चुनावी लघुकथा : बुरा न मानो …… तिहार हे

एक – तैं कुकुर
दूसर – तैं बिलई
एक – तैं रोगहा
दूसर – तैं किरहा
एक – तैं भगोड़ा
दूसर – तैं तड़ीपार
एक – तैं फलाना
दूसर – तैं ढेकाना ………
गांव के मनखे मन पेपर म रोज पढ़य। अचरज म पर जावय के, अइसन एक दूसर ला काबर गारी बखाना करथे। ओमन सोंचय, अइसन न हमर सनसकिरीति, न सुभाव। तभे गांव गांव म, फोकट म चऊंर बांटे के, घोसना होय लगिस। पेटी पेटी चेपटी, आये लगिस। कपड़ा लत्ता बांटे बर, गांव गांव म होड़ मचे रहय। रात दिन ढोल नंगाड़ा के अवाज सुनई दे लगिस। गांव के सियान मन जान डरिन के कन्हो तिहार आगे। लइका मन, गांव के सियनहा ला पूछथे – तिहार आये हे कथव त, तिहार म, एक दूसर ला गारी बखाना काबर ? सियनहा बतइस – जइसे होली तिहार म, एक दूसर ला गारी बखाना करके, बुरा न मानो कहिके, गला मिलथन अऊ सांझ होवत ले खा पी के एकमई होके मजा करथन, तइसने पांच बछर म एक बेर, चुनई तिहार आथे, जेला मनइया मन, एक दूसर ला ससन भर के बक बुकाके, एक जगा जुरिया के, बुरा न मानों ……… कहत, गला मिलथें अऊ पांच साल तक, तिहार के मजा भोकथें।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

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