छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

एक बेर मदिरालय मा, आ जातेस उप्पर वाले।
दरुहा मन ल बइठ के तैं समझातेस उप्पर वाले।

जिनगी के बिस्वास गँवागे ऊँकर मन म लागत हे,
मिल-बइठ के अंतस मा,भाव जगातेस उप्पर वाले।

हरहिंसा जिनगी जीये के भाव कहाँ समझथे ओमन,
सुख-दुख संग जीये के तैं आस बँधातेस उप्पर वाले।

तँही हर डोंगहार अउ डोगा के चतवार तँही हस,
बुड़त मनखे ला तैं हर, पार लगातेस उप्पर वाले।

दरुहा =शराबी, गँवागे =गुम गया, हरहिंसा =निश्चिंत; चतवार=पतवार, हस= हो, डोंगहार =नावीक, डोंगा= नाव, बुड़त =डूबते हुए।

बलदाऊ राम साहू

संघरा-मिंझरा

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