धन-धन रे मोर किसान

धन-धन रे मोर किसान
धन-धन रे मोर किसान

मैं तो तोला जानेव तैं अस,
तैं अस भुंइया के भगवान।
तीन हाथ के पटकू पहिरे
मूड मं बांधे फरिया
ठंड-गरम चऊमास कटिस तोर
काया परगे करिया

कमाये बर नइ चिन्हस
मंझंन सांझ अऊ बिहान।
तरिया तीर तोर गांव बसे हे
बुडती बाजू बंजर
चारो खूंट मं खेत-खार तोर
रहिथस ओखर अंदर

इंहे गुजारा गाय-गरू के
खरिका अऊ दइहान।

तोर रेहे के घर ल देखथन
नान-नान छितका कुरिया
ओही मं अंगना ओही मं परछी
ओही मं सास बहुरिया
एक तीर मं गाय के कोठा
ओखरो उपर म हे मचान।

बडे बिहनिया बासी खाथस
फेर उठाथस नांगर
ठाढ बेरा ले खेत ल जोंतथस
मर-मर टोरथस जांगर
रिग बिग ले अन्न उपजाथस
कहां ले करौं तोर बखान
धन-धन रे मोर किसान।

– गीतकार : स्व. द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’



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