध नारियल फल्ली तेल.
जेन जरुरत तेन लेव तुम मंय देवत हरहिंछा ।
यदि रुपिया कमती पर जावत लेगव जिनिस उधारी ।।
खलकट हांस डरिस एला सुन, कहिथय – “”बुरा बात झन मान
तुम व्यापारी मन केकरा अव, चलथव राह समय अनुसार.
जे दिन हम हड़ताल करे हन, याने चुमुक बंद सब काम
सब दुकान मं जिनिस मंगे हन, ताकि पेट भर जेवन नान.
पर सब रिता हाथ लहुटा दिन, एको झन नइ दीन उधार
लेकिन अब का बुद्धि लहुटगे, स्वयं बला के नापत चीज ?”
कहिथय उभे – “”हमर जीवन हा, तुम्हर भरोसा हे जस बेल
तुम दुख पाथव हम दुथ पाथन, तुम सुख पात हमूं खुश होत.
याने जब हड़ताल चलत हे, तुम वेतन ले रहिथव दूर
काकर पास जिनिस ला बेंचन, यदि उधार तब डूबत कर्ज.
तुम कमात तब रुपिया पावत, हमला नाप जिनिस तुम लेत
बदला मं हम नफा कमावत, तब फिर मिलत खाय निÏश्चत.”
खलकट भाना तथ्य समझगें, मन माफिक लेवत सामान
पटा सकिन ततका रुपिया दिन, बचत नोट ला रखिन उधार.
सब समान धर वापिस घरगिन, अब जेवन रांधे के टेम
खलकट कहिथय – “”भूख बियापत, जेवन बना खाय बर जल्द.
मगर मोर आज्ञा तक ला सुन – जेवन बना सुपच स्वादिष्ट
अंगरी तक ला चाब डरंव मंय, जीवन रहत रखंव मंय याद.”
भाना के मन हा आनंदित, पर बाहिर मं क्रोध देखात –
“”जुन्ना युग के खटला नोहंव, जेमां सुन लंव घुड़की तोर.
कंधा मिला तोर संग रेंगत, करत परिश्रम तोर समान
तोर जतिक अधिकार हे मोरो, दूनों मं नीहू हे कोन ?
मन पसंद यदि खाय चहत हस, मोर मदद कर तज के भेद
मंय चांउर ला यदि धोवत हंव, तब तंय राख साग ला काट.
सब्जी मं मंय नांव मसाला, तंय हा मिला दार ला शीघ्र
जेवन चुर के पूरा होवय, खावन दुनों एक संग बैठ.”
सुम्मत बांध दुनों रांधिन अब करिहंय बैठबियारी ।
इही बीच डेंवा हा पहुंचिस तउन घलो हे भूखा ।।
कहिथय – “”आय बने बेरा मं, जउन चहत ते मिलिहय आज
मोर खाय बर चलव निकालव, मंग के खाय मं नइये लाज.”
खलकट बोलिस -“”तुम किसान मन, उपजावत हव खाय अनाज
तुम्हर घलो हक के खाये बर, नदिया के जल नदी मं जात.”
तीनों झन खलखला के हांसिन, एकर बाद बइठ गिन खाय
भोजन के स्तर ला देखत, डेंवा ला होवत आश्चर्य.
कहिथय -“”तुम पूजीपति नोहव, तुम अव औद्योगिक मजदूर
शहर के रहना बसना ऊंचा, जेवन करत तेन तक ठीक.
हम किसान मन गांव मं रहिथन, पोषक अन कहि मारत डींग
पर जेवन नइ पान बने अस, रहन सहन ला पशु अस जान.”
स्वाद लगा जेवत तीनों झन, जमों फिकर ला दूर खेदार
पेट भरिस तंह हाथ अंचोवत, सरलग चलत आपसी गोठ.
एकर बाद चलिस डेंवा हा, घना ला खोजत धर के पेज
आखिर घना सपड़ गिस आगू, जेला चहत तउन मिलगीस.
डेंवा कथय – “”खूब खोजत हंव, होगिस भेंट सुफल हे यत्न
मंय पूछत तेकर उत्तर दव, एकोकन मारव झन फोंक-
तोर पास आश्वासन ला पा, अपन गांव मंय वापिस गेंव
मनसे चील असन जुरिया गिन, पूछिन झूम बांध के हाल.
मंय ऊंकर तिर पटकेंव उत्तर- रखव विधायक पर विश्वास
बांध बनाय दीस आश्वासन, पूरा करिहय अपन जबान.
डेंवा हा फिर घना ला पूछिस- “”मगर बांध हा बन नइ पैस
एकर कारन ला सच फुरिया, कोन शत्रु अरझावत काम ?”
घना जउन ला टरकावत हे, उही दड़ंग ले सम्मुख आत
डेंवा प्रश्न करिस जब चिथिया, घना सन्न रहिथय कुछ टेम.
मगर स्वयं ला हवय बचाना, पर के मुड़ पर डारत दोष
मेड़ के ढेला खेत गिरत हे, तब फेंकत दूसर के मेड़.
मर आश्चर्य घना हा पूछत -“”तंय काबर बोलत हस झूठ
बांध काम रुकगे बोलत हस, लेकिन नइ होवत विश्वास.
तोर गांव मंय जात रेहे हंव, चलत काम के करतेंव जांच
त्रुटि या कमी ला हट जावय कहि, साहब पर करतेंव प्रहार.
मगर तोर सच बात ला सुन के, मंय हा रुकत चले बर राह
चलव तथ्य के पता लगावन, अधिकारी के खावन मांस.”
निज गंतव्य दुनों झन चलतिन, तभे उमेंदी गप ले अ‍ैस
रास ला देख कृषक खुश होथय, होत उमेंदी ला अति हर्ष.
बोलिस -“”तोर बहुत हे अयबल, तोर कोन हा सकत बिगाड़
तभे याद ला करे हवंव बस, होगिस झपकुन दर्शन तोर.
हमर कोष मं जमा करे बर, बिगर बहाना रुपिया लान
तंय हा अपन बचन हारे हस, ओला पूरा कर तत्काल.
मछली फांदा मं फंस जाथय तब ले देत उझेला ।
घना विधायक बोचके बर भारत ढचरा के ढेला ।।
किहिस -“”जमा हे कतका रुपिया, खंगत हवय अउ कतका नोट
मोर डहर ले रहा निफिकरी, मोर नोट ला जमा हे जान.
पहिली पर तिर उघा ले रुपिया, ओकर बाद पहुंच तिर मोर
जतका रुपिया कमी कोष बर, ओतका सब मंय करिहंव पूर्ण.”
घना जहां टरके बर सोचिस, तुरुत उमेंदी ताड़िस सत्य
कहिथय -“”कतको घन हल रेंगत, पर कांसी नइ छोड़य खेत.
तइसे मोर खसकना मुस्कुल, मंय हा घलो विधायक पूर्व
जेन चाल तंय अब रेंगत हस, ओकर दिग्दर्शक मंय आंव.
जतका मदद करे बर सोचत, मोर हाथ पर रुपिया राख
अगर हाथ रीता हरदम बर, उहू बात ला फुरिया साफ !”
जमों डहर ले घना हा गिरगे, तब फोरत हे वाजिब तथ्य-
मंय पावत रुपिया हर महिना, पर कंस खर्च होत हर रोज.
जेन क्षेत्र मं बाढ़ के पीड़ित, उहां मदद बर रुपिया देत
होत हमर दल के अधिवेशन, उहां घलो हम नोट पठोय.
अतेक कलपना जउन करे हंव, एकर अर्थ जान तंय साफ-
मोर पास रुपिया हे कम अक, तोर मदद बर मुश्किल जात.
मगर एक ठक आस बचे अउ, बाबूलाल के तिर चल शीघ्र
ओहर यदि कर देत व्यवस्था, हमर समस्या तुरुत समाप्त.”
बाबूलाल ले भेंटे बर अब, लकर धकर तीनों झन जात
इंकर निदान हवय ओकर तिर, काबर बिलम करंय कुछ बेर !
भेंटिन बाबूलाल ला तंहने, बोलिस घना राख के आस-
बांध बने बर होत शुरूकब, कब पहुंचिस ओकर आदेश?
एकर साथ एक अउ बूता-लाय उमेंदी ला धर साथ
अपन शक्ति भर मदद अमर दे, एमां सधत मोर तक स्वार्थ.”
बाबूलाल के मुंह उतरे अस, फिकर मं काड़ी असन शरीर
केंघरिस -“”मोला झन गोहरावव, मोर पास अब का अधिकार !
अण्डा के जर होत नौकरी, उही कहावत होगिस सिद्ध
तुम्हर पुकार तुलू अउ सुनिहय, नवा आय बदला मं मोर.”
घना विधायक चकरित होवत -“”तंय हा भेद लुका झन राख
तोर बात हा उमंझ परत नइ, कहना काय चहत सच बोल ?”
बाबूलाल अपन दुख रोथय -“”छेरकू के मंय मान दबाव
बगस के काम ला लेगेंव आगू, अपन हाथ ला खुद हा फांस.
याने मंय हस्ताक्षर मारेंव, मिलिस बगस ला आर्थिक लाभ
पर उपकार के बदला मं मंय, पाएंव जिनगी बर अंधियार –
अंगरी उठिस विरुद्ध के बाबूलाल भ्रष्ट अधिकारी ।
लीस बगस ले कोंहकोंह रिश्वत शासन ला दिस घाटा।।
जहां तथ्य के चलिस निरीक्षण, सब आरोप मोर मुड़ अ‍ैस
होय निलम्बित निरपराध मंय, छिनगे मोर जतिक अधिकार.
अपन गोहार करे बर मंय हा, छेरकू पास दउड़ के गंव
बोलेंव – “”तोर बात ला सुन के, बगस के काम पूर्ण कर देंव.
पर परिणाम हा करुहा निकलिस, होय निलम्बित मंय तत्काल
मोर नौकरी तिंही बचा अब, होय निलम्बन आज्ञा रद्द.”
छेरकू साफ उड़िस पोनी अस -“”मोला कार करत बदनाम
गलत काम बर कब बोले हंव, परमानित बर लान गवाह.
मोर बात ला यदि तंय मानत, अंदर कुआं मं जझरंग कूद
तोर असन अधिकारिच कारन, होत राजनीतिक बदनाम.
मंय शासन के अदमी होथंव, शासन के विरुद्ध नइ जांव
गल्ती चाला चले हवस तब, अपन कर्मफल तंय खुद भोग.”
छेरकू छोड़िस बात करे बर, मुंह ला टेड़गा करूबनैस
बोझा अस काबर रुकतेंव मंय, लहुट गेंव धर के अपमान.”
घना उमेंदी डेंवा मन चुप, बाबूलाल तनी हे ध्यान
ओकर व्यथा सुनत ओरखत हें, देत हुंकारूबन गंभीर.
मगर परिस्थिति हा अब बदलत, डेंवा चलत समय अनुसार
बाबूलाल ला देख के कांपय, अब काटत ओहर हर बात.
बाबूलाल के तिर अमरे बर, कंपस जाय डेंवा के गोड़
उहिच व्यक्ति हा सम्मुख मं रुक, अपन बुद्धि के मारत डींग.
डेंवा हा अंखिया के झींकिस, तुरुत उमेंदी ला खुद पास
कहिथय-“”मनखे पद पर रहिथय, गरब देखाथय छाती तान.
बाबूलाल रिहिस पद पर तब, करिस शक्ति भर अनुचित काम
लेकिन पाप के मरकी भरगे, फट ले छूटगिस पद उच्च.”
किहिस उमेंदी -“”उचित कहत हस, बाबूलाल करिस हे लूट
जनता के श्रम नोट ला खाइस, ओकर भोगय दुख परिणाम.”
मानव के आदत बेढंगा – टेटका अस बदलत हे रंग
जे मनसे के काम सफल हे, मरत चलत ओकर तारीफ.
कहिथंय-सफल फलाना होवत, ओकर काम चाल सब ठीक
ओकर असन सबो झन होवंय, अपन कर्मफल पावंय नीक.
पर ओकर पर गिरत बेवस्ता, या हालत गिर जावत निम्न
तंहने दूसर हंस के एल्हत – दुनिया भर के दोष लगात.
कथय – अबगुनी हवय ढेकाना, ओकर बुता सदा त्रुटिपूर्ण
अपन पाप के फल ला भोगत, ओकर ले भागो सब दूर.
डेंवा ला अब कथय घना हा – “”हमर उदिम मं परगे आड़
बांध के बारे बात करे बर, साहब कर आये हन दौड़.
लेकिन बाबूलाल निलम्बित, ओकर छिनगे सब अधिकार
तब हम्मन उपाय का जोंगन – एकोकनिक सुझत नइ राह !”
डेंवा कथय -“”दोष नइ ककरो, करे हवस तंय अथक प्रयास
पर सब धारोधार बोहागे, एकोकन गल्ती नइ तोर.
जनता के हित दौड़ करे हस, पर सब यत्न गीस बेकार
अपन जान ला थोरे देबे, तंय हा रहि जा बिल्कुल शांत.”
घना हा खुश होके सोचत हे – “”बाबूलाल निलम्बित होय
यद्यपि ओकर भावी बिगड़िस, मगर मोर इज्जत बचगीस.
फांसी के डोरी हा कटगे, मंय होगेंव छेल्ला आजाद
अब मोला निÏश्चत जनावत, सब बदनामी ले बच गेंव.”
घना हा उमेंदी ला कहिथय-“”बाबूलाल हा खुद असमर्थ
ओकर मुंह ला काबर जोहन, हमर मांग हा जाहय व्यर्थ.”
घना उमेंदी ला रुपियादिस खिसा मं राखे तेला ।
सब ला नमस्कार खुद करथय उंकर ले काटिस कन्नी।।
आगू डहर झिंगुट हा दिखथय, ओकर साथ करिस नइ भेंट
डर हे – सिरिफ बुद्धि ला खाहय, बिगर अर्थ के ढिलिहय गोठ.
झिंगुट घलो हे अपन बिधुन मं, जावत हे इमला के पास
चित्र बनाय जिनिस हे तिर मं, तेला राखे प्रान समान.
तभे उहिच कौंवा हा अमरिस, जेकर साथ पूर्व पहिचान
कहिथय- तंय जे चीज धरे हस, ओला फेंक समझ बेकार.
यदि तंय चहत चित्र बनवाना, इमला मदद दिही खुद दौड़
अपन काम ला कर नइ पावस, तोर स्वभाव प्रशंसा लैक.”
कौंवा हनिस व्यंग्य भाषा तंह, झिंगुट ला परगे बान समान
कहिथय -“”टांठ बचन बोलत हाल, देवत पीर मगर ए सीख.
टोर्रठ बोल रंग तक करिया, एमन आय प्राकृतिक रुप
इंकरो ले तंय घृणा करस नइ, तभे सफल हे जीवन तोर.
पर हम कर्मवीर के वंशज, अपन हाथ हम करेन विकास
आज दूसरा के मुंह ताकत, तब हम असफल हन हर क्षेत्र.
पर मंय अपन चाल बदले हंव, पर के मुंह तकना अब बंद
अपना काम ला स्वयं पुरोहंव, तब परिणाम मं मिलिहय जीत.”
कौंवा हंसिस -“”गरजथय बादर, तेन बरस जावय तब ठीक
यदि बड़नउकी पूरा होवत, तब भविष्य जमही विश्वास.”
छोड़िस झिंगुट प्रश्न उत्तर ला, बाते मं बाढ़त बस बात
ओहर इमला पास अमरगे, मन मं ललक करे बर काम.
बनके नम्र कथय इमला ला -“”चित्र बनाहंव करके यत्न
यदि त्रुटि होत टोंक देबे फट, सही बनाय चहत हंव राह.”
इमला कथय -“”सांप हा चलथय, टेड़गा बेड़गा घसल जमीन
कछुआ जीव बचाय बर राखत, मुड़ ला लुका के अंदर खोल.
तइसे तोर बुद्धि हा अस्थिर, एतन ओतन किंजरत व्यर्थ
काम देख के भागे चाहत, खोजत रथस बहाना मात्र.
अपन मदद करबे तंय जे दिन, अपन शक्ति के यदि पहचान
कैंसर रोग इलाज हा संभव, मंगल ग्रह मं मानव वास.”
इमला देत ठोसरा बल भर, झिंगुट के बुद्धि ला करथय उग्र
मगर झिंगुट पर कुछुच असर नइ, पुरई पान ले बिछलत नीर.
ओहर चित्र बने कहि करथय- बुद्धि लगा के अबड़ प्रयास
बिगड़त चित्र बोहावत महिनत, तब ले बढ़ा रखे उत्साह.
अपन काम ला करत बिधुन हो, रख के धैर्य चित्त एकाग्र
माछी उड़ उड़ घाव ला चाबत, पर ओ कोत ध्यान नइ देत.
चित्रकला के प्रश्न ला पूछत झिंगुट बने अज्ञानी ।
इमला सबके उत्तर देवत बचा रखिस नइ थाथी ।।
झिंगुट करत हे अथक परिश्रम, श्रमकण बहत माथ ले नाक
गोड़ पिरात खड़े हे अंड़िया, झुमरत आंख रखे हे खोल.
इमला हंसिस -“”मेड़ हा फूटत, जब्दा माल करत यदि काम
लुलसा घन मं लकड़ी चीरत, उकल जात हे फोरा हाथ.”
इमला हा समझात झिंगुट ला -“” मनसे मरत पोट पोट भूख
यदि ओंड़ा के आत ले बोजत, मरिहय या पर जहय बिमार.
तंय उद्देश्य पाय बर सोचत, सफल होय के धरे विचार
काम बजा तंय धुन पक्का कर, हर दिन सतत समय अनुसार.
जतका शक्ति श्रम घलो ओतका, सामन्जस्य दुनों मं राख
बुद्धि देह हा टंच बने तंह, तंय हरदम कर सकबे काम”
ए बोली हा गड़त झिंगुट ला, मगर झेल लिस सबला हांस
धर संतोष उहां ले चलथय, भावी साफ दिखत हे साफ.
ओहर पंचम पास मं पहुंचिस, मन के प्रश्न ला बाहिर लैस –
“”कर्मवीर मंय बने चहत हंव, ओकर बर उपाय तंय फोर.
मन मं होथय काम करंव मंय, बइठंव सबले आगे पांत
मगर वक्त पर पांव हा ठोठकत, असफलता के भय हा खात.
दवई लगत तब लान पिये बर, सुजी जरुरत तब हुग बांह
लेकिन मोर रोग कट भागय, बग जग जाय सोय पुरुषार्थ.”
पंचम तुरुत झिंगुट ला जांचिस, कई उपाय कर होवत जांच
ैतब फिर गुन के पंचम बोलिस -“”मंय हा पकड़ लेंव सब रोग.
तोर देह हा टंच निरोगिल, बुद्धि स्वस्थ पकड़त हर बात
यदि मंय तोला दुहूं दवाई, हर हालत करिहय नुकसान
भरे तोर मं हीन उच्चता, ओहर रखत सदा असमान्य
आगू सरक के पाछू रेंगत, यने सफलता भागत दूर.
काम सरल या कठिन भयंकर, पूर्ण अपूर्ण के छोड़ विचार
कर्म पूर्व कुछ शंका झन कर, रहि निÏश्चत काम ला जोंग.
अइसन तत्व मनुज तन रहिथय, जउन बताथय अपन प्रभाव
सूजी दवई रहत दुरिहा मं, तभो रोग ला करथय ठीक.”
पंचम हा सच राह बताइस, मिलिस झिंगुट ला नव उत्साह
अब कार्यालय छोड़त पंचम, जावत जे तन लगत बजार.
एतन ओतन नजर घुमत टिकगे जैलू पर आंखी ।
जेन चीज जैलू लेवत अचरज ले भरे कहानी ।।
शिशु मन पीयत दूध पावडर, बालक मन बर बाबा सूट
देख भुलाथंय तउन खिलौना, बालक मन के साबुन तेल.
तभे उदुप जैलू हा देखिस, पंचम हा आवत हे पास
जमों चीज ला पिछू लुका लिस, ताकि नजर हा झन पर जाय.
जैलू कथय -“”भेंट होगिस फट, करत फिकर कर जेकर याद
तोर साथ मं भेंट करे बर, वाकई मं हर क्षण बेचैन.
मंय हा अमल मं तंय जानत हस, लगे हवय बस अब तब टेम
मोर कोख ले शिशु अवतरिहय- सात दिनांक बजे दस रात.
