नवगीत : गाँव हवे

तरिया-नरवा, घाट-घटौदा,
सुग्घर बर के छाँव हवे
हाँसत-कुलकत दिखथे मनखे
अइसन सुग्घर गाँव हवे।
खेत-खार हे हरियर-हरियर
सुग्घर बखरी-बारी हे
लइका मन हे फूल सरीखे
घर-द्वार कियाँरी हे।
मिहनत करे गजब किसान
चिखला बुड़े पाँव हवे।
हँसी-ठिठोली हम जोली संग
गाये गीत ददरिया
कौनो दिखथे गोरा-नारा
कौनो दिखथे करिया।
सुख-दुख हावै गंगा-जमुना
मया-पिरित ठाँव-ठाँव हवे।
जात-धरम के भेद भुला के
सब संग मीत-मितानी हे
सरमरस बन के जीना-मरना
गाँव के सुग्घर कहानी हे।
बड़े बिहनिया चिरई ह गाथे
अउ कँऊवा के काँव हवे।
बलदाऊ राम साहू

संघरा-मिंझरा

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