दीया अउ जिनगी

अँजोर के चिन्हारी दीया हा हरय। बिन दीया के अंधियारी ला हराना बड़ मुसकुल बुता हे। अंधियारी हे ता दीया हे अउ दीया हे ता अँजोर हे। अंधियारी हा जब संझा के बेरा होथे ता अपन पसरा ला धीरे-धीरे पसराथे अउ जन मन ला अपन करिया रंग मा बोरथे। जभे अंधियारी हा जन मन ला मुसकुल मा डारथे तभे सबला दीया के सुरता आथे, दीया बारे के सुरता आथे। दीया हा जर-जर के अंधियारी ला खेदथे अउ अँजोर ला बगराथे। अँजोर बगरथे, बिहनिया होथे ता जम्मो झन मन हा दीया ला भूला जाथे। फेर एखर ले जादा दीया ला दुसर के दुख पीरा ला हरे मा जादा खुशी मिलथे। अइसने मनखे ला कखरो मुसकुल ला हरे मा जादा खुशी होना चाही।
मैं हा एक ठन नान्हें दीया ला रोज संझौती बेरा तुलसी चौरा मा बरत आँखी भर देखँव। वो नान्हें दीया के तेल हा धीरे-धीरे सिरावत जाय अउ दीया मा लगे बाती हा धीरे-धीरे जर-जर के घपटे अंधियारी ला भगावत जाय।अँजोर खातिर दीया के बलिदान ला रोजेच देखँव। फेर एक दिन मैं हा वो नान्हें दीया ले पूछ पारेंव के तैं हा अपन जिनगी भर पर बर अँजोर बगराथच, पर ला रद्दा देखाथच, ए तोर जिनगी हा परहित मा सिरा जाथे फेर तोला का मिलथे? तोला का कोनो मान-गउन, सहीं ठिकाना मिलथे? तेल सिरागे बाती बरगे तहाँ ले तोला कोन पुछथे? नान्हें दीया हा अपन गुरतुर भाखा मा मोला कहीच- सुन संगी रे ए लोक मा जौन जनम धरे हावय ओखर मिरित्यु घलाव अटल हावय। हमन मिरित्यु ला काँहीं उदिम कर लीन फेर टारे नइ टरय। फेर मरे के पहिली एक ठन बुता खच्चित कर सकथन के अपन जिनगी ला पर बर खुआर कर दीन। परहित मा अपन सरी खुशी ला तियाग दीन। इही करम मा जादा खुशी हावय। इही मा जिनगी के सार हे अउ नइ ते सरी जिनगी बेकार हे। नान्हें दीया हा बिदा होय के पहिली एकेच ठन गोठ ला गोठियाइच के ए जिनगी के असल धरम करम खुद ला खुआर करके अंधियार ला खेदे मा हे। अपन आप ला जरो के पर पीरा ला हरे मा जादा सुख अउ शाँति हे।
दीया के सवाँगा अउ सिंगार अंधियारी हा आय। जतके जादा अंधियार दीया मा वोतके जादा उछाह अउ जोस संचरथे। अंधियार बिन दीया के अँजोर हा अबिरथा हावय। दीया के जनम करम अउ धरम अँजोर हा आय। दीया के अपनेच उपजाये दीया के अँजोर हा होथे। दीया हा बरथे तभे अँजोर हा बगरथे अउ अंधियार हा अपन मुँहू ला करिया करके भागथे। दीया के बाती के बरत लउ हा सरग डहर उपरेच उठथे। जीयत भर आगू डहर बढ़थे अउ बरथे। हारे ला नइ जानय कभू पाछू नइ घूँचय। जर के अँजोर हा दुख के करिया अंधियार ला जीत के खुशी के देवारी बनाथे।




देवारी ला हमर जिनगी मा रोजेच मना सकथन। परपीरा ला हिरदे के दीया मा तेल बरोबर समो के मया के बाती ला बार के जब-जब अँजोर करबो तब-तब असल देवारी होही। दीया हा बाती बिन अधूरा हावय। बाती हा तेल बिन अउ तेल हा माटी के नान्हें-नान्हें अकार बिन अधूरा हावय। बाती हा पोनी ले बनथे। पोनी हा सादा अउ उज्जर होथे। सादा अउ उज्जर रंग हा सद्गुन अउ सदाचार के रुप हरय। पोनी ला बिसेस बल देके बाती बरे जाथे। हमर जिनगी मा घलाव सद्गुन अउ सदाचार के बल ले बिसेस अकार मिलथे। इही अकार हा जम्मों सफलता बर खच्चित होथे हमर जिनगी मा। तेल बिन बाती अधूरा हावय। तेल हा तरल अउ सरल होथे। तेल हा जम्मों अकार मा अपन आप ला समो लेथे,ढाल लेथे। कोन्हों ले तेल हा अपन अस्तित्व बर झगरा लड़ई नइ करय जइसने मा तइसने ढल जाथे। तेल कस हमरो जिनगी मा स्वयं ला वातावरण के हिसाब मा ढाले के गुन होना चाही। वातावरण मा ढलना, घुलना अउ मिलना हा सफलता के.चिन्हारी हरय। तेल तरल अउ सरल होथे, तेल मया कस होथे। मया मा बैरी घलो संगवारी बन जाथे। मया हा जिनगी के सार होथे। मया बिन जिनगी जुच्छा हावय अबिरथा हावय।
माटी के दीया हा तेल ला अपन कोरा मा समा लेथे। दीया हा कोंवर होथे जौन ला कुम्हार भाई मन हा गढ़थे। माटी कस कोंवर हमर जिनगी घलो हा होना चाही। माटी के दीया , तेल अउ बाती के मेल जोल ले अँजोर के जनम होथे जौन हा अंधियार ला हरथे अउ जिनगी मा चारों खुँट अँजोर भरथे। अइसनहे हमर जिनगी मा सफलता के रगरग झम्मक ले अँजोर लाय बर मया , कोंवर भाव अउ सदचार के दीया अंतस मा रोजेच बारे ला परही।
दीया बिन देवारी नइ होवय अउ देवारी बिन जिनगी मा खुशी के अँजोर नइ होवय। ए देवारी के दीया मा समाय जम्मों नियम-धरम हा हमर जिनगी मा घलो समाय हावय।दीया हा हमला जिनगी जीये के सुग्घर रंग ढ़ंग ला सीखोथे। जिनगी ला पर बर परहित मा जीये ला , जिनगी मा सदा आगू बढ़हे ला दीया हा बताथे। सतगुन अउ सदाचार के संगे संग मया अउ कोंवर भाव ला जिनगी मा समोय बर सीखोथे। दीया हा हमन ला जिनगी के दुख पीरा ले लड़ के आगू बढ़हे के प्रेरना देथे।
दीया बाती अउ तेल हा हमन ला अपन जिनगी मा लक्छय, लगन अउ इच्छसक्ति के पाठ ला पढ़ाथे। जौन हा दीया के संदेश ला समझगे ओखर जिनगी मा रोजेच देवारी हे। दीया अकेल्ला अंधियारी त्र नइ हरा सकय भगा सकय। दीया कै संग मा बाती अउ तेल हा जभे संघरथे तभेच दीया ले अँजोर के पीका फुटथे। इही दीया के अँजोर हा अंधियार के गढ़ ला जीतथे। अइसने हमर जिनगी घलो मा असफलता अउ निराशा के अंधियार ले सदाचार के बाती मया के तेल अउ वातावरण के रंग मा रंगे बर कच्चा माटी कस कोंवर भाव हा आही तभे हमन जिनगी मा सबो सफलता ला पाबो। जौन अपन जिनगी मा सफल हे फेर तो ओखर रोजेच देवारी तिहार हे।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक-भाटापारा(छ.ग)
संपर्क~9753322055



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