कहूं नंदा झिन जावय चिट्ठी के मया, दुलार अउ अगोरा

बिस्व म हरम भारत देस सबले जुन्ना संसकिरीती हे अउ जिहां संसकिरीती हावय उंहा सभियता हावय। अउ जिहां सभियता हावय उंहा लोगनमन के भावना ल दूरिहा म बसे अपन सगे-संबंधी मन ल संदेसा पहुंचाये के बेवस्था रहिस। जेह जईसे-जईसे दिन जात गईसे वईसनहे बदलत गिस।
पहिली दूत भेजे के परंपरा रहिस। तेत्राजुग म भगवान राम ह रावन करा माता सिता ल सनमान सहित भेजे बर अउ जुध के नर संहार रोके बर पहिली हनुमान जी ल फेर अंगद जी ल पढोथे। वईसनहे दुआपरजुग म जब किसन भगवान ह गोकुल के लीला करके मथुरा चल देथे त जसोदा ह देवकी बर संदेसा संबदिया करा पढोथे।
फेर 300 बछर पहिली आज के जमाना असन संचार के साधन मोबाईल, इंटरनेट, समाजिक माध्यम नी रहिस। आज के जईसे चिकन-चिकन रद्दा रहिस न रेलगाड़ी रहिस न पानी जहाज न हवई जहाज न टेलीफोन न घोड़ा गाड़ी जेखर ले अपन संदेस,परेम,अस्नेह अउ अपन भावना ल तुरते या दिनभर म दूर बईठे दाई-ददा, बहिनी-भाइ अउ अपन घरवाली अउ लईकनमन के हालचाल जान लेतेन। पहिली तीज-तिहार म मईके के लेवाल ह पहुंचत-पहुंचत म पहुंचे।
राजा मन के जमाना म परेवा ल संदेसा भेजे बर राखे रहय उहू परेवा घलो बने दिमाक वाला चिरई ये,जेहा जेन रद्दा ले जाये रईथे वई रद्दा ले वापस घलो आ जाथे। वोखर बाद परेवा के अस्थान ल संवदिया ले लिहिस। जे ह जेखर संदेसा ल लेके जिहां जाय बर रहय उंहा वईसनहेच हाव-भाव म संदेसा ल देवय। जब डाक-तार के जमाना आईस त संवदिया घलो नदागे।
डाक खाना के इतिहास भारत म-जब हमर देस ह अंगरेजमन के गुलाम रहिस त-
ऽ बछर 1766 लार्ड क्लाइव ह पहिली डाक बेवस्था अस्थापित करिस।
ऽ बछर 1774 वारेन हेस्टिंग ह कलकत्ता म पहिली डाकखाना अस्थापित करिस।
ऽ बछर 1786 मदरास म परधान डाकखाना अस्थापित होईस।
ऽ बछर 1793 बंबई म परधान डाकखाना ल अस्थापित होईस।
ऽ बछर 1854 भारत म पोस्ट आपिस 1 अक्टूबर देस के महत्व के रूप म घोसित करे गिस।
ऽ फेर रेल डाकखाना,पोस्टकारड,लिफाफा, अंतरेदसी, मनीआडर सेवा सुरू होईस।
ऽ बछर 1972 पिनकोड सेवा सुरू करे गिस चिट्ठी ह सही जगह जाये लगिस अउ डाकखाना के एक पहिचान बन गिस।
ऽ फेर स्पीड पोस्ट के सुरूवात होईस अउ फेर आज के डाकखाना हमन ल दिखथे जमाना के साथ।
हमुमन जब ददा के नउकरी के जगह म रईके पढ़त रहेन त हमर ममा के चिट्ठी पहिली पहुंच जावे अउ परीछा के टाईम टेबल पाछू। अपन चिट्ठी म ममा लिखे रहय दीदी भाटों अउ भांचा-भांची ल पा लागी, कोन दिन परीछा खतम होवत हे गरमी के छुट्टी बर ले हे कब आव चिट्ठी मिलत ही चिट्ठी लिखिहा, तुहर चिट्ठी के अगोरा म तुहर ममा। त हमर खुसी के ठिकाना नई रहत रहिस। (दीदी-भांटो के संगे-संग भांचा-भांची के गोड़ परे के परंपरा, भगवान राम के हमर छत्तीसगढ़ देसराज म ममा घर हावय त ये परंपरा तेत्राजुग ले चले आवथे।) अउ जब गरमी के छुट्टी खतम होत्ती आय त ददा के चिट्टी आ जाय के अब इस्कूल खुले के दिन लकठियागे हे कब आव ले बर त हमन के मन ह दुखी हो जाये के अब ममा घर ले अपन देस राज फेर जाय बर पढ़ही पर पढ़ाई घलो तो जरूरी हे। अउ ओती ममा मन दीदी के राखी के लिफाफा पहुंचे के अगोरा म रद्दा देखत रहय। अब तो ममा ह फोन म तुरते गोठ करके पूछ लेथे के भांटो दीदी ल तीजा, भाई जुतिया म लेहे बर कब आवव। कहे के मतलब ये हावय के अब जमाना बदलत हे पर हमन ल अपन परंपरा अउ बिरासत ल बचाये रखना हे।