लेकिन एक बात तंय सच कहि- निभा सकत हस जचकी मोर
यदि इंकार उहू ला कहि दे, मंय कर सकथंव दुसर प्रबंध ?”
पंचम किहिस- “”पूर्ण सक्षम हंव, जचकी काम करे बर पूर्ण
अउ मन बरगलांय कतको अस, पर उभरउनी ला झन मान.
दूसर पास अगर तंय जावत, मिलिहय उहां कष्ट नुकसान
सुजी दवई चाकू तक चलिहय. दुर्गति होही तोर शरीर.
मोर पास यदि जचकी निभिहय, तोर होय नइ कुछ नुकसान
बालक घलो सुरक्षित बचही, सच मिंझार आश्वासन देत.”
जैलू हर्षित उहां ले रेंगिस, ओहर पाय पूर्ण विश्वास
यदपि पांव ओहिले तन जावत, पर पाछू देखत हे लौट.
पंचम ओकर पाछू आवत, लुकत छुपत हे ओटघन देख
जैलू हा पकड़न झन पावय, इसने बचा चलत हे राह.
जैलू हा एक घर कर रुकगिस, जांचिस सब तन फेंक के नैन
तंह तत्काल घुसर गिस अंदर, ओकर दउहा दिख नइ पात.
पंचम उही मकान मं घुसरिस, करत हवय जैलू के खोज
आखिर दिखिस एक ठन कमरा, लुका के जांचत उहां के हाल-
जैलू पहिरे लुगा अउ पोलका, हाथ मं चूरी टिकली माथ
नकली स्तन बाल हा नकली, मांग भरे हे भर सिन्दूर.
ओकर गोदी मं दुलार ते रोवत ढारत आंसू ।
ओला भुरिया शांत कराये – जैलू गावत लोरी ।।
जैलू शिशु ला दूध पियावत, खुश होवत ओकर मुंह देख
हला खेलौना खेल खेलावत, दूसर तनी ध्यान नइ देत.
जैलू के हालत ला देखत, पंचम खुद ला रख चुपचाप
अचरज खुशी सोग डर होवत, याने हर बल ले असमर्थ.
यदि जैलू ला थोरको छेड़त, हो सकथय कुछ गलत अनर्थ-
जैलू अपघाती कर लेहय, या दुलार के जाहय जान.
पंचम उहां ले बाहिर निकलिस, पांव के आहट ला चुप राख
थोरिक दूर चलिस आगू तन, मोंगरा संग होगिस फट भेंट.
मोंगरा ओकर ऊपर बरसिस – “”तंय बोलत हस हरदम झूठ
जेन बुता हा कठिन असम्भव, ओकर बर मानी पी लेत.
मोर पुत्र हा कहां अभी तक, बिन दुलार मंय तलफत खूब
मोर पास ला गोदी पर रख, भूल के तंय झनकर गुमराह.
यदि तंय धोखा देवत छलकर, मंय जाहंव आरक्षी केन्द्र
तोर विरुद्ध रिपोर्ट लिखाहंव, तोला फंसा मनाहंव हर्ष.”
पंचम कथय – “”जाय कहुंचो तन, हर मनसे हा पूर्ण स्वतंत्र
तंय मोला फांसे बर सोचत, उहू काम ला करके देख.
पर एमां नुकसान तोर खुद, तोर दुलार लहुट नइ आय
अपन गोड़ मं घाव करे बर, अपन हाथ टंगिया झन मार.
दस बजे रात सात तारीख तक, परछो लेव धैर्य मन राख
अतका दिन मं तोर पुत्र हा, तोर गोद मं करही खेल.”
गुनिस मोंगरा – लकर धकर मं, काम बिगड़ के करथय नाश
अतका दिन दुलार बिन जीयत, थोरिक अउ धीरज रख लेंव.
कथय मोंगरा – “”मंय मानत हंव, जउन देत हस नेक सलाह
मगर मोर मन ला मड़ाय बर, प्रश्न के उत्तर कान मं डार-
मोर दुलार कोन स्थिति मं, ओहर अभी कते स्थान
अति रोथय या अड़बड़ किलकत, ओकर स्वास्थ्य गिरे या ठीक?”
पंचम कथय -“”विवश मनखे हा, जानत रथय गुप्त तक बात
पर कहुंचो खोलन नइ पावय, लुका रखत अपने तिर भेद.
यदि मंय तोला पता बतावत, पुत्र डहर जाबे तंय दौड़
उहिच तोर बर घालुक होहय, मोर उदिम तक हा बर्बाद.”
पंचम खुद बढ़ जाथय आगू, अगर रुकत तब बाढ़त फिक्र
प्रश्न चलाहय मोंगरा रहि रहि, फोकट बिसा लिही दुख कष्ट.
पंचम अपन जेब ला जांचत, रखे लुकाय एक ठक चीज
अपन जगह पर हवय सुरक्षित, तंह पंचम होवत आश्वस्त.
मंथिर के प्रयोग कमरा मं पंचम घुसिस धड़ाका ।
उहां उपस्थित मंथिर जेकर मुंह पर फिकर के रेखा ।।
पंचम पूछिस – “”तोर सोध हा, पूर्ण होय या बचे अपूर्ण
अमर प्रसाद के गुण पहिलिच अक, या होगिस सम्पूर्ण समर्थ ?”
मंथिर किहिस – “”बीच मं रुकगे, मंय जब फट पर गेंव बिमार
शोध काम पूरा नइ होइस, गुण ओतकिच अस प्रतिशत साठ.
मगर भरोसा निज बुद्धिच पर, निश्चय पूर्ण बचे जे शोध
अमर प्रसाद के यश सब गाहंय, मोर इहिच अंतिम उद्देश्य . ”
पंचम कथय -“”साठ प्रतिशत हे, अमर प्रसाद दवई के शक्ति
ओतकिच रहन दे ओकर सदगुण, अब झन बढ़ा फेर तंय शोध.”
मंथिर पेल मेड़ ला फोरिस -“”कार रखंव मंय शोध अपूर्ण
बचे काम ला पूरा करिहंव, मोर बुद्धि के जग भर सोर.”
पंचम जानिस – मुड़ ला पेलत, मंथिर धरे हे कड़कड़ जिद्द
ज्ञान बुद्धि के टेस बतावत, सत सलाह तक ला लतियात.
तेकर ले दूसर उपाय कर, मानवता के प्रान बचांवर्
़अमर प्रसाद भसम खुद होवय, खोज करंव मंय ठोंक उपाय.
नष्ट करे के काम मंय करिहंव, मंथिर के बन जाहंव शत्रु
ओहर औषधि फेर बनाहय, जतका अभि तेकर ले दून.
यदि मंथिर खुद के हाथे मं, अमर प्रसाद ला करिहय नष्ट
फिर बनाय के रुचि मिटजाहय, दवई ले घिरना करिहय सोच.
मंथिर हा थोरिक बेरा बर, कमरा तज के बाहिर अ‍ैस
पंचम बचिस एक झन तंहने, काम करत हे मन अनुसार.
रखे खिसा मं तीक्ष्ण जहर ला, सब तन टंहकत हेरिस शीघ्र
अमर प्रसाद रखे जेतिर मं, धुकुर पुकुर गिस ओकर पास.
अमर प्रसाद मं विष ला मेलिस, पूर्व जगह मं आगिस लौट
दैनिक पत्र पढ़त चिभ्भिक कर, शंका के बम झन पर जाय.
मंथिर पुन& लहुट आइस तंह पहिली चलिस ठिठोली।
पंचम अपन बात मं आवत हेरत मन के बोली।।
मंथिर होय प्रभावित मोहित, तइसन ढिलिस ठोस अस गोठ-
“”काम समय मं पूरा होवत, ओहर देवत लाभ इनाम.
लेकिन समय सरक जावत हे, कर्ता हा झेलत नुकसान
बद्दी अपजस मुड़ पर आथय, जमों परिश्रम तक बह जात.
दूध के दूसर नाम हे अमृत, पिये ले बाढ़त ताकत बुद्धि
मगर देर मं फटके बिगड़त, करत बिकार रोग ला लात.
अधिक समय तक मिठई ला राखत, जलिया जाथय करूसवाद
दवई समय ले अधिक रखावत, लाभ के बदला लेवत प्राण.
बांध हा पूर्ण समय निर्धारित, खेत सींच के फसल बढ़ात
पर निर्माण कार्य हा बिलमत, बांध फूट के करत तबाह.
याने मंय कहना चाहत हंव- अमर प्रसाद होय तैयार
बन के रुके रखे दिन्नी अस, कहां होय कई दिन उपयोग!
दवई प्रभाव लाभ गुन देवत, या बांटत अबगुन नुकसान
एकर गुन ला कोन हा जांचिस, ए संबंध मं सब अनजान.”
मंथिर सुनत उग्र हो जाथय -“”तंय हा हरदम के शंकालु
आस मनोवैज्ञानिक तंय हा, सोचत रहत उहिच अनुसार.
अमर प्रसाद मं शंका करथस, पर घटिया हे तोर विचार
मोर दवई के गुण पहिलिच अस, यने बताहय ठीक प्रभाव.
अगर भरोसा नइ मोरे पर, अपन दवई लावत तिर तोर
करत परीक्षण तोरे सम्मुख, ताकि भगय शंका के भूत.”
एक बिलई ला धर के लानिस, कहिथय -“”बिलई डहर तंय देख
एला अमर प्रसाद मंय देवत, पशु पर मंय छलकावत प्रेम.
जहां बिलई हा लिही दवई ला, ओकर तन मं नवस्फूर्ति
जेन दिखत मरियल कोढ़िया अस, नाच देखाहय उठा के गोड़”
मंथिर बिलई ला औषधि देइस, ध्यान लगा के लखत प्रभाव
रखे भरोसा निज बानी पर, जउन किहिस ते निश्चय ठोंक.
लेकिन बिलई लोझम पटिया गिस, छटका दीस दुनों ठक आंख
बपरी के जीवन हा चलदिस, म्यांऊ तक नइ ढिलिस अवाज.
प्रश्न के ज्वाप सही शत प्रतिशत, पर यदि असफल होवत छात्र
तब निराश होवत भावी बर, करत आत्महत्या खुद हाथ.
धान ला हरियर रखे कृषक हा खेत पलोवत पानी।
मगर धान गल के मर जावय कृषक के दरकत छाती।।
मंथिर करे परिश्रम मर मर, जेकर पर हे अति विश्वास
अमर प्रसाद देत धोखा छल, अमृत करिस जहर के काम.
मंथिर के नठ बुद्धि सन्न अस, मुंह मं रुकगे मन के बोल
अमर प्रसाद ला देखत खखुवा, बिलई ला देखत मर के सोग.
सांप ला कुचरत प्रान ला लेथय, पर शंका हा बच रहि जात
तंहा सांप ला आग मं भूंजत, ताकि प्राण खत्तम उड़ जाय.
मंथिर के भरभस टोरे बर, भावी शोध करे बर रद्द
पंचम कथय -“”बिलई मरगे तंह, काबर होत सुकुड़दुम सांय.
काल आय के टेम अनिश्चित, कतको छिन ले सकथय जान
मरगे बिलई मौत स्वाभाविक, अमर प्रसाद के नइये दोष.
अगर दवई पर शंका करथस, ओकर पुन& परीक्षा लेव
दवई प्रभाव गलत या हितकर, अभी मिलत वाजिब परिणाम.”
किंकत्र्तव्य परे मंथिर हा, फिर प्रयोग बर जिव घबरात
आधा बल अउ आधा डर कर, मानत हे पंचम के बात.
मंथिर एक कुकुर ला लानिस, रिंकू नाम जउन पर प्रेम
सहला के चूमा अस लेइस, नाच करैस कांध पर राख.
एकर बाद काम पर आथय, करत दवई के अब उपयोग
देवत दवई कुकुर रिंकू ला, यदपि कंपस हालत हे हाथ.
अमर प्रसाद कुकुर हा पाइस, तुरुत बता दिस दवई प्रभाव
बपुरा रिंकू ढलंग गे पुट ले, रक्षक हरलिस ओकर प्रान.
कूलर फेंकय गरम हवा यदि, तब निश्चित होहय आश्चर्य
फूल गुलाब बास यदि देवत, प्रकृति ले विश्वास समाप्त.
परसा रखे हे स्वादिल जेवन, पर मल असन करत दुर्गंध
भुखहा हा थारी ला धरिहय, ताकत लगा फेंकही दूर.
मंथिर अमर प्रसाद ला पकड़िस, क्षण भर देखिस टक ला बांध
भड़किस क्रोध बुद्धि पगलागे – अमर प्रसाद ला करदिस नष्ट.
कहिथय -“”मंय महिनत जोंगे हंव, तभे दवई होइस तैयार
मगर बोहागे जम्मों महिनत, दवई देखैस विरुद्ध प्रभाव.
दवई बनाय के विधि जे होथय. प्रतिलिपि बना रखे हंव गुप्त
ओला नष्ट करंव मंय हा खुद, शोध के नाम तको बुत जाय.
विधि के प्रतिलिपि ला यदि राखत, अन्य बनाहय अमर प्रसाद
उल्टा गुण फिर दवई बताहिच, जमों दोष के बद मुड़ मोर.”
मंथिर प्रतिलिपि रखे सुरक्षित, घृणा करत बाहिर मं लैस
कई कुटका खुद हाथ मं करदिस, आगी डार बनादिस राख.
दू झन व्यक्ति उहां हें हाजिर मगर बंद हे बोली।
एक दूसरा ला देखत भर वातावरण हे भारी।।
बहुत बेर कर पंचम बोलिस -“”यद्यपि सब महिनत बहगीस
लेकिन तंय हा उचित करे हस, मानव वंश बचा रख लेस.
भावी वंश तोर यश गाहय, उंकर करे वाजिब उपकार
बिन बाधा विकास सब करिहंय, प्रकृति नियम सदा अस ठीक.”
पंचम हा मंथिर ला समझा, करिस नियंत्रित विचलित बुद्धि
एकर बाद उहां ले हटगे, अपन कर्म पर फेंकत तर्क –
अमर प्रसाद नष्ट जे होइस, मोर बुद्धि हा रचे उपाय
मंय उपकार करे हंव जग के, या जग ला अमरिस नुकसान ?
पंचम प्रश्न के उत्तर ढूंढत, पर असफल जावत सब यत्न
अइसन बिकट परिस्थिति आवय, मानव करय एक ठन काम –
कठिन प्रश्न भावी बर राखय, तब तक बदलत समय विचार
भावी करथय उचित समीक्षा, देवत प्रश्न के सही जवाब.
तर्क भंजात चलत पंचम हा, मगर बीच मं परगे आड़
खलकट भाना दुनों अभरगें, उंकर साथ टक्कर अस होत.
आंख लाल कर खलकट भड़किस -“”बने देख के तंय चल राह
तोर आंख हा बटन या आंखी, झपा गेस यद्यपि दिनमान?”
पंचम हा दाबत घुड़की झड़ -“”तुम दू झन तब मारत रौब
मगर मोर उद जरा सकस नइ, जानत नइ का मंय अंव कोन ?”
भाना कथय -“”खूब जानत हंव, तंय प्रधान मंत्री नइ आस
अगर प्रतिष्ठित तब अपने बर, तोर असन देखे हन साठ.”
दर्शक के अब भीड़ हा बाढ़त, कोचक के झगरा ला उम्हियात
लेत मजा मुंह लुका के हांसत, ओ तिर रुके काम तक त्याग.
पंचम मुंह लड़ाय बर छोड़िस, उहां ले हटगे बन गंभीर
खलकट भाना दुनों पहुंचगें, जिनिस बिसाय उभे के पास.
खलकट दीस वस्तु के सूची, उभे करत हे ओकर जांच
कहिथय -“”पूर्व के ऋण हा बांचे, ऊपर ले अउ मंगत उधार.
अगर टांठ भाखा मंय बोलत, तंय हा भगबे दुसर दुकान
लेन देन बढ़िया नइ होवत, कब तक हमर ठीक संबंध?”
खलकट बोलिस- “”चिंता झन कर, वेतन झोंक पटाहंव कर्ज
मंय भाना के साथ कमावत, तोर लइक तहु मिलही नोट.”
खलकट ला समान लेना तब देवत असच भरोसा।
आखिर उभे बात ला पतिया दे दिस जिनिस उधारी।।
उभे जिनिस के कीमत जोड़िस, खलकट ला पढ़के समझैस
बढ़ती भाव ला सुन के खलकट, मुंह ला फारत आंख नटेर.
बोलिस -“”मंय उधार लेवत हंव, तब कीमत ला गजब बढ़ात
श्रमिक के तंय हा पियत पसीना, खुद बर बड़का भवन बनात.”
उभे किहिस -“”कम बुद्धि के तंय हा, तभे मोर पर डारत दोष
प्रतिशत तीस बढ़िस मंहगाई, शासन नीति के मारे आय.
जेन वेग मंहगाई उठगे, वेतन नइ बढ़ पैस समान
तभे उधारी बढ़त दिनों दिन, दिखत भविष्य कुलुप अंधियार.”
उभे किहिस सोला आना सच, मुड़पेलवा बन काटय कोन?
खलकट भाना उहां ले हटगें, जिनिस मिलिस तब खुशी मनात.
दूनों झन जंह मिल मं पहुंचिन, कलुवा झनक मिलिन हें हांस
बी. एस. पी. के श्रमिक ए कलुवा, तउन इहां पर अक्सर आत.
मंहगाई के बात हा निकलिस, तंहने झनक कहत कर रोष-
“”जिनिस के कीमित दिन दिन बाढ़त, वेतन बिलम रुके उहि ठौर.
हम दुकान मं कर्जा लेवत, लेकिन पटा सकन नइ पूर्ण
मर मर कमा देह ला टोरत, पर जीवन हा पात अभाव.
प्रतिशत तीस बढ़िस मंहगाई, वेतन बढ़य उही अनुसार
यदि मंगलिन नट के इन्कारय, होवय तोड़ फोड़ हड़ताल.”
कलुवा श्रमिक के जोश बढ़ावत, बरत आग मं डारत घीव-
“”मांग रखे बर तुम हव खुल्ला, तुम मंगलिन ला कर दव बाध्य.
मंय मजदूर तुम्हू मिहनतकश, हम तुम पाट के भाई आन
यदि करहू हड़ताल आंदोलन, तोलगी पकड़ दुहूं मंय साथ.”
श्रमिक सुनिन जोशीला भाषण, होवत उग्र उमड़गे जोश
आंय बांय चिल्लावत बोमिया, कल टोरे बर करत प्रयास.
मंगलिन के नक्सा ला मारत, कलमा पढ़त डार के दोष
जमों श्रमिक के पांव हा बाढ़त, बाहिर आवत मिल ला छोड़.
फाटक मं अंड़ खड़े हे बुल्खू, श्रमिक ला छेंकत छितरा हाथ
कहिथय -“”बरगलाय ला मानत, प्रथम सोच लव शांत दिमाग.
तोड़ फोड़ हड़ताल करे हव, तेकर भोग डरेव परिणाम
अब यदि रखना चहत मांग-हक, नवा उदिम लानव तुम खोज.”
कलुवा कहिथय-“”क्रांति करे बर, ताकत लगा करत संघर्ष
दुश्मन के रगड़ा टोरे बर, लोहा लेथंय धर हथियार.”
बुल्खू किहिस -“”क्रांतिकारी हस, चहत श्रमिक के तंय हित लाभ
लेकिन साथी जमों ठउर पर, एकेच नीति काम नइ आय.
सुन्तापुर मं पहुंचे हस तंय, उहां बताय जउन तंय नीति
नीति रिहिस उपयुक्त गंवइ बर, होहय सफल उहिच मं क्रांति.
लेकिन उहिच राह ला तंय फिर, इहां के मजदूर ला समझात
श्रमिक के भावी हा रट चौपट, तोर बनाय नीति नइ पास.
गांव के बड़हर धनसहाय हा मरत पधोरिस तोला ।
पर मंगलिन नइ मारय ओहर करिहय लड़ई दिमागी ।।
बी. एस. पी. मं तंय कमात हस, हम मानत हन तुम्हर सलाह
मगर हमर ला तुम दुतकारत, कहां करत तोड़ फोड़ हड़ताल!”
कलुवा कथय- “”तुम्हर हित चाहत, तब देवत हंव नेक सलाह
मोर बात ला फूंक उड़ावत, अउ बोले बर मंय असमर्थ.
मंय हा अभिच भिलाई जावत, उहां ले कारखाना तक दौड़
ठीक समय पर काम ला धरिहंव, तभे जीविका पर नइ आंच.”
कलुवा ओतिर ले हट चलदिस, तंहने खलकट हेरिस बोल –
“”कलुवा पहिली जोश देखाइस, क्रांति करे बर दीस सलाह.
लेकिन ऐन वक्त पर खसकिस, आधा बीच छोड़दिस साथ
यदि अइसन के बुध ला मानत, डोंगा कभू लगय नइ पार”
जम्मों श्रमिक संगठित होवत, आगू बढ़े के खोजत राह
बुल्खू बोलिस -“”टोरइ फोरइ तज, चलव चलन मंगलिन के पास.
अपन मांग ला पूर्ण होय कहि, हम्मन करबो अब संघर्ष
पर संघर्ष के अर्थ ला समझन-हिंसा बकई लूट नइ होय.
बातचीत प्रार्थना अहिंसा, मीठ वाक्य घुड़की भय प्रेम
यदि इंकरे ले लक्ष्य हा पूरा, तब संघर्ष सफल हे जान.”
तभे उदुप मंगलिन हा धमकिस, बोलिस टांठ चढ़ा के भौंह-
“”मोर विरुद्ध बोल हेरत हव, लड़ई उठावत करके जोम.
मिल ला कंस घाटा होवय कहि, तोड़ फोड़ बर बांधत फेट
सोचत मोर सिरी गिर जाए, तुमला मिलिहय काय इनाम !”
बुल्खू देखिस झनक डहर तंह, राखिस जनक जउन हे मांग –
“”तंय हा कहां हानि झेले हस, उल्टा हम पावत तकलीफ.
प्रतिशत तीस बढ़िस मंहगाई, पर वेतन हा पूर्व समान
रुपिया कहां पुरत महिना भर, आखिर मरे परत हे भूख.
जतका बढ़े जिनिस के कीमत, वेतन बढ़य उहिच अनुसार
हमला मिलय पेट भर जेवन, काम करे बर हम तैयार.”
मंगलिन कथय -“”शत्रुता ला तज, तुम्हर समस्या ला सुन लेंव
पर मंय विवश सबो तन ले हंव, मांग सुने बर मुश्किल होत,
देश मं कई ठक कपड़ा के मिल, उंकर वस्त्र स्तर हा ऊंच
स्तर बर मंय लोहा लेवत, एमां खर्च खूब जम होत.
ओमन माल के झप बिक्री बर, कम कर देत जिनिस के दाम
माल जमा झन होवय कहि मंय, कीमत कम कर घाटा खात.
शासन नीति गलत रेंगत हे- छापा परत मिल मं कई बार
आर्थिक स्थित तरी गिरत हे, कहां पुरो सकिहंव मंय मांग?”
मंगलिन जमों मांग ला ठुकरा हटगे तुरतेताही ।
अब मजदूर सफलता पाये खोजत नवा तरीका ।।
भाना बोलिस -“”मंगलिन हा अभि, बिसा सकत मिल नवा तड़ाक
नवा भवन तक बनवा सकथय, जे चाहत कर लेहय प्राप्त.
पर हम मांगत अन्न पेट भर, वाजिब हक ला मारत लात
हमर भविष्य नष्ट झन होवय, शांत बुद्धि ले हेरव राह.”
जउन श्रमिक हड़ताल करे बर, बाहिर निकल भगंय मिल छोड़
ओमन चिभिक उपस्थित मिल मं, यथा लटकना चिपकत वस्त्र.
घण्टा आठ काम ला करथंय, आलारसी टेम भर काट
दस घण्टा अब काम बजावत, रहि के चुस्त देह रख टंच.
बुल्खू हा मंगलिन तिर बोलिस -“”पूर्व ले उत्पादन बढ़ गीस
एकर ले अब लाभ अधिक हे, श्रमिक के वेतन तक बढ़ जाय.”
मंगलिन हा नाही करदिस फट- “”तुमन करत हव अनुचित मांग
तुम अव श्रमिक तभे श्रम जोंगत, कहां करत अचरज के काम!”
बुल्खू किहिस -“”एल झन हमला, यदि नइ सुनस हमर तंय मांग
हम कानून के शरण जावत, जतिक दोष परही मुड़ तोर.
कहिबो-हमला मंगलिन जबरन, मिल मं छेंक रखे हे धांध
समय ले अति बूता ला लेवत, हमर शक्ति के शोषण होत,”
“”घुड़की मार दबावत हस तंय, पर मंय थोरको नइ डर्रांव
तंय कानून शरण मं अभि जा, निपटे बर ताकत तिर मोर.”
श्रमिक के मांग पूर्ण नइ होइस, ओमन धरत कठिन अस राह
भूख मरत पर भोजन छोड़िन, मरत पियास पियत नइ नीर.
जेन टिफिन मं जेवन लाथंय, ओहर रखे पूर्व अस हाल
छागल के जल रखे उहिच मं, होवत नइ ओकर उपयोग.
श्रमिक करत श्रम ला ताकत भर, थक के दंदरे पश्त शरीर
चलत पसीना हा चुहरी बन, मुंह के रंग हा करिया लौह.
गीस झनक हा मंगलिन तिर मं, मुंह कर बंद खड़े चुपचाप
मंगलिन किहिस -“”आय तंय काबर, काय विचार साफ मन खोल.
यदि गुस्सा के धमकी देबे, ओकर आगू झुक नइ पांव
अगर प्रार्थना करबे झुक के, मंय ठुकरा देहंव झड़ लात.”
झनक के आदत उग्र लड़का, तोड़ फोड़ बर हरदम ठाड़
तेकर रुप बदल के दूसर, तेवर शांत बात गंभीर.
झनक किहिस -“”नइ करंव प्रार्थना, का करिहंव मंय धमकी मार
मिल मं काय घटत अभि घटना, राखत गुप्त उहू सब भेद.
तोला गरज बात जाने बर, तंय मिल पहुंच अभिच तत्काल
उहां के स्थिति तुम खुद देखव, अउ भविष्य बर निर्णय लेव.”
झनक उपरहा बात ला छेंकिस, फट ले पलट लहुट गिस जल्द
जमों रहस्य लुका के रख लिस, तब मंगलिन ला धुक धुक होत.
मन मं शंका घिरत बहुत ठक, मन मं करत स्वयं समाधान
लेकिन घुप अंधियार जिंहा हे, कहां निशान परत हे बाण !
मंगलिन हा सवाद नइ जानत यदपि खतम सब खाना।
फिकर मिटे बर सोय धरत पर टकटक देखत आंखी।।
जब बेचैन हो जाथय नंगत, मिल तन चलिस कार मं बैठ
अगर हवाई जहाज मिलतिस, तुरुत जाय करतिस उपयोग.
मिल मं पहुंच परिस्थिति जांचत, ओला होवत अचरज दंग
एकर पूर्व काम जे होवय, ओकर ले उल्टा हर दृष्य.
मंगलिन सब मजदूर ला बोलिस -“”पेट भरे बर जेवन लेव
थके हवव तब काम करव झन, लरघावत तब लेवव नींद.”
लेकिन श्रमिक कान नइ देवत, अपन काम ला बिधुन कमात
जेवन डहर झांक नइ देखत, जल ला ओंठ ले राखत दूर.
मिल मं एक निजी कमरा हे, मंगलिन उंहे बइठगिस एक
आय समस्या के हल खोजत, करत समीक्षा उत्तर बाद.
सोचत -“”अगर मांग ठुकरावत, श्रमिक भूख मर करिहंय काम
इनकर मृत्यु दिखत हे निश्चित, मिल मं लगिहय शव के ढेर.
हत्या के प्रकरण बन जाहय, निश्चय सिद्ध जमों अपराध
कारागृह मं दण्ड भोगिहंव, मिल जब बंद कहां ले लाभ!
अगर श्रमिक के व्यथा सुनत हंव – करिहंय काम राख ईमान
लाभ अमर मंय उन्नति करिहंव, कमी होय नइ इज्जत मान”
मंगलिन तुरुत घोषणा कर दिस -“”करिहंव पूर्ण श्रमिक के मांग
जउन बात हे खोल के बोलव, मंय हा सुनिहंव हृदय ला खोल.”
मंगलिन श्रमिक एक संग बइठिन, एक जगह पर सुम्मत बांध
हेरत राह भविष्य खुशी बर, फेर होय झन झंझटरार.
बुल्खू कथय-“”समिति बन जावय, मालिक श्रमिक के प्रतिनिधि होय
जे उत्पादन मूल्य बढ़ब पर, नजर ला राखय चील समान.
जे प्रतिशत बाढ़य मंहगाई, वेतन वृद्धि होय उहि मान
मिल ला लाभ होय जतका अस, मिलय श्रमिक ला ओकर भाग.
यदि मिल हा कभु घाटा खावय, श्रमिक के वेतन तक कट जाय
यने श्रमिक मालिक के अंतर, बिगर युद्ध हो जाय समाप्त.”
जे उपाय बुल्खू हा फोरिस, सब ला जंचिस करिन स्वीकार
अगर अस्त्र बिन शांति मिलत हे, कोन व्यर्थ धुंकिहय बन्दूक !
जमों श्रमिक मन हर्ष मनावत, ओमन पहिरिन विजय के हार
मंगलिन मन ले खुशी मनावत- ओकर आज होय नइ हार.
मीठ होय संबंध सोच के मंगलिन लैस मिठाई।
बांट श्रमिक ला खुद तक खावत एमां दिखत भलाई ।।
झनक प्रसन्न निकलथय मिल ले, बचे मिठई ला धर के हाथ
थोरिक बाद झिंगुट संग मिलथय, मिठई ला राखिस ओकर हाथ.
झनक किहिस -“”तंय मोला जानत, तन मं जोश नीति हा उग्र
लेकिन सुलह शांति के संगत, कठिन परीक्षा पास हो गेंव.
यने पूर्व के आदत ला तज, विजय पाय हंव धर नव राह
मोर खुशी मं हाथ बंटा तंय, झड़क मिठई ला मुंह कर मीठ.”
झिंगुट मिठई ला खिसा मं राखिस, हेरिस बाद अपन सब फिक्र-
“”तंय उद्देश्य सफल होए हस, हृदय ले मंय हा होवत हर्ष.
लेकिन मंय मांईअसाद अंव, करत अपन पर नइ विश्वास
तउन अपन जीवन बदले हंव, कर्मनिष्ठ बन जीयत आज.
आज परीक्षा मं बइठत हंव, धुक धुक होवत हे जिव मोर
प्रश्न के उत्तर ला नइ पावत- मंय उत्तीर्ण या असफल आज.
याने अपन नीति बदले हस, विजय अमर के पावत मान
अपन नीति ला मंय बदले हंव, सफल के असफल कोन बताय?”
झनक कोचक के भेद ला पूछिस, लेकिन झिंगुट लुका रख लीस
जिंहा चित्र स्पर्धा होवत, पहुंचिस झिंगुट उही स्थान.
इमला अउ कई चित्रकार के, उत्तम चित्र टंगे दीवार
झिंगुट अपन उत्कृष्ट चित्र ला, स्पर्धा मं कर दिस ठाड़.
अगराहिज तक चित्रकार ए, झिंगुट के श्रम ला मारत टोंक-
“”जे पतरी मं भात ला खावत, करत उहिच पतरी मं छेद.
इमला तोला ज्ञान कला दिस, मदद दीस तंय अमरा ख्याति
तंय ओकर उपकार मान अउ, पाछू चल पाटे बर कर्ज.
पर इमला के नाक काटे बर, खुद के पत ला ऊंच उठाय
तंय इमला संग टक्कर लेवत, कोन तोर ले हे बइमान !”
अगराहिज ला झिंगुट हा बोलिस-“”इमला मोर मं कुछ नइ भेद
हमर बीच शत्रुता करे बर, काबर भिड़े हवस प्रण ठान !
कला क्षेत्र हा कर्म ला मांगत, कर्मनिष्ठ हा पाय इनाम
जेन आलसी करतब तजथय, ओला ठेंगवा भर मिल पात.”
इमला, झिंगुट ला टोंकिस -“”तंय कहिथस जस झड़त तमाचा।
मंय समझावत साफ चित्र अस ढिल मंदरस अस भाषा ।।
एक चित्र मं कई रंग रहिथय, सबके अलग महत्व प्रभाव
उंकर बीच मं टक्कर चलथय, मगर मित्र अस रहिथय एक.
चित्र कि पेड़ के पान हा हरियर, हरियर रंग अगर उड़ जात
एक रंग के कमी के कारन, बचत रंग के उड़थय रंग.
याने चित्रकार हन कई झन, अलग अलग हे सबके चित्र
लेकिन सबके हवय जरुरत, सबके एक महत्व प्रभाव.”
कला समीक्षक सूक्ष्म दृष्टि कर, जमों चित्र पर फेंकत दृष्टि
त्रुटि या कमी निकल नइ पावत, उच्च किस्म के उंकर श्रृंगार.
कठिन बाद परिणाम मं पहुंचिन, बन निष्पक्ष घोषणा देत-
“”इमला प्रथम पारितोषक लिस, पैस झिंगुट हा दुसर इनाम.
अगराहिज हा घलो पुरस्कृत, पैस सांत्वना के सम्मान
उहां होय नइ पक्ष धांधली, फल ला पैन बुद्धि अनुसार.
अगराहिज हा झिंगुट ला बोलिस -“”अगर बढ़ाते उदिम दिमाग
प्रथम इनाम तोर हक आतिस, तोर कला सब झन ले श्रेष्ठ.”
बोलिस झिंगुट -“”सदा मंय हारत, पर बाजी जीते हंव आज
हे संतोष अपन महिनत पर, अब कुछ पाय बचे नइ आस.
पर भविष्य मं प्रथम बने बर, करिहंव यत्न राख ईमान
अपन शक्ति पर रखत भरोसा- अमर लुहूं मंय श्रेष्ठइनाम.”
झिंगुट प्रसन्न उहां ले चलथय, ओकर हाथ प्रशंसा पत्र
धरे नोट के चेक हाथ मं, मन डोंहड़ू छितरा गिस फूल.
जावत कहां याद नइ ओला, तभे उहिच कौंवा फिर अ‍ैस
झिंगुट के चेक ला झटक उड़ा गिस, दुरिहा मं रहि टुहू देखात.
कौंवा किहिस -“”निराश के बेरा, मंय हा तोला साहस देव
प्रश्न सिन्धु मं प्रान हा बूड़त, उत्तर बता करे हंव पार.
मगर सफलता तंय पाये तंह, मोला निहू समझ बिसरेस
तब बदला के आगी मं बर, तोर चेक ला मंय झटकेंव.”
झिगुट कथय -“”मंय कृतघ्न नोहंव, तोर कर्ज हा मुड़ भर मोर
मंय बियाज मं मिठई ला देवत, करत मूलधन मं गुनगान.”
झिंगुट खिसा के मिठई ला हेरिस, कौंवा ला दिस ऊपर फेंक
कौंवा मिठई अमर खुश होवत, वापिस करिस झिंगुट के चेक.
कौंवा आधा मिठई ला झड़किस, बचत चोंच धर उड़त अकास
उही मिठई पंचम पर गिरगे, जेन राह रेंगत धुन बांध.
पंचम के मन पुलकित होथय- मिठई मिलिस तब दिखत सुगून
मोर योजना सफल हो जाहय, मिठई असन फल तक हा मीठ.
पर कौंवा के याद ला करथय, सोचत एहर अशुभ प्रधान
काटिस आड़ बीच रद्दा मं, आहय बिघन काम के बीच.
लेकिन अर्थहीन एमन सब, ए सिद्धान्त जियत बिन मूल
गदहा जउन डहर ढलगत हे, बात चलत स्थिति अनुसार.
मंय हा अगर सफलता पाहंव, करिहंव मिठई के गुन ला याद
लेकिन अपन ध्येय मं असफल, कौंवा पर जाहय सब दोषय.’
अपन निवास निंगिस पंचम तब मोंगरा पूर्व पधारे ।
आखिर रात दस बजे आइस जेकर होत प्रतीक्षा ।।
एतन ओतन जकजिक देखत, जैलू घर के अंदर अ‍ैस
लाने हे दुलार ला संग मं, ओकर पर बरसावत प्रेम.
पंचम हा दुलार ला झटकिस, दीस मोंगरा के अधिकार
कथय मोंगरा ला घुड़की कर -“”तंय रहि चुप अउ पा संतोष.
अपन पुत्र बर रोवत हर छन, तेहर मिलगे आप सरुप
जैलू के अहसान मान मंय, जेहर रखिस सुरक्षित पूर्ण.
तोर साथ मं घटिस जे घटना, भूल सदा बर ओकर याद
यदि बिखेद ला कहुंचो फोरत, बिपत निमंत्रित अपने हाथ.
मोर इहां ले निकल भगा तंय, कहां बलाय हाथ ला जोड़ !
तंय दुलार ला घलो साथ धर, मोर पास ले मुंह ला टार.”
पंचम हा मोंगरा ला खेदत, एकर कारन दगदग साफ-
यदि बिलमत तब झगरा बढ़िहय, जैलू हा कर सकिहय क्रोध.
जैलू हा दुलार ला पोंसे, ओकर बाढ़ सकत हे प्यार
बालक पुन& पाय लालच मं, कर तो सकत मार अपराध.
चलिस मोंगरा दुलार संग मं, होगिस तुरुत आंख ले दूर
गप्पी कवि फट ले लिख देतिस – उहां ले उड़ होगे अदृष्य.
जैलू हा बालक बिन तलफत, हे आवश्यक याद हट जाय
ओकर बुद्धि राह धर ले कहि, पंचम हा भिड़ करत प्रयास.
जैलू ला बइठार पलंग पर, पंचम हेरत टांठ जबान-
“”मोला मुरुख जान के तंय हा, कहि असत्य तंय धोखा देस.
कभू परुष हा अमल मं रहिथय, जउन करे हस गलत प्रचार!
पर के शिशु ला चोरा रखे हस, यने करे हस तंय अपराध.
मंय आरक्षी केन्द्र मं जावत, एकर इतला देवत दौड़
तंय पर ला तड़फाये जतका, ओकर बल्दा मिलिहय दण्ड.”
पंचम धमकी दिस तंह जैलू कांपत हे जस पाना ।
जैलू सार आय कहि पंचम हेरत मिट्ठी बोली ।।
“”लेकिन तंय हा फिकर मं मत मर, तंय गोहराय मुंहिच ला पूर्व
यदि दुख आंच तोर पर आहय, मंय हा करिहंव दुख ला दूर.
शिशु ला मोंगरा ला संउपे हस, तोर हाथ ले उत्तम काम
तोर पास यदि बालक रहितिस, ओकर फिकर मं नींद हराम.”
जैलू के तनाव हा घटगे, बुद्धि शरीर लगत हे ढील
मर आलस्य पलंग पर ढलगत, पुट ले अ‍ैस आंख भर नींद.
मृतक शरीर रहत लकड़ी अस, जग ले छूट जात संबंध
जैलू घलो सुतत बेसुध बन, जग मं रहिके जग ले दूर.
दूसर दिवस बेर सुत उठथय, ठीक टेम पर धरलिस काम
ओकर बाद उठिस जैलू हा, तंहने फेर नींद अउ लेत.
एकर बाद नींद हा उमचिस, फुरसुद सुघर लगत हे देह
मुड़ के बड़े बोझ जब उतरत, मानव ला हल्का लग जात.
जैलू हा पंचम ला पूछिस -“”मोर पास मं रिहिस दुलार
कभू निफिक्र खाय नइ जेवन, नींद भगय आंखी ले दूर.
मंय जानत हंव उचित या अनुचित, जान करे हंव सब अपराध
बालक प्रति काबर आकर्षित, एकर उत्तर मिल नइ पात?”
पंचम किहिस- “”दुलार रिहिस हे, तोर पास मं अमरा स्नेह
ओकर चिंता रखस रात दिन, तब फिर कहां ले आवय नींद !
जउन जिनिस के कमती होथय, मानव चहत उही ला पाय
तंय बालक पर होय आकर्षित, प्रकृति के अनुपम उपहार.
कभू कभू मानव कर डरथय, काम बिचित्र हंसय सब लोग
ओकर सच विश्लेषण मुश्किल, होथय ठीक बात हो बंद.”
