नवगीत : अगर न होतेन हम

करिया-करिया बादर कहिथे
अगर न होतेन हम।
धरती जम्मो बंजर होतिस
जल हो जातिस कम।

हमर आए ले तरिया-नरवा
जम्मो ह भर जाथे,
जंगल-झाड़ी, बन-उपवन मन
झूम-झूम हरसाथे।
कौन हमर तासीर ल जाने
जाने कौन मरम?
करिया-करिया बादर कहिथे
अगर न होतेन हम।

मनखे मन हर काटत हावै
रुख-राई ल जब ले,
हमर आँखी मा आँसू रहिथे
रूप बिगड़गे तबले।
मोर पीरा ल समझे नहीं,
फूटे उँकर करम।
करिया-करिया बादर कहिथे
अगर न होतेन हम।

परियावरन रही बने जी
सुग्घर दिन तब आही
मेचका, मछरी अउ चिरई मन
गीत हरेली गाही
अउ अगास मा बिजुरी नाचही
ढोल करे ढम-ढम।
करिया-करिया बादर कहिथे
अगर न होतेन हम।

बलदाऊ राम साहू

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