निदा फाजली के एक सायरी याद आथे।
डाकिया करे जादू महान, एक ही थैली में रखे आंसू और मुस्कान।

अब डाकिया ह कभू-कभार हमर घर आथे काबर के हमन जिहां रईथन उहां के पारा-मोहल्ला म हमन जुन्ना हो गे हन त डाकिया ह हमर घर, आने के पता पूछे बर जरूर आथे। अउ धनियबाद देके चल देथे। हमूमन जब कालेज करके नौकरी-चाकरी बर कईयोें जगह फारम भरे बर रजिस्टरी,स्पीड पोस्ट करन। रेलवे के नउकरी म पोस्टल आडर बर पोस्ट आपिस म लाईन लगे रहन। पा गेन त ठीक नई तो आने दिन आके लाईन लगावन।

अईसे सुरू होईस डाक दिवस मनाये के परंपरा के – बिस्व म आपसी संचार न बढ़ावा देहे बर 09 अक्टूबर 1874 के स्वीटजरलेंड म यूनिवरसल पोस्टल यूनियन के अस्थापना होइस। ते दिन ल 9 अक्टूबर बछर 1969 ले बिस्व डाक दिवस मनाये जाथे। हमर देस भारत घलो म 10 अक्टूबर के दिन ल रास्ट्रीय डाक दिवस मनाये जाथे। अउ 9 से 14 अक्टूबर के बीच म भारतीय डाक बिभाग ह बिस्व डाक सप्ताह मनाथे। कहे के मतलब ये हावय के आज 165 बछर ले भारत अउ बिदेस घलो म सबके सुख-दुख के संदेसा पहुंचाने वाला डाकिया चिट्ठी, तार, अंतरदेसी, लिफाफा, राखी, पारसल, मनीआडर डाकखाना ह कहूं नंदा न जावे। अब लोगनमन रजिस्ट्री, स्पीड पोस्ट म जादा भरोसा करथे काबर के साधारन डाक देरी ले पहुंचथे। अब लोगनमन चिट्ठी-पतरी नई लिखय पर सरकारी काम-काज ह आजो डाक बिभाग के महत्तम ल बनाये रखे हावय। आज के जुग म ई-मेल ले तुरते ओखर मोबाईल अउ लेपटाप, कम्प्यूटर म संदेसा ह पहुंच जावथे। बाकी काम ल आज आनी-बानी के एप म घलो संदेसा भेजावथ हे। भले आज आनी-बानी के इलेक्टरानिक मसीन से संदेसा भेजावथे पर चिट्ठी के ओ मया-दुलार, असीस-परेम, मन के भावना अउ अगोरा ल ये मसीन नी पाय।

प्रदीप कुमार राठौर  ‘‘अटल’’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

संघरा-मिंझरा

Leave a Comment