जैलू हा पंचम ला छोड़िस, बाहिर आके चलत अजाद
ओकर बुद्धि स्वस्थ पहिलिच अस, जांचत हवय शहर के हाल-
नांदगांव हा दिन दिन बाढ़त, कोचकिच भीड़ हवय हर ठौर
इहां बसे बर जगह के कमती, पर ग्रामीण आत तज गांव.
कोन करय मानव के गिनती, आत कहां ले कतिंहा जात !
सरमेट्टा संट घंसर के रंगत, कोलकी गली सन्द नइ पात.
कलबिल चिहुर चलत चंवतरफा, झगरा मारपीट कुछ ओर
हद ले बाहिर बढ़त प्रदूषण, कहत गंदगी शासन मोर.
बस फटफटी कार स्कूटर ट्रैक्टर टेम्पो टैक्सी ।
इंकर तरी यदि मनसे आवत प्रान जात बरपेली ।।
ज्ञानिक आंख मं पट्टी बांधिस, करिया हे पट्टी के रंग
बटबट आंख खोल के देखत, पर कुछ जिनिस दिखन नइ पात.
ज्ञानिक हा फटफटी पर बइठिस, ओला करिस तुरुत स्टार्ट
गाड़ी धड़धड़ आगू सरकत, अपन राह पर जावत सोज.
मनसे मन अचरज भर देखत, एकर साथ करत तारीफ
कतको तर्क चलत एकर बर, जतका मुंह ओतका अस बात.
एक कथय -“”दगाबाज हे ज्ञानिक, ओला दिखत राह झक साफ
तब गाड़ी ला बने चलावत, हर दुर्घटना ले बच जात.”
दुसर कथय -“”ज्ञानिक हा तांत्रिक, तंत्र मंत्र के रखथय ज्ञान
तब बिन देखे गाड़ी लेगत, वरना स्वयं गंवातिस जान.”
ज्ञानिक जिला कार्यालय ले चल, पहुंचिस रायपुर नाका ठौर
गंजमिंज भीड़ बीच रस्ता भर, पर ककरो संग नइ मुठभेड़.
ज्ञानिक पूर्ण सफलता पाइस, तभे एक झन दीस सलाह-
“”तंय साहस के काम करे हस, लिखा गिनिज बुक मं झप नाम.”
ज्ञानिक बोलिस -“”करत नौकरी, वेतन झोंकत हंव हर माह
जिनिस बिसा सक भर जेवत हंव, यने अभाव मोर ले दूर.
जउन योग्यता गुण मोरे तिर, करत प्रदर्शन सबके पास
नाम कमाय जरुरत नइये, दउड़ करंव नइ पाय इनाम.”
उही जगह मं पिनकू ठाढ़े, तेन लेत ज्ञानिक के पक्ष-
“”चलत गिनिज बुक हा एकतरफा, सबो डहर फेरत नइ आंख.
चरत कृषक के गोड़ ला केंदुवा, तब ले ओहर नींदत खेत
माह जेठ मं घाम लकालक, करत परेवा डोंगरी पार.
यदि बइला पुट ले मर जावत, कृषक करत बदला मं काम
पयडगरी मं वाहन लेगत, तब ले नाम दर्ज नइ होय.
यने जउन सार्थक आवश्यक, ओतन गिनिज बुक के नइ आंख
रखत गिनिज बुक पर के विवरण, पर नइ कहय अपन उद्देश्य.”
ज्ञानिक हाथ मिला के चलदिस, पिनकू धरत स्वयं के काम
ओहर मेटाडोर मं बइठिस, भरर भरर करथय स्टार्ट.
पिनकू भीड़ बीच मं जावत, मुश्किल मं लेगत हे काट
दुर्घटना झन घट जावय कहि, आगू जावत लगा उवाट.
आखिर मं पचकौड़ पास गिस, हिले लगा दिस ओकर चीज
पर व्यापारी बहुत काइंया, पिनकू ला कम रुपिया देत.
देश बिगाड़क व्यापारी हा, बाहिर रखत नून गुड़ तेल
पर अंदर गोदाम मं रखथय, नशा करे के जिनिस सकेल.
पिनकू ठीक भाव नइ पाइस, तब फिर काबर झोंकय नोट!
समझाइस पचकौड़ ला अड़बड़, लेकिन नइ मानिस पचकौड़.
दूनों बीच के झगरा बढ़गे, पर मन मजा लेत हें हांस
अब पचकौड़ दोष ला डारत -“”पिनकू करत हवय फरफंद.
आधच जिनिस मोर तिर लानिस, आधा अपन पास रखलीस
थाना मं रिपोर्ट मंय करिहंव, सच उछराहय थानेदार.”
पिनकू हा काबर घबराये- “”तंय हा जिहां चहत चल लेग
मोर कुजानिक एकोकन नइ, थाना जाहंव बिन मिनमेख.
दूनों झन थाना मं पहुंचिन, पर पिनकू हा रहिगे दंग-
उंहचे मींधू हा मिल जाथय, जेहर ए नव थानेदार.
मींधू ला पचकौड़ हा बोलिस -“”साहब, सुन लव मोर गोहार
पिनकू आधा चीज चोरा लिस, अउ उपरहा करत तकरार.
मेटाडोर हवय एकर तिर, ओला कहां ले धर के लैस
खुद बिसाय या चोरा के लाने, सत्य बात के पता लगाव!
मेटाडोर चलावत भर भर, लेकिन नइ ड्राइविंग लाइसेंस
शासन ला धोखा देवत हे, कभू सड़क कल ला नइ देत.”
कई आरोप मढ़िस व्यापारी, तब पिनकू हा करिस उपाय
कागजात ला हेर के रखदिस, ताकि दोष के मिटय प्रमाण.
कहिथय -“”शासन तिर मांगे हंव, मेटाडोर लुहूं कहि कर्ज
उही चलाके जिनगी पालत, जूरुम काम ले रहथंव दूर.
ककरो साथ कार मंय उलझंव, बस पचकौड़ करय ए काम-
महिनत के रुपिया ला देवय, रखय मितानी अस संबंध.”
थाना मं जे वादी आथय, ओहर बोलत ढाढ़ा कूट
प्रतिवादी के विरुद्ध मढ़थय, एक सेक बढ़ झूठारोप.
मींधू जमों भेद ला जानिस, तंह पचकौड़ ला बोलिस डांट-
“”तंय असत्य प्राथमिकी लिखावत, जेहर घलो आय अपराध.
तोर बात ला जान डरे हंव – तंय हस गरकट्टा इन्सान
पिनकू के रुपिया ला झप गिन, ओकर अपन साथ कर न्याय.
तंय हा करथस स्वयं कुजानिक, उल्टा लिखवा देत रिपोर्ट
मोर बात ला सुन अक्षरश&, वरना तंय खाबे नुकसान.”
मींधू ठौंका राह बता दिस, तंह पचकौड़ छोड़दिस टेक
रुपिया ला तुरते गिन देथय, पिनकू हा करलिस स्वीकार.
तीर असन पचकौड़ भगागे, उंहे रुके हे पिनकू।
मींधू साथ पूर्व के परिचित काबर होवय टरकू।।
मींधू हा पिनकू ल कहिथय- “”मंय हा जेन नौकरी पाय
घूंस पटाए हंव एकर बर, तोर पास खोलत सच भेद-
किरपा करे मोर ऊपर तंय, तभे बने हंव थानेदार
मंय चिंता मं घुरत हमेशा- तोर कर्ज ले कब आजाद!”
पिनकू कथय- “”छोड़ चिंता ला, बइसाखू के बात रख याद
ओकर कहना ला यदि मानत, उतर जहय कर्जा के बोझ.
याने जे वास्तव मं मुजरिम, ओला निश्चय दण्ड देवाव
जे निर्दाेष हीन अउ निर्बल, ओकर पक्ष लेव दुख झेल.”
मींधू अपन हृदय मं घोखिस -“”बोलत तेन आय बस वाक्य
लेकिन कर्म क्षेत्र हा दूसर, दुर्गम हे सैद्धान्तिक राह.
कोन आय वाजिब अपराधी, कोन हा एकर खोलय भेद
यदि खुल जात तभो हे मुश्किल, कड़ा दण्ड ओला दे कोन ?”
मींधू हा पिनकू ला बोलिस -“”तंय सुझात ते उत्तम राह
जेमां समाज के हित दिखिहय, हठ करके करहूं ओ काम.”
मींधू दूसर बात निकालिस -“”तंय हा शासकीय पद खोज
ओमां जीवन हा तर जाहय, मरते दम तक मिलिहय नोट.”
पिनकू कथय -“”पाय हस तंय पद, बोलत हस विभाग अनुसार
पूंजीवाद हा जलगस जीवित, खतम होय नइ दुख के भार.
नवजवान मन भिखमंगा बन, रोजगार कार्यालय जात
पर ओमन नइ पात जीविका, सत मं सती जीविका पात.
पूंजीवाद मं अबगुन होथय, सब नइ पांय अपन अधिकार
कुछ के आवश्यकता छकबक, बचत मांग हा खुंटीउजार.”
पिनकू हा थाना ला छोड़िस, काबर करय समय ला ख्वार
ओतन बइसाखू पर आगे, बिना बलाय बड़े तकलीफ.
ओकर पुत्र नाम हे छबलू, तेकर होय अपहरण आज
बइसाखू के बुद्धि नठे अस- कते डहर ले गिरगे गाज!
पिनकू उहें पहुंच के बोलिस -“”हल्लू नाम आतंकी एक
ओहर कई निरीह ला मारिस, करिस जघन्य अपराध अनेक.
आखिर एक दिवस पकड़ागे, तंहने ओहर ओइलिस जेल
लेकिन ओकर मित्र समारु, शासन संग मं खेलिस खेल.
मुख्यमंत्री के पुत्र बीरबल, ओला जानत तुमन घलोक
ओला उठा समारूलेगे, यने अपहरण कर दिस जोख.
रखिस समारूशर्त कड़ाकड़ – यदि बीरबल ला करथव प्यार
हल्लू ला आजाद करव झप, मोर बात कल लव स्वीकार.
अगर मोर कहना नइ मानत, तब बीरबल के लेहंव प्राण
मोर शर्त के उत्तर झप दव, बीरबल के जीवन ला देख.”
खभर मुख्यमंत्री हा पाइस, हल्लू ला फट छोड़वा दीस
पुत्र बीरबल वापिस होथय, मुख्यमंत्री हर्षित हो गीस.”
एकर बाद किहिस अउ पिनकू -“”पाइस मुक्ति बीरबल जेन
ओहर वाकई उचित लगत हे, झन अपहरित होय निर्दाेष.
आतंकी ला शासन छोड़िस, एकर ले अड़बड़ नुकसान-
अउ आतंक क्रूरता बढ़ही, मारे जहय जे गउ इन्सान.”
पिनकू पूछिस व्याख्याता ला -“”ए बारे मं तंय कुछ बोल
अगर तोर पर अइसन घटना, तब तंय करबे काय प्रबंध?”
बइसाखू मुड़ धर के बोलिस -“”करंव कहां ले पर के न्याय
मोर पुत्र खुद अपहृत होगे, बिना बलाय आय हे कष्ट.
करत भयादोहन चइती हा, मोर पास भेजे हे पत्र –
छबलू ला हम रखे सुरक्षित, ओला झन ढूंढव अन्यत्र.
रेल के दुर्घटना जब होइस, करिन हठील अंजोरी लूट
ओमन ला कानून फंसावत, प्राण बचाय भगत कई खूंट.
जे गल्ती हठील मन जोंगिन, ओला अपन मुड़ी पर लेव
स्वीकृत पत्र देव दसकत कर, बदला मं छबलू ला लेव.
गांव मोहारा ले कुछ दुरिहा, बोहत हवय नदी शिवनाथ
उही किनारा आम बगीचा, उंहचे तुम हा दउड़त आव.
उही जगह मं मिलव मोर संग, स्वीकृति पत्र हाथ रख देव
यदि रहस्य जाहय दूसर तिर, छबलू ला जीयत नइ पाव.”
पिनकू ला बइसाखू कहिथय -“”छबलू ला झन खावय काल
सांप मरय लउठी झन टूटय, राह सुरक्षित तिंहिच निकाल.”
पिनकू किहिस -“”अभी मंय जावत, मींधू तिर मं देत अवाज
या मंय स्वयं तोर संग जाहंव, जइसन कहव करंव मंय काम.”
“”भइगे तुम जम्मों झन ठहरव, मंय नइ लेंव कष्ट ला मोल
अपन कष्ट मंय स्वयं भोगिहंव, देखंव भला अपन ला तौल.”
चइती हा बताय हे जे ठंव पहुंच गीस बइसाखू ।
आमा के खाल्हे ठाढ़े हे दुख मं रोवत आत्मा ।।
चइती ओकर तिर मं पहुंचिस, स्वीकृति पत्र मंगिस तत्काल
पर बइसाखू हा इनकारत, पास आत नइ ओकर लाल.
“”तोर सुभाव नेक मंय जानत, लेकिन करत क्रूर अस काम
छबलू हा धंधाय हे कतिहां, ओला तुरुत मोर तिर लान.”
बइसाखू के बात ला सुनके, चइती किहिस चाब के ओंठ-
“”मोर साथ ओरझटी करव झन, वरना मिलिहिय दुष्परिणाम.
अस्त्र पकड़ किंजरत सण्डा मन, देख लेव तुम छटका आंख
यदि आदेश उदेली होवत, जीवन तोर भसम जस राख.
स्वीकृति पत्र मोर हक रखके, वापिस जाव अपन अस्थान
छबलू हा तुमला मिल जाहय, मंय बोलत हंव सत्य जबान.”
स्वीकृति पत्र फेंक बइसाखू, वापिस चलत स्वयं के राह
ठंउका मं छबलू मिल जाथय, जेकर देह भरे दुख दाह.
अपन पुत्र ला पिता उबारिस, बइसाखू हा देवत स्नेह
अपन निवास लहुटगे हर्षित, पाय करुणरस खुद के गेह.
सुख अउ दुख जीवन के चक्का, विचलित होना मुरुख के काम
मींधू थानेदार हा आथय, अपन गुरु बइसाखू पास.
मींधू किंहिस देखा के बेली -“”तंय हा करे हवस अपराध
रेल के दुर्घटना जब होइस, तब तंय करे भयंकर लूट.
सब आरोप तोर मुड़ आवत, तंय खुद करे हवस स्वीकार
गिरफ्तार कर अभिच लेगिहंव, तुम होवत कानून अधिकार.”
बइसाखू कुछ मुसका बोलिस -“”मंय हा जानत सब कानून
ककरो जीवन कहां बनाथय, ऊपर ले बांटत दुख फून.
जतका बखत इहां पहुंचे तंय, जान गेंव मंय अंतस ताड़
तंय निश्चय कर्तव्य निभा ले, मंय नइ परंव बीच मं आड़.
संसो के आगी मं झन बर, एमां बढ़त मोर अउ मान-
मोर छात्र करतब पालक हे, पूर्ण करत शासन के काम.
मींधू हा मन मं सकुचावत, करिस शुरु करतब के काम-
पहिरा दीस हथकड़ी ला झप, अपन गुरूबइसाखू हाथ.
एकर बाद लहुटगे थाना, हवालात बइसाखू गीस
करिस कुजानिक एकोकन नइ, पर होवत दुख के बरसात.
पिनकू लेना चहत जमानत, ओकर बर खोजत हे व्यक्ति
सुख के बखत सबो झन मितवा, बेरा बखत छोड़ दिन साथ.
उदुप दुधे ओला मिल जाथय, तंह पिनकू हा फोरिस साफ-
“”एक व्यक्ति हा फंसे कड़ाकड़, यद्यपि ओहर हे निर्दाेष.
ओकर लेना हवय जमानत, पर तैयार होत नइ एक
ओकर मदद अगर तंय करबे, तब थाना चल हालत देख.”
पिनकू दुधे पहुंचगे थाना उहां हवय बइसाखू ।
जहां दुधे हा गुरूला देखिस – होवत अचरज भारी ।।
बोलिस दुधे -“”माननीय अस तंय, तंय बनाय हस जीवन मोर
तोर कृपा ले मंय सुख पावत, मुश्किल होत करे यशगान.
तोर मदद मंय करना चाहत, काय करंव मंय आज्ञा देव
छूटे चहत तोर लागा ला, काबर के ऋण अब तक शेष.”
बइसाखू हा दुधे ला कहिथय- “”सुरता हवय तोर जे नाम
जीवन ला लेगत हस कइसे- याने काय करत हस काम?”
दुधे हा पहिली सकुचा जाथय, मगर बाद मं फोरिस साफ-
“”रोटी दार पेट भर खावत, जीवन ठीक चलत अभि मोर.
मोला शासन दीस उच्च पद, पर नौकरी ला मारेंव लात-
बिना चिकित्सक गांव हा रोवत, रोग हा खावत तन ला नोच.
ढारा गांव रहत हंव मंय अभि, उहें चलत औषधालय मोर
करत चिकित्सा ग्रामीण मन के, जिये के लाइक लेथंव दाम.”
बइसाखू हर्षित मन बोलिस- “”खावत हवय गांव ला रोग
उहां चिकित्सक जाय चहय नइ, यदपि घोषणा करत हजार.
अगर भूल के गांव मं जाथंय, करथंय उहां मरत ले लूट
आवत बिपत गांव ऊपर अउ, दुहना फूट बोहाथय दूध.
तोर उदिम ले मंय खुश होवत, जउन करत तंय गांव निवास
भेदभाव ला दुरिहा फेंकत, हिनहर तक के करत इलाज.”
मगर दुधे ला अनख जनावत, आरक्षक पहुंचिन ए बीच
पिनकू दुधे दुनों ला खेदिन, उनकर पर गुस्सा ला छींच.
बाहर डहर दुनों झन आथंय, तंह पिनकू हा रखिस सवाल-
“”तंय हा मिटा मोर सब शंका, मोटरी असन रखे हंव बांध.
व्याख्याता तिर बात करे हस, चहत हवस तंय ओकर कर्ज
मगर काय कर्जा ए ओहर, मोर पास कहि बिल्कुल साफ?”
दुधे कथय -“”मंय पढ़त रेहे हंव, उही बखत आइस तकलीफ
जहां परीक्षा शुल्क पटातेंव, मगर मोर तिर नोट अभाव.
मंय फिफिया के दउड़ेंव सब तन, व्याख्याता संग होगे भेंट
ओहर मोर मदद कर दिस टप, मंय हा शुल्क तुरुत भर देंव.
ओकर कृपा परीक्षा बइठेंव, मंय प्रावीण्य होय उत्तीर्ण
यदि बइसाखू मदद ले टरतिस, मोर भविष्य हा नष्ट विदीर्ण.”
व्याख्याता के लीस जमानत दुधे करिस खुद खर्चा ।
जमों बात मन मं राखिस – नइ हेरिस पर तिर चर्चा।।
बइसाखू ला दुधे हा कहिथय -“”तुम हा करव एक ठक काम
हमर गांव चल घूमव कुछ दिन, पावव शांति करव विश्राम.”
बइसाखू स्वीकार के बोलिस -“”माने लइक करत हस गोठ
मगर इहां ले टरना मुश्किल, जबरन आय बिपत के रात.
सच मं मोला कोन फंसादिस, ओकर पहिली पता लगांव
मंय हा कायर कहवा जाहंव, यदि नइ लेवन सकिहंव दांव.”
चइती ला बइसाखू खोजत, पर नइ पावत ओकर पूंछ
पता लगई मं जुग बुड़ जावत, आखिर धधुवा के रहि जात.
तभे खभर पाइस बइसाखू- अस्पताल मं लड़की एक
चिन्ताजनक परिस्थिति ओकर, करना चहत काल अभिषेक.
अस्पताल पहुंचिस बइसाखू, करथय पता आय ओ कोन
चइती आय पता जब चलथय, बइसाखू ला मिलगे तोष.
फेंकरूनाम चिकित्सक बोलिस -“”हवय जरुरत “ओ ग्रुप’ खून
चइती के तन रकत ला पाहय, होन पाय नइ जीवन सून.
दू बोतल भर खून इहां हे, पर चइती बर हे बेकार
जे मनसे के महत्व ऊंचा, ओकर बर ए रहत प्रबंध.”
बइसाखू खुद ला जंचवाथय, लागू होगे ओकर खून
हरहिन्छा खुद खून ला देथय, मन के क्रोध सुपा अस फून.
चइती के तन लहू ला पाथय, औषधि घलो व्यवस्थित रुप
ओकर स्वास्थय हा क्रमश& सुधरत, जीवन हा नवजीवन पात.
बइसाखू ला पिनकू पूछिस -“”मोर प्रश्न के देव जुवाप
चइती करिस शत्रुता तोर संग, काबर ओकर प्राण बचात?”
बइसाखू बोलिस -“”पिनकू सुन, मंय नइ करे कुछुच उपकार
एमां मोर स्वार्थ हा सधिहय, चइती ला पुछिहंव पुचकार.
यदि चइती पट ले मर जातिस, ओकर संग मर जातिस भेद
ओला जेन व्यक्ति उभराइस, ओकर पता बतातिस कोन!”
इही बीच मं पता चलिस सच- रिहिस सुरक्षित ओ ग्रुप खून
बोतल गिरके रइ छइ होगे, सधन पैस नइ ककरो स्वार्थ.
हमर देश बर बिडम्बना हे- मरत प्रान औषधि नइ पाय
जेकर जमों जरुरत पूरा, पूर्व सुरक्षित रखत समान.
चइती अपन निवास मं आथय, हवय खतम मुंह के मुस्कान
मुंहबोक्की अस कुछ नइ बोलय, देखत बक बक बही समान
बइसाखू पहुंचिस चइती तिर, तब ओकर स्थिति सामान्य
बइसाखू हा ओला पूछत, छीतत कृषक पाग मं धान-
“”कभू कभू मानव कर डरथय, आत्मा के विरुद्ध कई काम
यश अपयश जबरन मिल जाथय, जेकर संयोग दुर्याेग नाम.
खोल भला हिरदे के खरिपा – तंय माने हस काकर बात
मोर तोर शत्रुता कुछू नइ, मोर विरुद्ध चले हस राह ?”
चकला घर मं घटिस जे घटना चइती फोरिस ओला।
एकर बाद जेन बीते हे भेद बतावत पूरा ।।
किहिस हठील सरल बन मोला -“”बइसाखू हा दुश्मन मोर
ओला मंय हा चहत फंसाना, तब मंय चहत मदद ला तोर.
रेल के दुर्घटना जब होइस, हम्मन दौड़ करे हन लूट
पर कानून धरत अब हमला, पावत नइ आरोप ले छूट.
तंय हा बइसाखू के तिर जा, ओकर ले मंग स्वीकृति पत्र
अगर चाल मं सफल हो जाबे, तोला मंय देहंव कई लाभ.
तोर चित्र मंय खींच रखे हंव, लहुट जहय बिन टालमटोल
प्रेस मशीन बिसा के देहंव, मंय हा कहत सत्य ला खोल.
मोर वाक्य यदि अस्वीकारत, तोर चित्र जाहय हर हाथ
खूब नमूसी सबो जगह मं, प्रेस मशीन आय नइ हाथ.”
मंय सोचेंव – हठील हे हिंसक, दया मया नइ ओकर पास
ओला मंय अभि देंव पलोंदी, लेकिन बाद कोड़िहंव नींव.”
एकर बाद किहिस अउ चइती -“”मोला झिंकिस अर्थ के लाभ
धन जन के ताकत तंय जानत, चलवा देत गलत हर चाल.”
बइसाखू कहिथय -“”सच बोलत – गलत चले के कोन ला साध
स्वार्थ पूर्ति के लालच मं पर, मानव कर डरथय अपराध.”
चइती किहिस -“”तोर तिर मांगेंव – दुर्घटना के स्वीकृति पत्र
ओला देंव हठील के हक मं, तंहने रखेंव अपन मंय मांग-
“”मोर चित्र मन ला वापिस कर, झपकुन लगवा प्रेस मशीन
तोर बुता ला पुरो डरे हंव, तब झन छीन मोर अधिकार.”
मगर हठील चित्र नइ देइस, लतिया दीस मोर सब मांग
जम्मों धैर्य टूटगे रटरट, यथा आंसकुड़ टुटत कड़ांग.
मंय बोलेंव – पोल हे जतका बगराहंव सब कोती ।
मोर प्रतिष्ठा गिरिहय लेकिन ढंकिहंव लगा के पोती ।।
मंय अंड़ गेंव जिद्द कर उंहचे, कार हठील हा धोखा दीस
अपन बचन के पालन करही, तब तजिहंव एकर स्थान.
घेखरइ देख हठील भड़कगे, दीस अंजोरी ला आदेश-
“”चइती हमर विरुद्ध मं रेंगत, एकर फल तुरते तुम देव.
एहर जलगस जग मं जीवित, तलगस मुड़ मं घुमरत काल
हर के प्राण सबूत ला मेटव, चुर्रुस खतम होय जंजाल.”
घूमत सदा हठील के संग मं, तभे अंजोरी होगे क्रूर
माटीतेल मं घी हा मिलथय, बदल जथय घी के गुण धर्म.
झींका पुदगा करिस अंजोरी, पर मंय झटक करे हंव दूर
ओकर अउ कोतल मन दउड़िन, मोला करिन विवश मजबूर.
धरहा अस्त्र धरे ओमन हा, बलभर करिन मोर पर वार
चइती अब मरगे कहि जानिन, उठा के फेंकिन ठउर निझाम.
पोटपोट मंय करत रेहे हंव, टैड़क के पर गीस निगाह
ओहर अस्पताल मं लानिस, बचत कथा के तोला ज्ञान.”
बइसाखू चइती ला कहिथय -“”पहिली के बदलिस संसार
औरत हा समाज ला बदलत, मरद घलो नइ पावत पार.
लेकिन तंय पर ला धांसत हस, लावत खुद ऊपर तकलीफ
अइसन मं अतियाचारी मन, होवन कहां सकत हें नाश !”
बइसाखू सब भेद ला जानिस, उहां ले हटगे टंटा टोर
माला रुपा मन हा पहुंचिन, बइठ गीन चइती ला घेर.
पहिली हाल चाल ला पूछिन, कठिन प्रश्न ला सम्मुख लैन
माला हा चइती ला पूछिस -“”तंय हा शिक्षित गुण के खान.
सबो दिशा चहली मतात हस, तोर पास अनुभव भण्डार
हमर प्रश्न के उत्तर ला ढिल, बिल्कुल साफ झूठ झन मेल.
स्त्री पुरुष ला जन्मिस प्रकृति, उंकर जुड़य दैहिक संबंध
नया वंश अंवतरय जगत मं, प्राणी बिना शून्य संसार.
मगर सेक्स ला देत महत्तम, रखथंय फेर विरुद्ध मं तर्क
जब सहवास हा अति आवश्यक, ओकर होय सदा सम्मान.
मगर सेक्स के नाम एक तन – प्रेम प्यार आकर्षण केन्द्र
दूसर तन अपयश ला डारत – बलत्कार अउ दैहिक लूट.
याने कर्म हवय एके ठक, मगर नाम मं काबर भेद
जब संसार सेक्स ले जीवित, तब काबर ओकर हिनमान ?”
चइती कथय -“”सेक्स आवश्यक, एकर भेद कहत हंव खोल –
महिला पुरुष दुनों के स्वीकृति, तब मिलथय स्वर्गिक आनंद.
दूनों आकर्षित आपस मं, इच्छानुसार प्रेम संसर्ग
मन अनुसार कर्म जब होवत, तभे सेक्स पावत सम्मान.
मगर बलात सेक्स यदि होवत, – बलत्कार अउ दैहिक लूट
ए सम्मिलन अनिच्छित होवत, दूनों मन आकर्षण हीन.
एक डहर डर भय आशंका, मात्र एक के मन मं वेग
यदपि यहू मं सेक्स हा होवत, पर वास्तव मं अनुचित आय.”
रुपा किहिस -“”अनुभवी हम अन, करे हवन हन यौन व्यापार
यने अर्थ के लाभ ला पावन, रुपिया डहर रहय बस ध्यान.
हर सहवास मदद ला देवन, करन पुरुष के इच्छा पूर्ण
पर हम उत्साहित नइ होवन, सेक्स के आकर्षण ले दूर.”
चइती चलत गोठ ला थेम्हिस -“”अब तुम सुनव करूसच गोठ
महिला के यौन शोषण होथय, इही बात हा जग विख्यात.
लेकिन पुरुष घलो हे शोषित, औरत ओकर करत शिकार
काल ब्वाय याने पुरुष वेश्या, शोषित पुरुष के नाम ला जान.
रुपिया फेंक धनी महिला मन, बिसा लेत हें बली जवान
अपन काम ला शांत करावत, घटत पुरुष के ताकत मान.
तुम निष्कर्ष जान लव अइसन- औरत पुरुष मं झन कर भेद
पुरुष हा जतका अत्याचारी, औरत घलो निर्दयी क्रूर.”
एतन बात करत अंदर मं, बाहिर मं नंदले हा ठाड़
ओहर मुंह ला बंद रखे अउ, बात सुनत हे रख के ध्यान.
सोचत -“”चइती बोलत वाजिब, होत पुरुष पर अत्याचार
मंय हा स्वयं भुक्त भोगी अंव, होय लिंग शोषण हा मोर.
जब अभाव के बीच फंसे मंय, करेंव पुरुष वेश्या के काम
औरत मन मोला चुहकिन अउ, बदला मं रुपिया गिन दीन.
एकर दुष्फल मंय पाये हंव- मोर देह हा निर्बल हीन
मोला रोग पीलिया सपड़िस, दुब्बर बर असाढ़ दू अ‍ैस.
लेकिन चुनू उबारिस मोला, ओहर मदद मं रुपिया दीस
दवई बिसा उपचार कराएंव, तभे स्वास्थय मं अ‍ैस सुधार.
मोला जेहर दीस जिन्दगी, उही पाय हे प्राण के दण्ड
ओकर ऋण ला छुटे चहत हंव, लेकिन अवसर मिल नइ पात.
मंय हा न्यायमूर्ति यदि होतेंव, जमों सजा कर देतेंव माफ
ऊपर ले इनाम अउ देतेंव, खूब बढ़य ओकर यश मान.”
नंदले आय मदद मांगे बर, चइती पर रख के विश्वास
मगर इहां के समझिस स्थिति, वापिस होत हताश दिमाग.
नंदले भूख मरत हे सपसप, लेकिन ओकर तिर नइ नोट
यदि ओकर तिर रुपिया होतिस, सक भर खातिस बासा बैठ.
दैनिक पत्र पढ़िस नंदले हा, छपे हवय विज्ञापन एक-
“”कारागृह मं एक आदमी, ओहर आय क्रूर अभियुक्त.
ओहर मृत्यु दण्ड ला पाये, फांसी लगे के आगे टेम
पर जल्लाद मिलत नइ एको, तब अरझत फांसी के काम.
कोई अगर काम सरकाहय, ओला शासन देहय नोट
ओकर संग जेवन तक मिलिहिय, चाहे जेन सोंट ले लाभ.”
नंदले कारागृह मं पहुंचिस, जेल अधीक्षक के तिर गीस
उहां आय के कारण ला कहि, सब उद्देश्य ला फुरिया दीस.
जेल अधीक्षक कोड़िया पूछिस -“”फांसी देवई हा मुश्किल काम
अइसन काम मं पोटा कांपत, तंय हा कइसे करबे पूर्ण ?”
नंदले अपन वजन ला फोरिस -“”शल्य क्रिया नइ जानय जेन
शल्य कक्ष मं घुसत अचानक, ओहर डर गिरथय बेहोश.
लेकिन शल्य चिकित्सक हा भिड़, फाड़ देत रोगी के देह
कतको लहू बोहावत छल छल, पर दिमाग बिचलित नइ होय.
तइसे मंय हा फांसी देथंव, खूब करे हंव अइसन खेल
मुजरिम ला तड़फत देखत तब, मोर हृदय हा होत प्रसन्न.
फांसी देत मरिन पुरखा मन, जिनगी पालिन जिनगी छीन
उंकर राह पर मंहू चलत हंव, बड़े मीन खावत लघु मीन.”
जेल अधीक्षक लीस परीक्षा, नंदले पर करलिस विश्वास
नंदले सक भर भोजन ओइरिस, उंहे रात भर लीस अराम.
बेर नवा जीवन बांटे बर, बड़े फजर होवत तैयार
गाय अपन छोटे बछरूला, पिया देत अमृत अस दूध.
कारागृह मं उही बखत मं, फांसी लगे के पहुंचिस टेम
नंदले हा तइयार बुता बर, मानो सब ले करतब श्रेष्ठ.
चलिस चुनू हा फांसी स्थल, जिनगी घरी बचे बस चंद
ओकर पांव चलत मुश्किल मं, हंसत न रोवत मुंह तक बंद.
धड़ धड़ धड़ धड़ हृदय हा होवत, आंख खुले पर सुन्न दिमाग
ओला कोन पकड़ के लेगत, का सोचत नइ धरत दिमाग.
जहां चुनू ला नंदले देखिस ओला मारिस पाला ।
तिली खरी हा बिना तेल के नंदले के मुंह काला ।।
भावुक लेखन मन लिख देतिन – चुनू हा कुछ हंस हेरिस बोल-
नंदले तंय हा ठीक करत हस, तंय कर पूर्ण अपन कर्तव्य.
तोर प्राण ला मंय राखे हंव, तब तंय छूटत ओकर कर्ज
तोर हाथ मर के खुश होहंव, निपटा तुरुत अपन तंय फर्ज.”
मुड़ ला गड़िया नंदले कहितिस -“”मोर कुजानिक ला कर माफ
बिना दोष मंय तोला मारत, तइसे मंय हा पाहंव दण्ड.”
जेल के अधिकारी धथुवातिन, चढ़तिस चुनू फांसी के मंच
ओकर मुंह मुसकात फूल अस, कैक्टस कंच मरुस्थल बीच.’
लेकिन इहां दृष्य नइ ओइसन, यदपि करिस नंदले सब काम-
चुनू ला करिया वस्त्र ओढ़ा दिस, नरी मं बांधिस डोरी टांठ.
पांव तरी के पटनी झींकिस, तरी झूलगे चुनू के देह
तन ले ओकर प्राण निकलगे, जग ले बुतगे ओकर नाम.
जमों काम नंदले निपटाइस, मगर उड़े हे ओकर होश
रुपिया ला झोंकत तक बिलमिस, तेकर बाद छोड़दिस जेल.
नंदले अउ बइसाखू मिलथंय, तंह नंदले हा कहि दिस सत्य
बइसाखू हा कथा ला जानिस, लेथय उहू बड़े जक सांस-
“”बुभूक्षितम करोति अपराधम, तंय लोकोक्ति सिद्ध करदेस
मंय अब काकर करंव टिप्पणी, लेकिन तंय हा करे अनर्थ.”
आगू ले हठील हा आवत, इंकर पास मुसकावत अ‍ैस
नंदले ला ताना भर एल्हत -“”करे हवस जनसेवा काम.
एक बखत जे हत्या करथय, ओकर पर चढ़ जाथय खून
अगर चुनू हा जीवित अब तक, कतको झन के लेतिस प्राण.
मुजरिम ला फांसी चढ़ाय हस, एकर ले समाप्त अपराध
दूसर मन ला शिक्षा मिलिहय, सब झन गाहंय जस ला तोर.”
नंदले के गुस्सा कंस भड़किस, देना चहत हे उत्तर टांठ
लेकिन मन मं लुका के रखलिस, अउ भविष्य मं कतको वक्त.
बइसाखू हा खड़े कलेचुप, पर हठील हा खुद गोठियात-
“”मोला देखा नेक रद्दा तंय, ताकि मोर भावी बन जाय.
खोड़रा कते लुका के रहिथव, चलत हवय का मरत ले काम
कतको दिन मं दर्शन देवत, परन तो देवव धोकर के पांव.”
बइसाखू कहिथय -“”हठील सुन, मोला तंय झन झुझका व्यर्थ
तोर कर्म ला मंय जानत हंव, तोर बात के समझत अर्थ.
खोरबहरा के प्राण हरे हस, तंय दिन रात करत अपराध
नंदले चइती चुनू अउ मोला, तिंही करे हस भिड़ बर्बाद.
पाप कर्म ला जोंगत रहिथस, भ्रष्ट राह पर लेगत पांव
यद्यपि वर्तमान सुख देवत, पर भविष्य मं खतरा दाह.
वन के बरहा ला मारे बर, रखत शिकारी गोला राह
बरहा गोला ऊपर रेंगत, गोला फूट जात कर धांय.
बरहा चिथा प्रान ला खोवत, होत शिकारी खुश अंधेर
मांस खात कोलिहा कातिक अस, पात्र निमंत्रण ओकर मित्र.
बढ़त शिकारी के क्रूरता हा, कई ठक गोला ला रख देत
ओकर पांव परत गोला पर, तंह गोला हा फूटत धांय.
होत शिकारी के तन छलनी, आखिर तड़फ होत प्राणान्त
जे गोला मं पशु ला मारिस, उहिच हा बनगे ओकर काल.
गलत काम मं पात सफलता, तभे बढ़त दिन दिन उत्साह
अपन कर्म के फांदा मं फंस, तंय हां खुद हो जाबे नाश.”
कई दृष्टांत दीस बइसाखू, ताकि हठील नेक बन जाय
पर हठील के सींग हा बाढ़त, हित के बात लगत विष बाण.
किहिस हठील -“”ज्ञान भर बांटत, पर खुद करथस खोड़िल काम
फूटत आंख देख मोर उन्नति, तंय हा सोन ला बोलत ताम.
मंय देवत चेतावनी के तंय झन परबे कभु आड़ा ।
वरना दुष्परिणाम भोगबे टूट जहय रट हाड़ा ।।
गीस हठील हा खुद के बंगला, तभे अंजोरी गप ले अ‍ैस
कथय -“”तोर आदेश पुरो के, मंय हा बस अभि आवत लौट.
रेल लूट के धन लाने हन, ओला मंय बिक्री कर देंव
ओकर एवज नोट लाने हंव, तंय हा रुपिया गिन धर हाथ.”
दीस अंजोरी हा सब रुपिया, तंह हठील होगीस प्रसन्न
खूब प्रशंसा पात अंजोरी, ऊपर ले पालीस इनाम.
“”मन अनुसार मार तंय आज्ञा, मोर असन पर कर विश्वास
डंका तोर बजय सब कोती, रखथंव सदा अपन मन आस.”
धर इनाम ला किहिस अंजोरी, तभे पहुंच जाथय पचकौड़
नशा जिनिस लाने हे संग मं, रखिस हठील के तिर सब चीज.
जहां हठील जिनिस ला जांचिस, खुश होके करथय तारीफ
मादक जिनिस शुद्ध शत प्रतिशत, नकली के बुझ गेहे नाम.
तस्कर सटोरिया अपराधी, जेमन करत देश संग घात
अपन असन बूता वाले संग, दोगलई छोड़ रखत ईमान.
मादक द्रव्य सुरक्षित रख के, होवत हे हठील निÏश्चत
तंह पचकौड़ ला रुपिया गिनदिस, लेन देन हा होवय मीठ.
कथय हठील -“”लान मोरे तिर, मादक द्रव्य जतिक मिल जाय
एकर खपत हवय अड़बड़ अउ, लाभ घलो देवत हे खूब.”
तब पचकौड़ करत हे शंका -“”हवय लाभप्रद तोर सलाह
पर मींधू के भय हा खावत, पकड़े बर डारे हे जाल.
यदि मींधू के बूता बनतिस, तब मंय होतेंव पूर्ण स्वतंत्र
मोर काम हा सरलग निपटय, रच तंय भला सफल षड़यंत्र.”
“”सोसन भर तंय धंधा ला कर, तंय डर के घुटना झन टेक
मंय मींधू के बुता बनाहंव, मगर चहत हंव थोरिक टेम.”
दीस हठील बहुत आश्वासन, तब पचकौड़ लहुट के गीस
तंहने फिर आ जाथय छेरकू, देख हठील हा खुश होगीस.
छेरकू हा हठील ला कहिथय -“”तंय हा मोर कष्ट ला टार
बुल्खू आय मोर प्रतिद्वन्दी, ओला तंय किसनो कर मार.
मंगलिन श्रमिक चलिस जब टक्कर, करिन श्रमिक मन जब हड़ताल
व्यवसायी के धंधा चौपट, शहर हा होगे दुखी अशांत.
लेकिन बुल्खू हा मिहनत कर, मंगलिन श्रमिक ला कर दिस एक
दूनों पक्ष ला नफा अमर दिस, अउ भावी बर राह बनैस.
