छत्तीसगढ़ी नवगीत

चलव गीत ल गा के देखन,

चलव गीत ल गा के देखन,
अंतस ल भुलिया के देखन।

सुख अउ दुख तो आथे-जाथे,
कभू हँसाथे कभू रोवाथे।
मन के पीरा ला मीत बना ले
अपने अपन वो गोठियाथे।
ये सब के पाछू मा का हे ?
चिटिक हमू फरिया के देखन।

चार दिन बर चंदा आथे
फेर अँधियारी समा जाथे
ये जिनगी के घाम-छाँव हर
दुनिया भर ला भरमाथे।
जिनगी के मतलब जाने बर
दुख-पीरा टरिया के देखन।

जिनगी सरग बरोबर होथे
सुख हर जब सकला जाथे
मन उछाहित हो जाथे जब
बिछुरे कोनो अपन मिल जाथे
ये जिनगी के नार-फाँस ला
थोरिक हम धिरिया के देखन।

सावन-भादो म रुख-राई मन
पानी पा के हरिया जाथे
चिरई-चिरुगुन, फाँफा-मिरगा
हाँस-हाँस के गीत सुनाथे।
मुरझाये जिनगी ला संगी
चलव हमू हरिया के देखन।

बलदाऊ राम साहू

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *