छन्द के छ : दोहा छन्द

बिनती

बन्दौं गनपति सरसती, माँगौं किरपा छाँव
ग्यान अकल बुध दान दौ, मँय अड़हा कवि आँव |

जुगत करौ अइसन कुछू, हे गनपति गनराज
सत् सहित मा बूड़ के , सज्जन बने समाज

रुनझुन बीना हाथ मा, बाहन हवे मँजूर
जे सुमिरै माँ सारदा, ग्यान मिलै भरपूर

लाडू मोतीचूर के , खावौ हे गनराज
सबद भाव वरदान मा, हमला देवौ आज

हे सारद हे सरसती , माँगत हौं वरदान
सबल होय छत्तीसगढ़ , भाखा पावै मान

स्वच्छ भारत अभियान

सहर गाँव मैदान – ला, चमचम ले चमकाव
गाँधी जी के सीख – ला , भइया सब अपनाव ||

लख-लख ले अँगना दिखै, चम-चम तीर-तखार
धरौ खराटा बाहरी, आवौ झारा – झार ||

भारत भर – मा चलत हवै , सफई के अभियान
जुरमिल करबो साफ हम , गली खोर खलिहान ||

आफिस रद्दा कोलकी , घर दुकान मैदान
रहैं साफ़ – सुथरा सदा, सफल होय अभियान ||

साफ – सफाई धरम हे , एमा कइसन लाज
रहै देस – मा स्वच्छता, सुग्घर स्वस्थ समाज ||

देसी-बिदेसी

मँय बासी हौं भात के, तँय मैदा के पाव
मँय गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव |

मँय सेवैया-खीर हौं, तँय नूडल- चउमीन
मँय बनथौं परसाद रे, तोला खावैं छीन |

मँय चीला देहात के, मँय भर देथौं पेट
तँय तो खाली चाखना, अंडा के अमलेट |

मँय अंगाकर मस्त हौं, तँय पिज्जा अनमोल
अंदर बाहिर एक मँय , तँय पहिरे हस खोल |

Arun Nigamदोहा छन्द
डाँड़ (पद) – २, ,चरन – ४
तुकांत के नियम – दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा, बड़कू,नान्हें (२,१)
हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ , बिसम चरन मा मातरा – १३, सम चरन मा मातरा- ११
यति / बाधा – १३, ११ मातरा मा , खास- बिसम चरन के सुरु मा जगन मनाही.
बिसम चरन के आखिर मा सगन, रगन या नगन या नान्हें,बड़कू(१,२)
सम चरन के आखिर मा बड़कू,नान्हें (२,१)
पहिली डाँड़ (पद)
बन्दौं गनपति सरसती- बिसम चरन (२+२)+(१+१+१+१)+(१+१+१+२) = १३
माँगौं किरपा छाँव – सम चरन (२+२)+(१+१+२)+(२+१) = ११
दूसर डाँड़ (पद)
ग्यान अकल बुध दान दौ बिसम चरन (२+१)+(१+१+१)+(१+१)+(२+१)+(२) = १३
मँय अड़हा कवि आँव- सम चरन (१+१)+(१+१+२)+(१+१)+(२+१) = ११
बिसम चरन के आखिर मा पहिली डाँड़ मा “रसती” (सगन ११२) अउ सम चरन के आखिर मा दूसर डाँड़ मा “दान दौ” (रगन २१२) आय हे.
तुकांत- दू-दू डाँड़ के आखिर मा (छाँव / आँव) माने सम-सम चरन मा, बड़कू,नान्हें (२,१)

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

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