मालिक श्रमिक दुकनहा जनता, बुल्खू भर ला देवत श्रेय
ओकर पक्ष लेत सब मनखे, यने करत सब जय जयकार.
वास्तव मं बुल्खू जनसेवक, राष्ट्रभक्ति तक लबलब पूर्ण
मोर दोष मन बगर जथंय तंह, बुल्खू लेत सुयश ला लूट.
मंय देखत भविष्य ला टकटक- जीत सकंव नइ पुन& चुनाव
मोर बात यदि मान जते तंय, मंय दे देतेंव रक्षा छांव.”
“”काबर पहिलिच टेस ला मारंव, करिहंव यत्न पूर्ण हो काम
मोला हे विश्वास अपन पर, बुल्खू पहुंच जहय यमधाम.”
दीस हठील बहुत आश्वासन, छेरकू लहुटिस कर विश्वास
देखव तो हठील के करनी- करदिस शुरूघात के काम.
मन मं एकोकन डर भय नइ, अपन काम मं चलत हठील
ओकर साथ अंजोरी रेंगत, जेन धरे हे नशा पदार्थ.
गीन महाविद्यालय तिर मं, इंकर पास पहुंचिन कई छात्र
ओमन नशा जिनिस ला मांगत, स्वयं बलात होय दशगात्र.
दाई ददा के धन ला फूंकत, सक भर करत नशा उपयोग
सर मं सती बचे थोरिक अस, वरना फइले बस ए रोग.
भगत समुन्दा नशा ले दुरिहा, ओकर ड्रग के करत विरोध
ओला हठील हा उभरावत, ताकि खरीदय मादक द्रव्य.
कथय हठील -“”शांति मन सुन ले, नशा जिनिस के गुण लमियात-
पहलवान वैज्ञानिक विचारक, करथय उच्च वर्ग उपयोग.
सोय बुद्धि मं शक्ति ला भरथय, आविष्कार मदद ला देत
मादक द्रव्य मिलत औषधि मं, तब ओकर गुण होवत श्रेष्ठ.
अगर छात्र मन नशा ला लेहव, स्मृति तेज पाठ सब याद
निश्चय सफल परीक्षा मं तुम, प्राविण्य मं जुड़ जाहय नाम.
यदि मंय हा असत्य बोलत हंव, पूछव कंवल ला वाजिब गोठ
ओहर मोर दवई ला लेथय, तब ओकर हे भावी साफ.”
कंवल कथय -“”मंय नशा ले भागंव, एको पाठ रहय नइ याद
लेकिन नशा पान हा होवत, मोर जिन्दगी पैस प्रकाश.
जउन पाठ ला याद करत हंव, स्मृति मं स्थायी वास
हिम्मत काम उझेलत हे मन, नवस्फूर्ति लगत हे देह.”
जब वक्तव्य करिस आकर्षित, लीस समुन्दा नशा पदार्थ
दूसर छात्र परत हें झोझा, चिथो चिथो कर जिनिस बिसात.
जेन जिनिस ला लाय अंजोरी, हाथोहाथ बिकिस तत्काल
रुपिया ला हठील हा समटत, अब लहुटे बर करत विचार.
चुपे हठील अंजोरी खसकिन जे वास्तव अपराधी ।
मगर छात्र मन काबर भागंय नशा बनावत जिद्दी ।।
अपन स्वार्थ ला सिद्ध करे बर, नवा युवक ला डारत नर्क
उंकर गलत करनी ला परखव – ओमन आय राष्ट्र के शत्रु.
करके नशा छात्र मन झुमरत, आपुस करत लड़ई तूफान
नशा बिगाड़त इनकर जीवन, का करिहंय पर के कल्याण!
बइसाखू गिस छात्र पास अउ, सुधर जाय कहि मर समझात
मगर छात्र मन कुछ नइ घेपत, ऊपर ले मुंह ला फरकात.
ओकर पास समुन्दा हा गिस, बइसाखू ला दीस तड़ाक
व्याख्याता के आंखी बरथय, बपुरा हा रहि जथय अवाक.
गीस सूचना थाना मं तंह, आरक्षक दल झपकुन अ‍ैस
ओकर साथ पहुंचथय मींधू, जांचत हवय उहां के हाल.
जहां कंवल ला पूछिस मींधू, देत कंवल हा झुमर जुवाप –
“”व्याख्याता मन हा पढ़ाय नइ, देखत रथंय अपन भर स्वार्थ.
वेतन हमर खूब बाढ़य कहि, जब मन होत करत हड़ताल
इहां आय विद्या अमरे बर, मगर अशिक्षित बन के जात.
होवत अत्याचार हमर पर, हमर भविष्य होत हे नाश
अब अनियाव फेर झन होवय, इही सोच हम करत विरोध.”
मींधू बोलिस -“”जे बोले हस, ओहर बेर असन सच गोठ
मगर अभी तंय ढचरा मारत, ताकि गला हा झन फंस जाय.
झेलत बिपत तुम्हर पालक मन, भेजिन इहां पाय बर ज्ञान
उनकर श्रम ला नशा मं फूंकत, अपन हाथ जावत शमसान.
नशा भविष्य के रांड़ ला बेचत, ऊपर ले आवत कंस खर्च
बुद्धि भ्रष्ट बदनामी आथय, चुहका जथय देह के शक्ति.
यदपि नशा के लेत संरोटा, लेकिन तर्क आय बिन गोड़
उभरउनी ला कभु झन मानो, जीवन रखव नशा ला छोड़.”
एकर बाद पूछथय मींधू -“”नशा जिनिस के वितरक कोन
ओकर धुमड़ा खेदे बर हे, ओहर आय प्रमुख अभियुक्त ?”
मींधू चिभिक लगा के पूछत, लेकिन छात्र ज्वाप नइ देत
तब मींधू हा भन्ना जाथय, ताकि ज्ञात होवय सच मात्र-
“”तुम सब टकटक ले जानत हव – थाना पुलिस के अत्याचार
निरपराध तक ला पहटाथन, हमर पास नइ दया या प्यार.
करके नशा करत हव हुल्लड़, तब तुम कहां हवव निर्दाेष
हवालात मं धांध दुंहू अउ, उंहे खतम करहूं सब रोष.
यदि आफत ले बचना चाहत, फोर तुरुत मुजरिम के नाम
ओकर पास दउड़ के जाहंव, करिंहव पूरा करतब काम.
मींधू धमकी देइस तंहने सच फोरिन विद्यार्थी ।
मींधू हा घालुक ला खोजत ओकर निकलय अर्थी ।।
आखिर मं हठील हा मिलगे, तंह मींधू हा रखिस सवाल-
“”छात्र के जीवन ला मेटत हस, काबर चलत गलत तंय चाल ?
जीवन बर रुपिया हा लगथय, करना परत काम व्यापार
तंय हा काम उठा ले दूसर, पर जीयत जीवन झन बार.”
कथय हठील -“”जउन जस होथय, उही असन होवत हे सोच
पुलिस विभाग कमावत हस तंय, तब मुजरिम के करथस खोज.
निरपराध मनसे तक ला तंय, करत प्रमाणित मुजरिम आय
ओला फंसा सजा पावय कहि, कई ठक धारा लगवा देत.
मंय हा नशा ले दुरिहा भगथंव, मंय नइ करंव अनैतिक काम
मंय निर्दाेष वर्षा के जल अस, तंय बेकार दोष झन डार.
हम तुम दुनों आन सहपाठी, तंय अमराय शासकीय काम
बिना जीविका मंय घूमत हंव, तेला घलो करत बदनाम !”
मींधू कथय -“”मित्र मानत हंव, तब समझावत हंव कई घांव
पर अनर्थ बूता जोंगत हस, तब मंय हा झींकत हंव पांव .”
अब हठील हा रेंगत सोचत – सरलग चलय मोर सब काम
मोर लाभ हा बढ़य दिनों दिन, ऊपर ले कमांव मंय नाम.
मगर राह मं अड़चन आवत- मींधू परत बीच मं आड़
ओकर खुंटीउजार मंय करिहंव, तंहने खुद चुर जाहय दार.
याने छुटय जीविका ओकर, का कर लेहय मोर खिलाफ
धुंका बंड़ोरा हा रुकथय तंह, जगमग बरत बुझत जे दीप.’
तुरुत अंजोरी ला बलवाथय, अउ सब बात पियाथय कान
जहां अंजोरी भेद ला जानिस, रेंगत हवय विजय ला पाय.
मींधू तिर जब गीस अंजोरी, मींधू काटत हे अमरुद
ओकर ऊपर नून ला चुपरत, तब फिर खावत लगा के स्वाद.
दीस अंजोरी ला खाये बर, तंहने कथय अंजोरी हांस-
“”जुन्ना मित्र तोर अंव मंय हा, तेला तंय हा करत हताश.
मोला सक भर मिठई खवाते, मगर बिही देवत हस खाय
कतको रुपिया ला झोरत हस, लेकिन हवस सूम के सूम.?”
मींधू कथय -“”करंव का वर्णन, होत बिही हा गुण के खान
उदर रोग के एहर दुश्मन, करत पेट ला खलखल साफ.”
कथय अंजोरी – “”बिही करत हे , पेट के मल ला खलखल साफ
तइसे तंय हा रख मोरो बर, अपन हृदय ला बिल्कुल साफ.”
“”एकर बर निÏश्चत रहा तंय, मंय हा तोर करत सम्मान
करिया हृदय तोर बर कभु नइ, मंय हा चहत तोर शुभ लाभ.”
तभे अंजोरी रुपिया हेरिस, करत हवय मन लुके जे काम
मींधू ला रुपिया पकड़ाथय, नाम अंजोरी करिया काम.
“”आवश्यक तब मंगे रेहे हंव, तोर पास ले ऋण मं नोट
बिपत समय तंय मदद करे हस, जाड़ मरत ला मिलथय कोट.
जीवन रेल व्यवस्थित रेंगत, छूटंव कर्ज सोच के आय
अड़बड़ दिन मं कर्ज पटावत, मोर कुजानिक ला कर माफ.”
बोल अंजोरी हा चुप होगे, मींधू कथय कपट ला फून –
“”मित्र, अपन मन मं कुछ सोचस, लेकिन तोर काम नइ नेक.
मंय हा साहूकार कहां अंव, तेमां तंय पटात हस कर्ज
तोर जरुरत पूरा होगे, एहर मोला दिस संतोष.
जब तंय मोला मितवा कहिथस, लेन देन ला दुरिहा राख
मोला जब रुपिया आवश्यक, तोर पास मंय रखिहंव मांग.”
मींधू हा रुपिया लहुटावत, करत अंजोरी हा इंकार
हारे दांव राखलिस मींधू, एकर सिवा राह नइ और.
तब अपराध निरोधक दल हा, उंकर पास धड़धड़ ले अ‍ैस
मींधू हा जब दल ला देखिस, ऊपर तरी होत हे सांस.
मींधू ला दल प्रमुख हा बोलिस -“”तंय हा लेस नगद मं घूंस
तोला रुपिया दीस अंजोरी, तब तंय रंगे हाथ पकड़ात.”
मींधू के तिर जतका रुपिया, दल के प्रमुख हा धरलिस झींक
यद्यपि मींधू घूंस खाय नइ, लेकिन बिना दोष धंस गीस.
मींधू कहत अंजोरी ला अब -“”बिही साथ खाये हस नून
ओकर कर्ज बने छूटत हस – अपन मित्र ला स्वयं धंसाय !
नाम अंजोरी रखे हवस पर सच मं करिया चाला ।
पर के बुध ला मान चलत मंय जानत बालेबाला ।।
बहुत कष्ट मं पाय जीविका, जेवन मिलत रिहिस भर पेट
तंय नंगात हस ओला भिड़के, काम करे तेहर नइ ठीक.”
“”घूंस पटा के पाय नौकरी, उही घूंस हा पद छिन लीस
गलत कर्म के फल खुद चीखत, मोर मुड़ी लांछन झन डार.”
अतका बोल अंजोरी हा चुप, मींधू संग मिलात नइ आंख
मींधू अपन दांत ला कटरत, मगर क्रोध ला रखलिस रोक.
जेन अपन कर्तव्य निभाथय, घालुक साथ करत संघर्ष
ओहर पद मं टिकन पाय नइ, घालुक मन मानत तंह हर्ष.
मींधू ला बिन दोष फंसा दिस, गीस अंजोरी अपन मकान
मनखे के हे भीड़ कचाकच, जेमन करत चिहुर चिंवचांव.
मनसे पर खखुवात अंजोरी -“”एहर कहां दर्शनीय ठौर
तुम्मन कार इहां आये हव, कारण कहव मोर तिर साफ?”
कारण पूछत हवय अंजोरी, मगर कोन हा लाय जुवाप
ओमन मात्र बोटबिटा देखत, मानों ककरो गमी मनात.
दुकली जेन अंजोरी के बहिनी, ओहर दिखत दुखी गंभीर
बगरे चुंदी – खंरोचा तन भर, अस्त व्यस्त हे ओकर वस्त्र.
टैड़क हा बिखेद ला फोरत -“”तंय अनुपस्थित अपन मकान
तभे हठील इहां पर पहुंचिस, अउ दुकली ला एल्हिस तान.
ओकर मंसा दुकली ताड़िस, तंहने दुकली करिस पुकार
हम्मन दौड़ इहां तक आएन, पर रहिगेन सिरिफ झखमार.
अंदर ले कपाट लगगे तब, मदद करे बर हम असमर्थ
ओतन दुकली के पत जावत, लूटत हवय हठील समर्थ.
करिस कुकर्म हठील निसाखिल, तंह निकलिस दरवाजा खोल
हम्मन घेर के ओला धरतेन, तंह हठील हेरिस पिस्तोल.
सब ला डरा अपन हा भागिस, हम धथुवा इंहचे हन ठाड़
पटिया हा मजबूत हवय पर, सरक के भर्रस गिरथय कांड़.”
टैड़क सब घटना ला फोरिस, बोक्क अंजोरी सुन्न दिमाग
बहुत बाद मं चेत लहुटथय, तब फिर लगत देह भर आग.
गैंदा हा टैड़क ला झींकिस, अलग लेग के रखथय तर्क-
“”पाप पुण्य के फल इहें खावव- स्वर्ग नर्क ला जीयत भोग.
लूट कुकर्म अंजोरी करथय, चइती तक ला दुख पहुंचैस
पाप के फल ला संउहत भोगत, इही जन्म बदला मिलगीस.”
टैड़क हा गैंदा ला कहिथय -“”तंय बोलत हस बात अनर्थ
सब तन के विचार ला समझव, तेकर बाद तर्क ला राख.
बइसाखू दुकली ला जानत, एमन कहां करिन कुछ पाप
तभो इंकर पर आफत आगे, कते कुकर्म के फल ला पैन !
पाप पुण्य मं वार्ता होथय, आय समस्या बढ़थय और
कुष्ठ रोग पापी फल कहिथंय, पर औषधि मं होवत ठीक.
छेरकू करत पाप कतरो ठक, मगर पाय पद पूंजी मान
हंसिया श्रमिक कमावत मरमर, मगर भूख मं छूटत प्राण.
अतिक बात मंय निश्चय मानत, स्वर्ग नर्क मं भेद लुकाय –
मनसे अत्याचार करय झन, ओहर चलय ठीक असराह.
पाप पुण्य के बात ला गोठिया, हम खुद होत कर्म ले हीन
दुख अन्याय रोग हा बाढ़त, शोषक हंसत बजाथय बीन.”
टैड़क अउ गैंदा गोठियातिन पर हट गीस अंजोरी ।
मींधू पास पहुंच के फोरत पूर्व के घटना पूरा ।।
केंघरिस -“”तोर विरुद्ध चले हंव, ओमा रिहिस हठील के हाथ
मंय हठील के पाछू किंजरत, आखिर होगे मोर बिगाड़.
जतका दोष मढ़ेंव तोर ऊपर, अमृत दूध सिन्धु अस झूठ
अब सब दोष अपन पर लेवत, अपन हाथ मारत खुद मूठ.
ताजा घटना घटे हवय अभि, तब हठील के करत विरोध
यदि कुछ दिन देरी हो जाहय, मंय खुद लेहंव ओकर पक्ष.
मोर गोठ ला सत्य समझ तंय – मंय भावुक पर कहत यथार्थ
तंय हठील ले टक्कर ले भिड़, मोर नजर मं तिंहिच समर्थ.
“”अब प्रायश्चित करत अंजोरी’ कहि देहय हे व्यक्ति अबूज
पर मंय अपन स्वार्थ ला साधत, एकर सिवा राह नइ दूज.”
जउन रहस्य हठील के जम्मों, किहिस अंजोरी राख प्रमाण
सब आरोप अपन मुड़ लेइस, भले होय कतको नुकसान.
मींधू जब आरोप ले छूटिस, पुन& करत शासन के काम
धर के पेज हठील ला खोजत, छोड़िस सब आलस आराम.
आगू तन ले अर्थी आवत, कई मनसे हें ओकर साथ
ज्ञानिक खलकट पंचम मंथिर, जैलू झनक झिंगुट तक साथ.
चित्रकार लिप्पिक वैज्ञानिक, अभिनेता शिक्षक मजदूर
एमन अंदर हृदय दुखी हें, बाहिर मुंह पर ब्यापत शांति.
मींधू करत हवय एक शंका -“”मनसे मन ए नइ चिल्लात-
सिरिफ राम के नाम हे सत्तम, बाकी के इहि गत्त अवश्य.
अर्थी पर लाई ला छिंचथंय, छीतत रुपिया छींच गुलाल
अर्थी हा जब मरघट जाथय, जान लेत दुसरो इंसान.
पर ए अर्थी हवय अजूबा- एकर संग मं मानव जेन
उंकर मुंहू हा बंद सिले अस, बाहिर नइ झलकत तकलीफ.
जिनिस अवैध निकासी खातिर, तस्कर चलत कपट के चाल
अर्थी लुका जिनिस ला रखथंय, ताकि निरीक्षक धोखा खाय.”
अर्थी के तिर पहुंचिस मींधू, सब ला डपटिस कड़ा अवाज –
“”अर्थी ला राखव खाल्हे मं, करना चहत सतम के जांच.
एमां काय लुका राखे हव, वैध वस्तु या वस्तु अवैध
जब सच तथ्य ले परिचित होहंव, दुहूं हटे बर मंय आदेश.”
पंचम कथय -“”हमन लेगत हन, प्रतिभावान युवक के लाश
एकर मरना दुखी बना दिस, तंय हा बीच बेंग झन पार.”
मींधू के शक हा बढ़ जाथय, देखे बर करथय हठ खूब
मनसे बाटुल हार जथय तंह, अर्थी ला नीचे रख दीन.
तुरुत कफन कपड़ा ला खोलिन, ताकि लाश दगदग दिख जाय
मींधू जहां लाश ला देखिस, ओकर हृदय धकधका गीस.
आय कंवल के मृत तन ओहर, जेहर आय नवयुवक छात्र
नशा जिनिस ला खूब वापरिस, जीयत तन हा बनगे लाश.
मंथिर हा मींधू ला बोलिस -“”नशा कंवल ला कर दिस नाश
यदि एहर वैज्ञानिक होतिस, जन कल्याण के करतिस खोज.
एहर अगर चिकित्सक होतिस, कई ला देतिस जीवन दान
यदि एहर साहित्यिक चिंतक, जग ला देतिस नवा विचार.
याने मोर बात के आशय – नशा करिस प्रतिभा ला नष्ट
जेहर जग के भविष्य बनतिस, समय ले पहिली ओकर मृत्यु.”
झनक अभी तक हवय कलेचुप, मींधू ला देवत ललकार-
“”तंय कर्तव्यनिष्ठ अंव कहिथस, चहथस- उन्नति पाय समाज.
नशा जिनिस के जे तस्कर ए, ओला पकड़ छोड़ सब काम
कड़ा दण्ड कानून ले दिलवा, ताकि दुसर तक शिक्षा पाय.”
यथा कीटनाशक औषधि ले, हरा पेड़ हा मुरझुर होत
पर वास्तव मं कीरा मरथय, पेड़ के रोग हा होत समाप्त.
तंहने पेड़ लहलहा बढ़थय, बाद मं देवत ठोस अनाज
जहां जीव हा अन्न ला खाथय, ओकर जीवन जीवन पात.
अर्थी साथ हवंय जे मनखे, मींधू ला कई ठोसरा दीन
मींधू ला कंस अनख जनावत, पर वाजिब मं नेक सलाह.
