छत्तीसगढ़ी नवगीत : पछतावत हन

ओ मन आगू-आगू होगे
हमन तो पछवावत हन
हाँस-हाँस के ओ मन खावय
हमन तो पछतावत हन।
इही  सोंच मा हमन ह बिरझू
अब्बड़ जुगत लखायेन
काँटा-खूँटी ल चतवार के
हम रद्दा नवा बनायेन।
भूख ल हमन मितान बनाके
रतिहा ल हम गावत हन।
मालिक अउ सरकार उही मन
हमन तो भूमिहार बनेन
ओ मन सब खरतरिहा बनगे
हमन तो गरियार बनेन।
ढोकर-ढोकर के पाँव परेन
मुड़ी घलो नवावत हन।
उनकर हावै महल अँटारी
टूटहा हमर घर हे
उनकर छाती जब्बर हे चाकर
देह हमर दुब्बर हे।
ओ मन खावय भूँकर भूँकर के
हमन तो मिमियावत हन।
बलदाऊ राम साहू 
94507650458

संघरा-मिंझरा

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