डंडा हा रट्ठा के झड़कत, गिल्ली के छुचकी पर घांव
गिल्ली हा भनभना के उड़थय, मन भर के मारत हे दौड़.
मींधू के दिल घाव बनिस तंह, तुरते चलिस पाय उद्देश्य
ओहर मात्र हठील ला खोजत, ओकर सिवा काम नइ और.
बइसाखू संग भेंट हो जाथय, तंह मींधू करथय संकोच
ओकर हाथ भरिस हे बेली, निरपराध के बूड़िस पोच.
बइसाखू बोलिस मींधू ला -“”मंय जबरन मुजरिम बनगेंव
मोर हाथ डारे तंय बेली, तेकर बर तंय झन कर ग्लानि.
मध्यम वर्ग बुद्धिजीवी हम, वास्तव मं होवत गद्दार
अन्यायी ला मुंह मं बकथन, मगर कर्म ले लेथन पक्ष.
शोषक के चुंगल फंसथन तब, आत ठिकाना भ्रमित दिमाग
तब शोषक संग टक्कर लेथन, पीयत पसिया तक ला त्याग.”
बइसाखू, मींधू ला पूछिस -“”काबर करत हठील के खोज
तंय कर्तव्य करत हस पालन, या फिर लेवत हस प्रतिशोध ?”
मींधू कहिथय- “”का उत्तर दंव- पर अतका हे निश्चय बात
बस हठील के बुता बनाहंव, अर्जुन बेधिस चिरई के आंख.”
मींधू ओ अस्थान ला छोड़िस, अपन लक्ष्य करना हे पूर्ण
ओकर मन हा बायबियाकुल, काबर अब तक अधुवन काम !
अउ हठील स्वारथ पूरा बर, लुका चलत शतरंजी चाल
जस महाभारत के दुर्याेधन, छुपे सुरक्षित भीतर ताल.
मींधू हा नंदले तिर पहुंचिस, नेमिस -“”मोर बात ला मान
तंय पचकौड़ पास जा झपकुन, उहां ज्ञात कर ओकर पोल.
तोला यदि रुपिया मिल जावय, निरपराध के लेथस प्राण
चुनू तोर जीवन ला राखिस, तेला भेजेस मरघट घाट.
नशा जिनिस पचकौड़ बेचथय, ओकर पास लबालब नोट
ओकर तिर ले तंय ले रुपिया, एकर साथ भेद ला जान.
मोर पास सब भेद ला फुरिया, मंय करिहंव करतब के काम
सब अपराध खतम कर देहंव, दुश्मन के रगड़ा ला टोर.”
नंदले छरकिस -“”कहि दूसर ला, तोर बात हे अस्वीकार
तस्कर क्रूर निर्दयी होथंय, बिन डर करत नशा व्यापार.
तंय पचकौड़ के नाम ला लेवत तेमां कांपत पोटा ।
अगर मोर ले बुता कराना भेज दूसरा कोती ।।
वास्तव मं नंदले थर्रावत, हुंकी भरे बर हटत जबान
तंह मींधू हा धमकी देथय, तब नंदले होवत तैयार.
नंदले हा पचकौड़ के तिरगिस, अपन प्रशंसा करथय खूब-
“”काम मंगे बर मंय आये हंव, मोला अपन पास तंय राख.
सब आदेश के पालन करिहंव, कुछ भी करे सदा तैयार
कर विश्वास मोर ऊपर तंय, दुहूं परीक्षा मुड़ के भार.
अगर तोर दुश्मन एकोझन, ओकर करिहंव खुंटीउजार
चुनू ला तंय टकटक जानत हस, मिंही हरे हंव ओकर जीव.”
नंदले दीस उल्थना कइ ठक, तंह पचकौड़ करिस विश्वास
नंदले ला रख लीस अपन तिर, करे अपन ला बिन्द्राबिनास.
बोलिस -“”मोर शत्रु बस मींधू, ओहर परत काम मं आड़
ओहर यदि जग ले हट जातिस, मोरो हटतिस बिपत पहाड़.”
नंदले कथय -“”कसम नइ खावंव, लेकिन एक रिवाल्वर देव
तोर काम के दिन मं पूरा, एकर भेद पूर्व झन लेव.
तोर आड़ ला हटा के रहिहंव, शंका हवय तेन ला टार
बोइर खाय से तंय मतलब रख, गुठलू ला दुरिहा मं फेंक.”
नंदले उंहे रहत हे हिलमिल, जांच करत पचकौड़ के काम
नशा जिनिस ला कतिहां रखथय, कइसे करथय काम अवैध !
एक दिवस जामिल परगे अउ, लैस अंजोरी ला पचकौड़
कहिथय -“”तंय हा काम के लाइक, तोला छोड़ा अपन तिर लाय.
नेता मन आपुस मं लड़थंय, युद्ध होत अपराधी बीच
मोर – हठील बीच झगरा हे, वाकइ मं हठील हे नीच.”
कहि पचकौड़ सांत्वना देवत, लेकिन चलत कपट के चाल
चुप हठील ला बलवा लेथय, अ‍ैस हठील हा बन के काल.
तभे हठील, अंजोरी ला बोलिस -“”जउन बात बोलिस पचकौड़
ओमां मंय संशोधन करिहंव, अपन दिमाग लेग झन और.
अपराधी आपुस मं लड़थंय, पर होवत उंकरे नुकसान
एमन दुनों एक होथंय तंह, दोगला के लेवत फट प्राण.
दुकली संग संबंध करेंव मंय, ओतकिच मं तंय हठ धर लेस
मींधू तिर सब राज फोरे हस, तब तंय भोग करम के डंड.”
धरिन अंजोरी ला जबरन अउ, ओला देवत नशा पदार्थ
करत अंजोरी अड़बड़ छटपट, पर नइ होवन पात अजाद.
आखिर ओकर जीव निकलगे, जग ले बूझिस नाम के दीप
अब पचकौड़ – हठील आनंदित, देन भेदिया ला हम लीप.
जे अपराध कर्म ला करथय, ओकर होत विचित्र सुभाव –
अपन स्वार्थ तक सब ला मानत, कहिथय – तंय अस भाई मित्र.
पर कोई विरोध मं जाथय तंहने करथय बूता ।
ओकर जान आम अस चुहकत फेंक देत हे गोही ।।
नंदले क्रूर दृष्य ला देखिस, ओकर रुंआ हा होगे ठाड़
किम कर्तव्य उपाय दिखत नइ, ना चिल्लान सकिस मुंह फांड़.
नंदले हा मींधू के तिर गिस, जमों खभर दिस ओकर कान
मींधू फट तैयारी करके, अब पचकौड़ के घर मं गीस.
हे पचकौड़ निफिक्र निघरघट, जानत कहां आत मुड़ काल
मींधू अउ आरक्षक देखिस, उहां ले भागत जीव सम्हाल.
मींधू हा हठील ला देखिस, मींधू ओतन दउड़त खूब
पर हठील हा बोचक भगागे, मींधू के मुख्य लक्ष्य अपूर्ण.
समय अमर पचकौड़ हा भागत, आय युद्ध के क्षेत्र ला छोड़
मींधू ओला मरत कुदावत, हार जाय झन चलत जे होड़.
मरो जियो पचकौड़ हा तरकत, छत के अंतिम सिरा समाप्त
तंह पचकौड़ छत ले गिर जाथय, निकलिस लादीपोटा जीव.
मींधू हा धथुवा के रहिगे, पर ओकर मन मं संतोष-
मंय हा अस्त्र प्रयोग करेंव नइ, होगिस खतम पाप के मूल.
उंहचे माद्रक द्रव्य हे जतका, सबला करिस अपन अधिकार
सबो जिनिस दिस शासन हक मं, बाद गीस दुकली के द्वार.
दुकली अपन मकान मं हाजिर, एक व्यक्ति ओकर नजदीक
लगथय- ओहर आय गंवइहा, जेकर बचन सुहावन नीक.
मींधू हा ग्रामीण ला पूछिस -“”तंय हा फुरिया नाम मुकाम
दुकली से मतलब का तोला, इहां आय हस धर का काम ?”
दसरूखुद के परिचय देथय -“”मंय हा बसत करेला गांव
मोर नाम दसरूए सुन लव, अभी कुंवरबोड़का तन मोर.
तोला जम्मों भेद बताहंव, मंय हा फोर कहत सच गोठ
पर तोला बिलमे बर परिहय, छिन मं उठन पाय नइ कोठ.
हमर गांव के तिर सुन्तापुर, उंहचे एक धनी इंसान
ओकर धनवा नाम हे सुन ले, जेन श्रमिक पर करथय राज.
उहिच गांव मं एक अउ मनखे, झड़ी नाम ओकर तंय जान
ओहर जहां धान ला मींजिस, होगे एक अनख अस काम.
धान रास तिर झड़ी हा बइठे, नापत रिहिस कमइ के धान
ओकर तिर धनसाय हा पहुंचिस, झड़ी ला बोलिस टांठ जबान.
अपन बिखेद ला कार लमावंव, धनवा करदिस अत्याचार-
छीनिस झड़ी के धान ला जबरन, ऊपर ले मारिस चेचकार.
झड़ी तप करे जे वस्तू बर, ओहर होगे हाथ बेहाथ
चरिस वृद्ध ला फिकर के घुन हा, आखिर ठग दिस ओकर प्रान.
सुन्तापुर के तिर मं रहिथंव, झड़ी के संग मं रिश्ता मीठ
ओला नता मं मोसा मानंव, याने रिहिस मधुर संबंध.
मरे के पहिली मोला बोलिस -“”तंय करबे गत किरिया मोर
गंगा भले पहुंच झन सकबे, राजिम करबे अस के त्याग.”
अंतिम इच्छा रखिहंव कहि मंय जावत राजिम कोती ।
लेकिन इंहे रेलटेसन मं मोर कटागे खीसा ।।
जउन बखत नइ वाहन सुविधा, अस ठंडा होवय शिवनाथ
पुरखा के अस धर के जावंय, दुरिहा तिर के धनी अनाथ.
धथुवा गेंव बिना रुपिया मंय, जान सकत नइ राजिम तीर्थ
मंय शिवनाथ नदी अमरे हंव, निपटा देंव अपन जे काम.
तभे अचानक ताड़ परेंव मंय- उबुक चुबुक एक टूरी होत
नीरधार संग उहू बोहावत, बुझे चहत जीवन के जोत.
मंय हा तउर गेंव ओकर तिर, बाहिर लाय झींक के बाल
पूछेंव -“”कइसे नदी मं गिरगे, सच फुरिया घटना के हाल-
मरे के परीक्षा देवत हस, या दुख कारण देवत प्राण
या चलचित्र के अभिनेत्री अस, करत हवस तंय अभिनय झूठ?”
दुकली मोरे पर भन्नागे -“”होगे पूर्ण जिये के साद
तंय हा कहां मोर मन्सरुवा, चिभिक लगा के करत सवाल !
डाका परिस मोर इज्जत पर, मोर भविष्य कुलुप अंधियार
शीलहरण के कथा फइलगे, सत्य जान अपनाहय कोन !
मंय हा बिना अधर होगे हंव, मोर चरित्र घलो बदनाम
थुवा थुवा सब मनसे करिहंय, मरना उचित दिखत सिरतोन.”
“”तंय हा बुद्धिमान लड़की अस, कार करत कायर के काम
जग ला देखा-देखा के साहस, खींच शत्रु के जीयत चाम.
नीच के बुढ़ना ला झर्रा भिड़, करतब ले झन ले कल्दास
अपन जिन्दगी के उन्नति कर, मन मं करिहय शांति निवास.”
मंय उल्थना देंव दुकली ला, पर घेक्खर हा दीस उदेल
“लात के देव बात नइ मानय, सोच के थपरा गाल मं पोय.
भड़केंव -“”तोर जीव यदि जावत, मोला पकड़ लिही कानून
बला डार झन मोर मुड़ी पर, जीवन बचा फिकर ला फून.”
दुकली के चेचा पकड़ेंव अउ, ओकर घर मंय लाय बलात
यदि मंय हा कुछ कहत लबारी, दुकली ला पूछव सच तथ्य ?”
मींधू हा कोड़िया के पूछिस, दुकली करिस बात स्वीकार
दसरूके अब होत प्रशंसा – ओहर करे हवय उपकार.
मरिस अंजोरी ते घटना ला, मींधू हा फुरिया दिस साफ
दुकली के दुख हा अउ बढ़गे, दुब्बर पर दू ठक बरसात.
मींधू हा सब बात ला कहिदिस, दुकली हा खुद शक्ति संजोय
क्रूर कष्ट ले टक्कर लेवय, निज भावी बर लाय प्रकाश.
मींधू दसरूउहां ले निकलिन, तंह मींधू हा रखिस सलाह –
“”दुकली के जीवन राखे हस, तोर ले मंय हा खुश अंधेर.
मोर एक अउ बात ला सुन ले- तंय दुकली संग कर ले ब्याह
जोड़ी तुम्हर बने अस जंचिहय, कर स्वीकार बढ़ा उत्साह.
तंय हस दुकली पर आकर्षित, दुकली करत तोर संग प्यार
अगर तुम्हर रिश्ता जुड़ जाहय, जीवन हा चल जहय सुचारू.”
दसरूकथय -“”कथा इहि आवत, लड़की ला बचात हे तेन
ओकर साथ बिहाव रचाथय, या जोड़त बहिनी सम्बन्ध.
उहिच कथा मं मोला फांसत, तभो करत हंव मंय सिवकार
पर दुकली ला पूछ ले पहिली, ओकर मन मं काय विचार !
काबर के मंय हा देहाती – दुकली हा शहराती ।
अगर गांव के बिपत झेलिहय खावय मिल के बासी ।।
मींधू कथय -“”ठीक बोलत हस, सब झन लेत गांव के पक्ष
उहां बसे बर पोटा कंपथय, हर प्रकार मिलथय तकलीफ.
मंय हा दुकली ला पूछत हंव, तंहने खभर दुहूं मंय बाद
तुम दूनों के मन मं सुम्मत, जीवन ला मिलही उत्साह.”
दसरूहा खुश होके लहुटत, तंह बुल्खू संग होथय भेंट
दसरूहंसिस -“”शहर मं किंजरत, याद करे कर गांव के राह.
पहरूला तंय टकटक जानत, जेहर आय सड़क मजदूर
तोर याद ला मरमर करथय, ओकर संग कर ले मिल भेंट.”
बुल्खू कथय -“”खूब जानत हंव, पहरूकरत हे काबर याद
मंय हा डोंगरगढ़ अभि जावत, उहिच श्रमिक के धर के काम.
लेकिन असल बात का फोरंव – कृषिक श्रमिक के करत सहाय
पर चुनाव हा आथय तंहने, मंय हा खाथंव धोखा खूब.
याने मंय चुनाव जब लड़थंव, होथय जप्त जमानत मोर
उही किसान श्रमिक मन हा भिड़, मोर विरोधी ला जितवात.”
बुल्खू हा दसरूला छोड़िस, टेसन अमर बइठ गिस रेल
मनखे के हे भीड़ गंसागंस, जेला कहिथंय रेलमपेल.
लौह पांत पर रेल हा दउड़त, अंदर चलत टिकिट के जांच
जे मनसे तिर टिकिट हा नइये, टिकिट निरीक्षक हेरत कांच.
टिकिट निरीक्षक, फत्ते तिर गिस, ओला करिस टिकिट के मांग
फत्ते हा गिंगिया के बोलिस -“”साहब, सुन लव मोर बिखेद –
मंय हा रेल चढ़े बर आएंव, पर छुट के रेंगत हे रेल
टिकिट कटाय समय नइ पाएंव, बिना टिकिट बइठे हंव दौड़.”
टिकिट निरीक्षक गरजत बोलिस -“”जब गल्ती होगे हे तोर
तंय हा रुपिया हर्जाना भर, फिर गंतव्य अमर निर्बाध.”
फत्ते हा रुपिया ला गिन दिस, साहब भरिस अपन भर जेब
फत्ते ला रसीद नइ देइस, मानों रेल हा ओकर आय.
हाजिर उंहे पुरानिक मंसा, कथय निरीक्षक कड़ा अवाज –
“”तुम्मन मोला टिकिट देखावव, या नइ तब रुपिया गिन देव.”
मंसा कथय -“”बहुत निर्धन हन, तभे टिकिट कटवा नइ पाय
तोला रुपिया कहां ले देवन, हमर देख ले रीता जेब.”
टिकिट निरीक्षक रौब ला झाड़त -“”शासन ला तुम देवत हानि
याने तुम अपराध करत हव, तुमला मंय भिजवा हंव जेल.”
किहिस निरीक्षक ला बुल्खू हा -“”नोट पाय तेला धर लेव
मगर बेटिकट ला जावन दे, ओमन ला भेजव झन जेल.
या एमन ला जेल मं भेजत, तब तुम देवव काटरसीद
यात्री अउ तुम लाभ ला बांटव, या फिर पाव दुनों नुकसान.”
टिकिट निरीक्षक खखुवा बोलिस -“”तंय हा देख अपन भर काम
शासन के मंय काम करत हंव, ओकर बीच पार झन बेंग.”
तभे अधीक्षक साहब आथय, कथय निरीक्षक ला कर रोष –
“”बुल्खू तोर लाभ बर बोलिस, पर तंय कहां करे हस मान !
मोर ब्रह्म आज्ञा ला अब सुन- तंय फत्ते ले रुपिया लेस
ओकर फट रसीद ला काटव, शासन ला दे आर्थिक लाभ.
हें बिन टिकिट पुरानिक मंसा, उंकर टिकिट ला तंय हा काट
ओकर रुपिया तक ला तंय भर, ओमन ला दे प्राप्ति रसीद.
मंय हा तोर लाभ हित चाहत, तभे देंव कमसल अक दण्ड
अगर मोर कहना नइ सुनबे, होही तोर गंज नुकसान –
तोला मंय कर दुहूं निलम्बित, पाछू चल होबे बर्खास्त
इहां के यात्री तोर विरोधी, साक्षी बनहीं तोर खिलाफ.
तंय हा निरपराध अंव कहिबे, रक्षा बर रखबे कइ तर्क
लेकिन तोर नौकरी जाहय, मुड़ धुनधुन पछताबे खूब.”
टिकिट निरीक्षक पानी बनगे, धरिस अधीक्षक के सब बात
प्राप्ति रसीद चटापट काटिस, फत्ते ला अमरिस तत्काल.
अब बच गीन पुरानिक मंसा, उंकरो रुपिया ला भर दीस
टिकिट निरीक्षक के दुख कटगे, ओहर लेवत सुख के सांस.
डोंगरगढ़ हा आ जाथय तंह, बुल्खू उतर जथय तज रेल
होवत श्रमिक के बइठक जे तिर, ओतन जावत धर रफ्तार.
आगू तन मिल जाथय पहरु, बुल्खू कहिथय खलखल हांस-
“”दसरूअउ मंय भेंट करेन तब, खूब खाय हन चुगली तोर.
तंय कर क्रोध भगाते दुरिहा, पर सबले पहिली मिल गेस
तुम्हर श्रमिक के बैठक होवत, कतका टेम बचे अउ शेष ?”
पहरूकथय -“”तोर भर देरी, देखत श्रमिक तोर बस राह
तंय हा बइठक ठौर पहुंचबे, तुरुत कार्यक्रम के शुरुवात.
ए बिस्कुटक रगाबग जानत- दूल्हा आवत पकड़ बरात
स्वागत होथय भांवर परथय, पूरा होत बिहाव के नेंग.”
दूनों हंसत ठउर मं अमरिन, तंह होगिस पारित प्रस्ताव
रखिन श्रमिक मन मांग बहुत ठन, बलवन सुना दीस पढ़ साफ-
“”हम कमती वेतन पावत हन, वेतन होय वृद्धि भरपूर
हम्मन सकभर बासी खावन, बालक मन गुण शिक्षा पांय.
जलगस तन मं ताकत रहिथय, शासन लेत मरत ले काम
लेकिन जहां वृद्ध हो जाथन, नइ देवय पेंशन के नोट.
याने होय सुरक्षित जीवन, श्रम के बदला सुख ला पान
बरसा घाम काम ला करथन, तब ओकर संग सुख ला पान.”
तब सिलाल सुन्ता बांधिस – यदि हमर मांग नइ पूरा।
रजधानी मं हुल्लड़ करबो – चूरी फुटे के चूरा ।।
यदि शासन दुत्कार लगाहय, हम भिड़के करबो संघर्ष
करबो बाध्य टेक दे घुटना, झींक लान लेबो सुख हर्ष.”
जमों श्रमिक मन थपड़ी पीटिन, बुल्खू कथय रहव तुम शांत
जे उपाय मं तुम्हर भलाई, करिहंव मदद स्वयं श्रम जोंग.
एक बात के सुरता कर लव – हम्मन रखे अभी जे मांग
ढारा बइठक मं मांगे हन, होय निवेदन शासन पास.
चलव जमों झन कार्यालय मं, अधिकारी तिर पता लगान-
शासन हमर मांग ला मानिस, या फिर कर दिस अस्वीकार ?”
जमों श्रमिक मन उठ के जावत, लो.नि.वि. कार्यालय तन जल्द
उहां गीन तंह त्रिगुन लिपिक हा, उंकर पास खुद दउड़त अ‍ैस.
कहिथय त्रिगुन -“”बुता जब अरझत, तब हमला करथव बदनाम
लेकिन तुमला लाभ हा मिलथय, हमर जसी काबर नइ गाव !
गारी खाय हवन अतका दिन, पर अब परिवर्तन कर देव –
मुंह मिट्ठी बर मिठई खवावो, एकर साथ करव जयकार.”
पहरूकिहिस -“”बात नइ काटन, हम्मन शर्त करत स्वीकार
पर हम काबर मिठई खवावन, एकर कारण कहि दे साफ ?”
बोलिस त्रिगुन -“”इहां आए हव, अधिकारी तिर तुरते जाव
गुप्त भेद ला खोल बताहय, दिही उही हा शुभ संदेश.”
मंहगू अनुविभागीय अधिकारी, तेकर पास श्रमिक मन गीन
मंहगू हा मुचमुच मुसकावत, मानों श्रमिक के देखत राह.
मंहगू बोलिस -“”तुम्हीं श्रमिक मन, शासन तिर आवेदन देव
तुम्हर मांग पर तब शासन हा, करिस विचार बहुत गंभीर.
जेन मांग ला स्वीकृत देइस, ओला मंय फोरत हंव साफ –
तुम्हर मूलवेतन हा बढ़गे, याने बढ़गे प्रतिशत बीस.
एक बछर मं एके बोनस, घर बनाय बर ऋण बिन ब्याज
तुम्हर पुत्र मन शिक्षित होहंय, शासन लिही खर्च के भार.
पेंशन के बारे मं सुन लव- ओकर पर अभि चलत विचार
हवय भरोसा निश्चित स्वीकृति, तुम्हर भविष्य दिखत हे साफ.”
मंहगू हा प्रमाण नइ देइस बोलिस सिरिफ जबानी ।
बुल्खू ला शंका होइस तंह, पूछत मिट्ठी बानी ।।
कहिथय -“”साहब, तुम बोले हव, तेहर बस मुंह अखरा आय
यदि प्रमाण आंखी मं दिखतिस, तुम्हर बात होतिस विश्वास.”
होय श्रमिक के मांग हा स्वीकृति, ओकर आय हवय आदेश
ओकर प्रति ला मंहगू हेरिस, पढ़ के सुना दीस चट साफ.
कहिथय -“”अउ प्रमाण सच लेवव, तुम सब चलव मोर अनुसार-
वेतन वृद्धि होय जे रुपिया, ओला मंय हा निकला देंव.
तुम्मन त्रिगुन लिपिक तिर जावव, नगद नोट ओकर तिर लेव
रिता खिसा ला खसखस भर लव, इहां ले हांसत वापिस जाव.”
सुनिन श्रमिक मन खुशखबरी ला, अचरज मिश्रित होवत हर्ष
गीन श्रमिक मन त्रिगुन के तिर मं, ओकर तिर ले रुपिया लीन.
बोले त्रिगुन मिठई लाने बर, ओकर अर्थ समझ अब आत
पाय श्रमिक मन लाभ मं रुपिया, बोले हवय त्रिगुन हा ठीक.
जमों कमइया के मन खुश हे, उहां ले निकलिन धरथंय राह
बुल्खू कथय- “”जउन बोलत हंव, ओला रखव बांध के गांठ –
हक मांगे बर हे हक तुम्हरे, लेकिन साथ रखव मन धैर्य
पता करव वाजिब स्थिति तब, ओकर बाद धरव तुम राह.
अभिच अगर हालत जाने बिन, कर देतेव अनशन हड़ताल
साथ मं रुपिया हाथ मं मिलतिस, तुम फोकट होतेव बदनाम.
कहितिन लोग – श्रमिक झगड़ालू, इनकर पक्ष भूल झन लेव
एमन झोरत नंगत रुपिया, तभो जोम कर लड़ई उठात.”
पहरूकिहिस -“”ठीक बोलत हस, नेक सलाह आज तंय देस
तोर बात ला सुन रेंगे हन, शांति साथ निपटिस सब काम.
जब सब काम खुशी मं निपटिस, अब मंय रखत अपन प्रस्ताव-
जब हम डोंगरगढ़ आये हन, एक काम शुभ अउ कर लेन.
इहां हवय प्रकृति के मंदिर, जेकर नाम सुयश विख्यात
ओकर दर्शन चलके कर लव, अइसन बखत फेर नइ आय.”
जमों श्रमिक धार्मिक स्थलगिन, हर्षित होत देख के बाग
कतको किसम फूल फल बेला, मन ला मोहत देत सुगंध.
चिरई उड़त चिंवचिंव नरियावत, भौंरा फुरफुन्दी उड़ियात
शेर मंजूर भठेलिया हरिना, दउड़त खूब कदम्मा मार.
किंजरत उहां दर्शनार्थी मन उंकर हृदय खुशियाली ।
चिंता मुक्त प्रफुल्लित हे मन हरा भरा हरियाली ।।
सब मजदूर मूर्ति के तिर गिन, प्रकृति मां के दर्शन लेत
ओकर रुप करत आकर्षित, रुप कर्म के दू ठक रंग.
देवी दिखिस एक कोती ले- मुसकावत देवत हे स्नेह
दूसर डहर क्रोध हा भड़कत, घृणा करत पहुंचावत हानि.
रिहिस पुजारी तेकर तिर मं, रखिस सिलाल हा कड़ा सवाल-
“”भइया, हमला राज ला फुरिया, प्रकृति के काबर दू रुप ?”
किहिस पुजारी हा कोमल स्वर -“”देखत हवस तेन सच आय
प्रकृति के स्वरुप दू होथय, जइसे सत्य करूअउ मीठ.
एके हाथ अस्त्र विस्फोटक, जेहर करथय नष्ट तबाह
ज्वालामुखी प्रलय दुर्घटना, सूखा बाढ़ मृत्यु भूकम्प.
दूसर हाथ फूल अन राखे, जेहर बांटत जीवन प्राण
औषधि अन्न सुकाल सुवर्षा, सुख सम्पन्नता खनिज पदार्थ.”
तभे अ‍ैस बेदुल उनकर तिर, जेहर करत क्रांति के काम
मनखे के जमघट ला देखिस, क्रोध देखाथय बन के क्रूर.
ओमन ला सम्बोधित करथय -“”भरे तुम्हर मं अति अज्ञान
रूढ़ीवादी अंधविश्वासी, बिन उद्देश्य चलत हव राह.
प्रकृति ला देवी मानत हव, करथव पूजा आंखी मूंद
जेहर भौतिक रुप मं हाजिर, देवत हव आध्यात्मिक रुप.
इही किसम ईश्वर नइ होवय, सच मं ओकर नइ अस्तित्व
पर ईश्वर पर करत भरोसा, अउ अस्तित्व करत स्वीकार.
याने तुम गल्ती रद्दा पर, पर ला घलो करत पथभ्रष्ट
एकर फल तो मिलना चहिये, तुम सब हवव मरे के जोग.
तुम्हर जान के मृत्यु हो जाहय, खबर पहुंचिहय सब के पास
ओमन तुम्हर राह नइ धरिहंय, रुढ़िवाद के करिहंय त्याग.”
बेदुल पास शक्तिशाली बम, तेकर करना चहिस प्रयोग
तभे अ‍ैस बुल्खू ओकर तिर, बन के नम्र निकालिस बोल-
“”करत भरोसा मंय तोर ऊपर, मोला तंय जानत हस खूब
कारागृह मं बंद रेहेंव मंय, मोर साथ तंय करे निवास.
मोर बात सुन चिभिक लगा के, अपन हृदय मं करव विचार
तंय बम के उपयोग ला झन कर, झन हो पाय नष्ट विध्वंश.”
बेदुल किहिस -“”पूर्व परिचित हस, तब मंय करत तोर सम्मान
जेन तथ्य तंय रखना चाहत, मोर पास मं रख दे खोल.”
बेदुल के तिर विध्वंशक बम, रोक दीस ओकर उपयोग
जब विध्वंश त्राहि हा रुकगे, बुल्खू हा अब रखत सुतर्क –
“”ठंउका मं प्रकृति हा सच ए, ओकर मं समाहित संसार
ओकर मान करे बर परिहय, श्रद्धा होय या लागय क्रोध.
एक गोठ ठंउका बोले अस- ईश्वर के नइये अस्तित्व
ओहर कभु जग मं नइ आइस, कोई ला दर्शन नइ दीस.
ईश्वर ला खोजे बर जावव, मर मर जोंगव पूजा पाठ
ओकर साथ भेंट नइ होवय, तुम्हर उदिम बह जाही व्यर्थ.
लेकिन एक बात हे एमां, मानव के मन मं विश्वास
ईश्वर के अस्तित्व हा नइये, तब ले करत बहुत विश्वास.
यदि विश्वास होत हे खण्डित, मनसे धरिहय आस्तिक रुप
हमर साथ झगरा मं भिड़िहय, हमर नाम मं नास्तिक रुप.
जउन जिनिस मानव सिरजाथय, ओकर साथ करत हे प्रेम
कोई ओकर करत हइन्ता, मानव करत युद्ध कर क्रोध.
एकर ले उत्तम ए रस्ता – ईश्वर ला मानत हे जेन
ओकर झन आलोचना होवय, ओला करन देव विश्वास.
जेहर ईश्वर ला नइ मानत, ओकर हम झन कर विरोध
ओहर ईश्वर ला मानय कहि, हम हा कभु झन करन दबाव.
एकर ले फल लाभ मं मिलिहिय, नइ हो पाय लड़ई तकरार
आपुस मं सहयोग मित्रता, सुख ला पाहय जमों समाज.
खुद ला उच्च प्रमाणित होए, पर ला देन हानि बदनाम
यद्यपि लाभ पाय थोरिक छिन, लेकिन बाद गलत अन्जाम.
धार्मिक पुस्तक ला बारे हन, एहर घलो कुजानिक काम
पहिली के इतिहास बताथय, ओकर ले हम पात विकास.
“मूर्ति टोरबो मंदिर गिरवा, करे हवन निर्दयी अस गोठ
हमर विरुद्ध गीन सब कोई, खुद के शत्रु बनेन निज हाथ.
आस्तिक नास्तिक बन के झगरत, हम खुद पावत हन नुकसान
तर्क कुतर्क परे रहिथन तब, अपन हाथ जाथन शमसान.
कोनो हा आस्तिक नइ होवय, अउ कोनो नइ नास्तिक ठोस
कर्म समय उद्देश्य हा बदलत, बस ओकर अस वाद विचार.
जे मनसे हा आस्तिक होथय, यदि ओहर मंदिर नइ जाय
ओहर पूजा पाठ करय नइ, तभो कहाहय आस्तिक शुद्ध.
नास्तिक मन मंदिर जा सकथंय, संस्कृति कला करे बर ज्ञान
धार्मिक पुस्तक ला पढ़ सकथंय, जाने बर पूर्व के इतिहास.
हर के आस्था मानवता पर, करथंय सब प्राणी पर प्रेम
ककरो अहित भूल नइ सोचंय, चलथंय सदा नीति के नेम.
चन्दा बेर कुथा कूथा हें, एक गरम हे दूसर जूड़
देवत सुरुज लकालक गरमी, चंदा देवत शीतल शांति.
लेकिन दूनों झन ऊथंय तब, जग के करथंय शुभ कल्याण
दूनों के आवश्यकता हे, दूनों बिन हे जग अंधियार.
आस्तिक नास्तिक शत्रु कहाथंय, ऊपर दिखथय खाई।
मगर भेद एकोकन नइये, दूनों हें सग भाई ।।
बुल्खू हा बेदुल ला बोलिस -“”धरे हवस तंय घातक चीज
घेक्खर बन प्रयोग यदि करबे, पावन ठौर बिछत हे लाश.
एकर अर्थ साफ अब झलकत- शोषक देख डरत दम तोर
तंय संघर्ष से घबरावत हस, तभे धरत हत्या के राह.
तंय हा खुद मं अउ दूसर मं, समझत हस नंगत अक भेद
खुद ला कथस क्रांतिकारी अउ, पर ला शोषक जग के भार.
तभे मचाना चहत तबाही, पर मन शुद्ध ले करव विचार
दूसर तोर भेद कुछ नइये, ना तंय ऊंच ना ओमन हीन.
अइसे मं यदि बम ला पटकत, दूसर मन के खत्तम मौत
लेकिन तंहू बचन नइ पावत, उंकर साथ मं तोरो मौत.
तंय मंय पिनकू जेल मं बंदी, उहां बनाय नेक अस नीति –
हिंसा तज लड़बो दुश्मन संग, तभे पहिरबो जीत के हार .
मोर बात ला अंदर मन मथ, ओकर बाद सत्य खुद खोज
मंय विश्वास तोर पर राखत- मोर बात नइ सकस उखेल.”
बुल्खू के सलाह हा जंचथय, तंह बेदुल के लहुटिस चेत
बम ला लुका बैग मं रखलिस, बम उपयोग रुकिस तत्काल.
बेदुल कथय- “”चहत हस तंय हा- छोड़ंव हिंसा खून के राह
किरिया खाय बाध्य नइ लेकिन, करिहंव उदिम अमल मं लाय.”
एकर बाद श्रमिक बेदुल मन, वापिस जाय हटा दिन गोड़
बुल्खू रेल्वे स्टेशन जावत, मगर बीच दुर्घटना एक.
आगुच मं हठील आ जाथय. जेकर हाथ एक पिस्तौल
कहिथय – “”जननेता अंव कहिथस, कहां भगागे जनता तोर ?
खुद के जीवन बचा रखे बर, अपन सहायक मन ला लान
छेरकू ले दुश्मनी रखत हस, तब मंय लेत तोर अब प्राण.”
बुल्खू हा अचरज भर देखत- कते डहर के संउहत काल
यद्यपि हृदय कंपकंपी होवत, मगर वचन ला ढिलत सम्हाल-
“”मंय छेरकू ले हार खाय नइ, पर घुटना टेकट हंव आज
ओहर सम्मुख आय ले भागत, लेकिन अपन काम करवात.
मंत्री के विरोध मंय करथंव, ओहर बस सैद्धान्तिक आय
मंय हा पर ला कभु नइ भेजंव – ओकर बुता दे जीवनदीप.
पर तंय उभरउनी ला मानत, तब मंय बात रखत बस एक-
जब तंय जीवन देन सकस नइ, काबर ककरो जीवन लेत ?”
बुल्खू केंघर मरत समझाइस, पर हठील पर चढ़े हे जोश
ओहर अब पिस्तौल चलावत, झेलत हे बुल्खू निर्दाेष.
बुल्खू कटे वृक्ष अस गिरथय, बाद निकलगे ओकर जीव
जे दूसर ला जीवन बांटिस, खुद चल दिस हिंसा के गाल.
“जेहर पर बर खोधरा कोड़िस, मगर एक दिस खुद गिर गीस’
ए लोकोक्ति समझ मं आवत, फल ला पैस कर्म अनुसार.
पर जे फूल छितत रद्दा पर, कांटा टूटत ओकर पैर
जेन कर्म ले रहत अहिंसक, ओकर तन के हत्या होत.
एमन जनहित काम ला जोंगिन, झेलत कार दुखद परिणाम ?
अगर विश्व मं कोई ज्ञानिक, न्याय साथ दे एकर ज्वाप ?
छेरकू तिर हठील हा पहुंचिस, उहां बता दिस जम्मों हाल
छेरकू हा प्रसन्न हो जाथय- ओकर अरि के खुंटीउजार.
एक विदेशी उंहचे पहुंचिस, कहिथय -“”तंय हा करे पुकार
तब मंय तोर पास आये हंव, मोर काम ला कर दे पूर्ण.
भारत के रहस्य जतका अस, अति महत्व के दस्तावेज
आर्थिक भेद महत्व के जगहा, जमों सूचना नक्शा चित्र.
लेकिन एक बात तंय फुरिया – रहिथय गुप्त इंकर सब भेद
तब तंय कहां ले देवन सकबे, पहिली मिटा दे शंका मोर.”
छेरकू बोलिस -“”शंका झन कर, मोर बात पर कर विश्वास
मंय मंत्री अंव पद ऊंचा हे, मोर पास हे जम्मों भेद.
ले मंय अभी तोर बूता ला कर देवत झप पूरा ।
तोर मोर मंसा पूरा तंह बाजय खुशी तमूरा ।।
देखव छेरकू के करनी ला, देवत हे भारत के भेद –
एहर चहत मान यश रुपिया, भले देश होवय खुरखेद.
सैनिक केन्द्र रहस्य जे आर्थिक, महानगर इस्पात संयत्र
संसद अन्नागार विमानन, देश के जम्मों गुप्त रहस्य.
धरिस विदेशी नक्शा फाइल, तभे अचानक मींधू अ‍ैस
ओला देखिन जब तीनों झन, उंकर संख उड़ियागे सांय.
मींधू हा हठील ला बोलिस -“”शिक्षा पाय दुनों झन साथ
तेकर कारन प्रेम करत हंव, मोर बात पर तंय रख माथ.
तंय अपराध करे हस कइ ठक, पर अब ओमां मार विराम
तंय कानून साथ झन अब लड़, आत्मसमर्पण कर तत्काल.
यद्यपि मंय पिस्तौल धरे हंव, पर नइ चहत करंव मंय खून
एक बार आदत जंह परथय, तंहने बढ़त ऊन के दून.”
कथय हठील -“”मान लेवत हंव, काबर के मंय अभि मजबूर
यदि तंय आते बस एके झन, मिला के मंय रख देतेंव धूर.
मगर तोर संग आरक्षक दल, जेमन धरे हवंय बन्दूक
तोर बात यदि जड़ ले उदलत, ओमन दिहीं धड़ाधड़ धूंक.”
छेरकू अउर विदेशी मन बर, खुद आगीस लाभप्रद टेम
ओमन जीव बचाके खसकिन, अउ हठील केंघरत गोठियात.
टेकत हवय बात मं घुटना, लेकिन चढ़े खून के रोष
फट हठील पिस्तौल निकालिस, मींधू ऊपर कर दिस वार.
मींधू ला गोली जंह लगथय, कटे वृक्ष अस गिरिस धड़ाम
आरक्षक मन धथुवा देखत, उंकरो अब तक सुन्न दिमाग.
पिलू आरक्षक होश मं आथय, तानिस तुरुत अपन बन्दूक
अउ हठील पर बांध निशाना, ओहर दीस धड़ाधड़ धूंक.
मर जाथय हठील कुछ छिन मं, मींधू घलो त्याग दिस प्राण
हत्या करिस एक झन मनखे, मगर एक होवत बलिदान.
पुलिस विभाग हा गारी खाथय, उही विभाग हवंय कई लोग-
होत देश बर स्वयं खतम पर, अपराधी के टोरत रीढ़.
दू प्रकार जन जग मं दिखथंय – रक्षक भक्षक झूठ ईमान
सेवक स्वार्थी गंध सुगंधित, नेकी बदी मुरुख विद्वान.
पाप पुण्य उपजाऊ मरुस्थल, अन बिख जड़ चेतन दिन रात
क्रांति शांति द्रोहिल जनसेवक, अलग अलग गुन ठंडा तात.
कर्म भेद कारण यश अपयश, मींधू के होवत तारीफ
पर हठील के सुरता आवत, तंह मनखे मन थुंकत खखार.
मींधू के बारे मं बोलत – ओहर जनहितकारी ।
पर हठील पर शोक करत नइ, सब झन देवत गारी ।।

८. अरसी पांत समाप्त

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